Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Sunday, 13 November 2016

ShriNandKumarashtakam ( श्रीनंदकुमाराष्टकम् )

      


सुंदर गोपालं उरवनमालं नयन विशालं दु:ख हरम् ,
वृंदावनचंद्रम् आनंदकन्दम् परमानंदम् धरणीधरम् ।
वल्लभ घनश्यामं पूर्णकामं अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं ब्रह्मपरम् ।।१ ।।

सुंदर वारिजवदनं निर्जित मदनं आनंद सदनं मुकुटधरम् ,
गुंजाकृतिहारं  विपिनविहारं  परमोदारं  चीरहरम्  ।
वलल्भ पटपीतं कृत उपवीतं कर नवनीतं विबुधवरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। २ ।।

शोभित सुखमूलं यमुनाकूलं निपट अतूलं सुखद वरम् ,
मुख मण्डित रेणुं चारित धेनुं वादित वेणुं मधुर सूरम् ।
वल्लभ मति विमलं शुभपद कमलं नखरुचि विमलं तिमिर हरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ३ ।।

शिर मुकुट सुदेशं  कुंचित केशं नटवर वेषं कामवरम् ,
मायाकृत मनुजं हलधर अनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ४ ।।

इन्दीवरभासं प्रकट सुरासं कुसुम विकासं वंशीधरम् ,
जित मन्मथ मानं रूप निधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभ मृदु हासं कुंज निवासं विविध विलासं ब्रह्मपरम् ।। ५ ।।

अति परम प्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्म करम् ,
मोहनमति धीरं कलिबलिवारं हत परवीरं तरल तरम् ।
वल्लभ व्रज रमणं वारिज वदनं जलधर शमनं शैलधरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्  ।। ६ ।।

जलधर द्युतिकायं ललितत्रिभंगं बहु कृतिरंगं रसिकवरम् ,
गोकुल  परिवारं  मदनाकारं  कुंज  विहारं  गूढ़नरम् ।
वल्लभ व्रजचंद्रम् सुभग सुछंदम् परमानंदम भ्रांतिहरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम ।। ७ ।।

वंदित युग चरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरं ,
कालिय शिर गमनं कृतफणि नमनं घातितयमनं मृदुल तरम् ।
वल्लभदु:खहरणं  निर्मलचरणं  अशरणशरणं  मुक्तिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्   ।। ८ ।।

।। इति श्रीमद् वल्लभाचार्य विरचितं नंदकुमाराष्टकं सम्पूर्णम्  ।।

Thursday, 3 November 2016

ShriDamodarashtkam ( श्रीदामोदराष्टकम् )



नमामीश्वरं  सच्चिदानंदरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्  ।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततो द्रुत्य गोप्या  ।।१ ।।

( जिनके कपोलों पर लटकते मकराकृत-कुंडल क्रीड़ा कर रहे हैं, जो गोकुल के चिन्मय धाम में परम शोभायमान हैं, जो दूध की हांडी फोड़ने के कारण माँ यशोदा से भयभीत होकर ऊखल के उपर से कूदकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे हैं और जिन्हें माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेग से दौड़कर पकड़ लिया है, ऐसे सच्चिदानंद- स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।)

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोज-युग्मेन सातंकनेत्रं ।
मुहु:श्वास कम्प - त्रिरेखांक - कण्ठ
स्थित ग्रैव - दामोदरं भक्तिबद्धम् ।। २  ।।

( जननी के हाथ में लाठी को देखकर मार खाने के भय से जो रोते-रोते बारंबार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मसल रहे हैं, जिनके दोनों नेत्र भय से अत्यन्त विह्वल हैं, रूदन के कारण बारंबार साँस लेने के कारण तीन रेखाओं से युक्त शंख रूपी जिनके कंठ में पड़ी मोतियों की माला काँप रही है, और जिनका उदर ( माँ यशोदा की वात्सल्य भक्ति द्वारा ) रस्सी से बँधा हुआ है, उन सच्चिदानन्द - स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ )

इतिदृक् स्वलीलाभिरानंद कुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् ।
तदीयेशितज्ञेषु  भक्तैर्जितत्वं
पुन:  प्रेमतस्तं  शतावृत्ति  वन्दे  ।। ३ ।।

( जो इस प्रकार की बाल्य- लीलाओं द्वारा गोकुलवासियों को आनन्द सरोवर में नित्यकाल सराबोर करते रहते हैं,और जो ऐश्वर्यपूर्ण ज्ञानी भक्तों के समक्ष यह उजागर करते हैं कि " मैं केवल ऐश्वर्यविहीन प्रेम और भक्ति द्वारा ही जीता जा सकता हूँ," उन दामोदर श्रीकृष्ण की मैं प्रेमपूर्वक बारम्बार वंदना करता हूँ।)

वरं देव ! मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेअहं वरेशादपीह  ।
इदं  ते  वपुर्नाथ  गोपाल  बालं
सदा मे मनस्याविरस्तां  किमन्यै: ।।४ ।।

( हे देव ! आप सब प्रकार से वर देने में पूर्ण सक्षम हैं, तो भी मैं आप से मोक्ष या मोक्ष की चरम सीमारूप वैकुण्ठ आदि लोक भी नहीं चाहता और न ही अन्य कोई ( नवधा भक्ति द्वारा प्राप्त किये जाने वाले ) वरदान चाहता हूँ। हे नाथ ! मैं तो केवल एक ही वर चाहता हूँ कि आपका यह बालगोपाल रूप मेरे हृदय में सदा - सदा के लिये विराजमान रहे।मुझे अन्य दूसरे वरदानों से कोई प्रयोजन नहीं है।)



इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलै: स्निग्ध- रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं  बिम्बरक्ताधरं मे 
मनस्याविरस्तामलं लक्षलाभै: ।।५ ।।

( हे देव ! कुछ - कुछ लालिमा लिये हुये कोमल तथा घुँघराले बालों से घिरा आपका मुखकमल माँ यशोदा द्वारा बारम्बार चुम्बित है और आपके होंठ बिम्ब फल के समान लाल हैं। आपका यह मधुर रूप नित्यकाल तक मेरे हृदय में प्रकट होता रहे।मुझे लाखों प्रकार के अन्य लाभों की आवश्यकता नहीं है।)

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो 
प्रसीद प्रभो दु:ख जलाब्धि- मग्नम् ।
कृपादृष्टि- वृष्टियातिदीनं बतानु
गृहाणेश   मामज्ञमेध्यक्षि दृश्य: ।।६ ।।

( हे परमदेव ! हे दामोदर ! हे अनन्त ! हे विष्णो ! हे प्रभो ! हे भगवन !  मुझपर प्रसन्न होवें । मैं दु:खों के समुद्र में डूबा जा रहा हूँ।अतएव आप अपनी कृपादृष्टि रूपी अमृतवर्षा कर मुझ दीन - हीन शरणागत पर अनुग्रह कीजिये एवं मेरे नेत्रों के समक्ष साक्षात् दर्शन दीजिये।) 

कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वयामोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च ।
तथा  प्रेमभक्तिं  स्वकां  मे  प्रयच्छ 
न  मोक्षे  गृहो मेअस्ति  दामोदरेह ।। ७ ।।

( हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने दामोदर रूप से ऊखल में बँधे रहकर भी नलकूबर और मणिग्रीव नामक कुबेर के दोनों पुत्रों को नारदमुनि के शाप से मुक्त करके अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये।यही मेरा एकमात्र आग्रह है।किसी अन्य प्रकार के मोक्ष की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।)

नमस्तेअस्तु दाम्ने स्फुरद्धीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ  विश्वस्य  धाम्ने  ।
नमो राधिकायै त्वदीय - प्रियायै
नमोअनंत  लीलाय देवाय तुभ्यम् ।। ८ ।।

( हे दामोदर ! आपके उदर को बाँधने वाली महान् रस्सी को प्रणाम है, निखिल ब्रह्मतेज के आश्रय और सम्पूर्ण विश्व के आधारस्वरूप आपके उदर को नमस्कार है।आपकी प्रियतमा श्री राधारानी के चरणों में मेरा बारम्बार प्रणाम है और हे अनन्त लीलाविलास करने वाले भगवन् ! मैं आपको भी सैकड़ों प्रणाम अर्पित करता हूँ।








Wednesday, 12 October 2016

व्रज भूमि के गिरिराज पर्वत ( गोवर्धन ) की कथा।

गोवर्धन पर्वत अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को ही मानते हैं।यह पर्वत अपने पत्र ,पुष्प ,फल ,और जल को श्रीकृष्ण का ही मानकर उन्हें सदा समर्पित करता है।जब प्रभु तथा उनके सखाओं को भूख लगती है,तो नाना प्रकार के फल उन्हें अर्पित करता है,और प्यास लगने पर अपने मधुर जल से उन्हें तृप्त करता है।प्रभु को सजाने के लिये तरह-तरह के पुष्प गले के हार के लिये अर्पित करता है।

            पौराणिक कथानुसार गिरिराज द्रोणपर्वत का पुत्र है।एक बार ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणपर्वत से उनके पुत्र गोवर्धन को अपने साथ अन्यत्र ले जाने के लिये विनय किया।तब गोवर्धनपर्वत ने शर्त रखी कि यदि मार्ग में थकान या किसी कारण वश कहीं भी भूमि पर उन्हें रखा गया तो गोवर्धन वहीं अटल हो जायेंगे।

          ऋषि पुलस्त्य जब व्रजभूमि के ऊपर से गुजर रहे थे तो गिरिराज ने अपना वजन इतना बढ़ा लिया कि पुलस्त्य ऋषि को
गिरिराजपर्वत भूमि पर रखना पड़ा।वह भूमि व्रजभूमि ही थी, और गिरिराज श्रीकृष्ण की पावन स्थली वृन्दावनधाम में सदा-सदा के लिये विराजमान हो गया।ऋषि पुलस्त्य को इस बात पर बड़ा क्रोध आया,और उन्होने गिरिराज को शाप दे दिया कि तू दिन प्रतिदिन तिल-तिल घटता जायगा, और यह क्रम आज भी चल रहा है।

         वाराहपुराण के एक कथानुसार------त्रेता युग में जब प्रभु श्रीराम को समुद्र पर पुल का निर्माण हेतु बड़े-बड़े पाषाण-खण्ड एवं पर्वतों की आवश्यकता हुई, तब हनुमानजी बहुत सारे पाषाणखण्ड उठा कर लाये।उसी समय गिरिराज को भी उठाकर पवनपुत्र ला रहे थे, कि तभी घोषणा हुई कि सेतुबन्ध का कार्य पूर्ण हो चुका है।अब पाषाणखण्ड की कोई आवश्यकता नहीं है।विवश होकर हनुमानजी ने लौटकर पर्वतराज को अपने पूर्व स्थान पर ही स्थापित कर दिया।उस समय गिरिराज को महान क्षोभ हुआ कि मैं प्रभु श्रीराम के कोई काम न आ सका।तब प्रभु उसके अन्तस के क्षोभ का आभास पाते हुये आश्वस्त किया कि द्वापर युग में मेरे कृष्णावतार के समय तुम्हें मेरे चरणरजस्पर्श एवं लीलावलोकन का पूर्ण लाभ मिलेगा।तुम श्रीकृष्ण के परम प्रिय हरिदासवर्य बनोगे।इन्द्रकोप के समय श्रीकृष्ण अपने नख पर धारण कर समस्त ब्रजमंडल की रक्षा का माध्यम तुम्हें ही बनायेंगे।गिरिराज को हरिदासवर्य कहा गया है,अर्थात भगवद्भक्तों में परम श्रेष्ठ हैं।इस पर्वत पर श्रीकृष्ण गोचारण करते हुये अपने चरणों का उन्हें स्पर्ष कराते हैं ,धन्य हैं ये गिरिराज, और धन्य है इनकी कथा।भगवान श्रीकृष्ण ने तो स्वयं गिरिराज बनकर अन्नकूट का भोग स्वीकार किया।यह गिरिराज तो कृष्ण व्रजराज कहलाए।कृष्ण गोपाल तो यह गोवर्धन।गिरिराज के बिना ब्रज की कल्पना नहीं की जा सकती।

Saturday, 24 September 2016

Ki Jane Kaun Se Gun Par ,DayaNinidhi Reejh Jate Hai.( कि जाने कौन से गुण पर,दयानिधि रीझ जाते हैं।)


कि जाने कौन से गुण पर, दयानिधि रीझ जाते हैं।
यही सद् ग्रंथ कहते  हैं, यही हरि भक्त गाते हैं  ।
कि जाने कौन-------- ---------------------।

नहीं स्वीकार करते हैं, निमंत्रण नृप दुर्योधन का।
विदुर के घर पहुँचकर, भोग छिलकों का लगाते हैं।
कि जाने कौन से ------------------------------।

न आये मधुपुरी से गोपियों की, दु: ख कथा सुनकर।
द्रुपदजा की दशा पर,  द्वारका से दौड़े  आते हैं  ।
कि जाने कौन से------------------------------- 

न रोये बन गमन में , श्री पिता की वेदनाओं पर ।
उठा कर गीध को निज गोद में , आँसु बहाते हैं ।
कि जाने कौन से------------------------------ ।

कठिनता से चरण धोकर , मिले कुछ 'बिन्दु' विधि हर को
वो चरणोदक स्वयं केवट के , घर जाकर लुटाते हैं।
कि जाने कौन से------------------------------------- ।

Sunday, 28 August 2016

Jaimal Ki Pad Sevan Bhakti. ( जयमल की पाद सेवन भक्ति ।)

एक जयमल नाम के प्रभु चरणों के अनुरागी भक्त थे।वे अपने घर के ऊपर के कमरे में प्रभु की चरण सेवा किया करते थे।प्रभु उनकी अटूट प्रेम भक्ति से प्रसन्न होकर रात्रि के समय रोज दर्शन देने लगे।भक्त जयमल भी बड़े प्रेम से प्रभु की चरण सेवा करने लगे और अपनी पत्नी के पास जाना भूल गये।पत्नी सोंच में पड़ गई कि उनके पति आजकल कहाँ जाने लग गये हैं? दूसरे दिन उनकी पत्नी ने सोंचा आज मैं देखती हूँ ये कहाँ जाते हैं और यही सोंचकर उसने अपने पति का रात में पीछा किया तो देखती है पतिदेव साक्षात प्रभु की सेवा करने में मग्न हैं। प्रभु के दर्शन पाकर वो स्वयं भी मंत्रमुग्ध हो गई और प्रभु के चरणों में गिर गई। प्रभु दोनों को भक्ति का आशीर्वाद देकर अन्तर्धान हो गये।
   

Wednesday, 10 August 2016

Haritalika Teej Vrat Katha .(हरितालिका तीज व्रत कथा । )



हरितालिका ( तीज ) व्रत हिन्दी के भाद्रपद की शुक्लपक्ष तृतीया के दिन होता है।
कथा ----- सूतजी बोले --- जिन श्री पार्वती जी के घुँघराले केश मन्दार की माला से अलंकृत हैं और मुंडों की माला से जिन शिवजी की जटा अलंकृत है, जो ( पार्वती जी ) सुन्दर एवं नए वस्त्रों को धारण करने वाली हैं और जो ( शिवजी ) दिगम्बर हैं ऐसी श्री पार्वती जी तथा शिवजी को मैं प्रणाम करता हूँ।
कैलाश पर्वत के सुन्दर विशाल चोटी पर बैठी हुई श्री पार्वती जी ने भगवान शंकर से कहा ---- हे महेश्वर! हमें कोई गुप्त व्रत या पूजन बताइये जो सभी धर्मों में सरल हो , जिसमें अधिक परिश्रम भी नहीं करना पड़े और फल भी अधिक मिले।हे परमेश्वर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हों तो इसका विधान बताइये।तथा यह भी बताने की कृपा करें कि किस तप, व्रत दान से ,आदि , मध्य और अन्त रहित आप जैसे महा प्रभु हमको प्राप्त हुए हैं।
शंकर जी बोले------ हे देवि! सुनो मैं तुमको एक उत्तम व्रत जो मेरा सर्वस्य और छिपाने योग्य है तुम्हें बतलाता हूँ। जैसे नक्षत्रों में चन्द्रमा,ग्रहों में सूर्य,वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में विष्णु भगवान, नदियों में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों मे सामवेद और इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ हैं।सब पुराण और स्मृतियों में जिस तरह कहा गया है,मैं तुम्हे वह व्रत बतलाता हूँ ,तुम उसे एकाग्र मन से श्रवण करो।जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसन प्राप्त किया है, वह मैं तुमको बतलाऊँगा।क्योंकि तुम मेरी अर्धांगिनी हो।भादो का महीना हो, शुक्ल-पक्ष की तृतीया तिथि हो, हस्त नक्षत्र हो, उसी दिन इस व्रत के अनुष्ठान से मनुष्यों के सभी पाप भस्मीभूत हो जाते हैं।
हे देवि! जिस महान व्रत को तुमने हिमालय पर्वत पर किया था, वह सब पूरा वृतान्त मैं तुमसे कहूँगा।श्री पार्वती जी बोली , हे नाथ! मैंने क्यों यह सर्वोत्तम व्रत किया था, यह सब आपसे सुनना चाहती हूँ।शिवजी बोले --- हिमालय नामक एक उत्तम महान पर्वत है।उसके आस-पास तरह-तरह की भूमियाँ हैं।तरह-तरह के वृक्ष लगे हुये हैं।अनेकों प्रकार के पक्षी और पशु उस पर निवास करते हैं।वहाँ गन्धर्वों के साथ बहुत से देवता, सिद्ध, चारण और पक्षीगण सर्वदा प्रसन्न मन से विचरते हैं।वहाँ पहुँचकर गन्धर्व गाते हैं, अप्सरायें नाचती हैं ।उस पर्वतराज के कितने ही शिखर स्फटिक, रत्न और वैदूर्यमणि आदि खानों से भरे हुये हैं।उस पर्वत की चोटियाँ इतनी ऊँची हैं मानों आकाश को छू रही हों।उसकी सभी चोटियाँ सर्वदा बर्फ से ढकी रहती हैं और गंगा की जल ध्वनि भी सदा सुनाई देती रहती है।हे पार्वती! तुमने वहीं बाल्यावस्था में बारह वर्ष पर्यन्त कठोर तप किया और उसके बाद कुछ वर्ष केवल पत्ते खाकर रहीं।माघ महीने में जल में खड़ी हो तप किया और वैशाख में अग्नि का, तथा सावन में तुम भूखी-प्यासी रहकर तप करती रही।
तुम्हारे पिता तुम्हें इस प्रकार के कष्टों में देखकर बड़े दुखी हुये।वे चिन्ता में पड़ गये कि मैं अपनी कन्या का विवाह किसके साथ करूँ।उसी समय श्रेष्ठ मुनि नारद जी वहाँ आ पहुँचे।नारद जी को सम्मान के साथ आसन देकर आपके पिता पर्वत राज ने उनसे कहा , मुनिवर आप यहाँ आये, यह मेंरा सौभाग्य है।नारद जी बोले -- हे पर्वत राज! मुझे स्वयं विष्णु भगवान ने आपके पास भेजा है।नारद जी ने कहा-- आपकी कन्या, सामान्य कन्या नहीं है,इसलिये इसका विवाह किसी योग्य वर के साथ ही होना चाहिये।संसार में ब्रह्मा, इन्द्र, और शिव इत्यादिक देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ माने जाते हैं ।अत:मेरी सम्मति में उन से ही अपनी कन्या का विवाह करना उत्तम है।पर्वतराज हिमालय बोले देवाधिदेव--- भगवान विष्णु स्वयं मेरी कन्या का हाथ माँग रहे हैं और आप यह सन्देशा लेकर आये हैं , तो मैं अपनी कन्या का विवाह भगवान विष्णु के साथ ही करूँगा।यह सुनकर नारदजी वहाँ से अन्तर्धान होकर ,पीताम्बर, शंख, चक्र और गदाधारी भगवान विष्णु के पास पहुँचे।नारदजी ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से कहा ------- हे देव! मैंने आपका विवाह निश्चित कर दिया है।
            उधर हिमालयराज ने अपनी पुत्री पार्वती के पास जाकर कहा कि पुत्री! मैंने तुम्हारा विवाह भगवान विष्णु के साथ निश्चित किया है।तब पिता की बात सुनकर अत्यन्त दु:खी हो पृथ्वी पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।तुम्हारी सखियों ने यह सब देखकर तुमसे चुपचाप पूछा, हे देवि! तुम्हें क्या दु: ख है हमसे कहो,हमलोग यथाशक्ति उसका निवारण करने की कोशिष करेंगे।पार्वतीजी ने कहा--- हे सखी! मुझे प्रसन्न करना चाहती हो तो मेरी जो कुछ अभिलाषा है उसे प्रेमपूर्वक सुनो।मैं एकमात्र शिवजी को ही अपने पति रूप में वरण करना चाहती हूँ,इसमें कुछ भी संशय नहीं है।परन्तु मेरे पिताजी मेरा विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते हैं यदि एेसा हुआ तो मैं अपना शरीर त्याग दूँगी।
पार्वतीजी की बात सुनकर सखियों ने कहा,पार्वती! तुम घबराओ नहीं, हमदोनो तुम्हें यहाँ से निकालकर ऐसे वन में पहुँच जायेंगे,जहाँ तुम्हारे पिताजी हमें ढूँढ ही नहीं पायेंगे।शिवजी कहते हैं-- देवि! ऐसी सलाह कर तुम अपनी सखियों के साथ वैसे घनघोर वन में जा पहुँची।इधर तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर घर-घर तुम्हारी खोज करवाने लगे।दूतों द्वारा भी खोज करवाने लगे कि कौन देवता-दानव या किन्नर मेरी पुत्री को हर ले गया है।तुम्हारे पिता सोंचने लगे,कि अब मैं भगवान विष्णु को क्या उत्तर दूँगा , ऐसा सोंचते-सोंचते वे अचेत हो गये।पर्वतराज को मूर्छित देखकर सब लोग हाहाकार करते दौड़ पड़े, और चिन्ता का कारण पूछने लगे।गिरिराज ने कहा आप सब लोग मेरे दु:ख का कारण सुनो! मेरी पुत्री को न जाने कौन हर ले गया है अथवा काले सर्प ने डस लिया है, या ब्याघ्र ने खा लिया है।पता नहीं मेरी कन्या कहाँ चली गई।ऐसा कहकर वे पुन: दु:ख से वेचैन होने लगे।इधर अपनी सखी के साथ तुम भी उस भयानक वन में चलते-चलते एक ऐसे जगह पर जा पहुँची जहाँ एक सुन्दर नदी बह रही थी और उसके तट पर एक बड़ी गुफा थी। तुमने उसी गुफा में आश्रय लिया,और मेरी एक बालू की प्रतिमा बनाकर अपनी सखी के साथ निराहार रहकर मेरी अराधना करने लगीं।उस दिन भाद्र शुक्ल पक्ष की हस्तयुक्त तृतीया थी तब तुमने मेरा विधिवत् पूजन किया और रात भर जागकर भजन कीर्तन के साथ मुझे प्रसन्न करने में बिताया।
        उस व्रतराज के प्रभाव से मेरा आसन डगमगा उठा।तब तत्काल मैं उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ तुम अपनी सखियों के साथ पूजा में मग्न थी।वहाँ पहुँकर मैंने तुमसे कहा कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, वर माँगो।तब तुमने कहा--- यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये कि मैं आपकी अर्धांगिनी बन सकूँ।मेरे 'तथास्तु 'कह कर  कैलास पर्वत पर वापस आने पर तुमने मेरी मूर्ति का नदी में विसर्जन किया और सखी के साथ उस महाव्रत का पारण किया।तुम्हारे पिता भी तब तक तुम्हें ढूँढते हुये उस वन में आ पहुँचे।तुम्हें देखते ही उन्होंने तुम्हें अपने गले से लगा लिया और पूछने लगे ,पुत्री तुम सिंह,व्याघ्र आदि खतरनाक जंगली जानवरों से भरे वन में क्यों आ पहुँची।तुमने उत्तर दिया ,पिताजी! आप मेरा विवाह विष्णुजी के साथ करना चाहते थे परन्तु मैंने पहले ही शिवजी को पति रूप में वरण कर लिया है।तब पर्वतराज ने तुम्हें सान्त्वना दिया कि पुत्री तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तुम्हारा विवाह कहीं और नहीं करूँगा।तुम्हें अपने साथ घर ले आये और तुम्हारा विवाह मेरे साथ कर दिया।इसी से तुमने मेरा अर्धासन पाया है।
    अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि इस ब्रत का नाम हरितालिका क्यों पड़ा।तुम्हारी सखियाँ पिता के घर से तुम्हारा हरण कर ले गई थी, इसी से इस ब्रत का नाम हरितालिका पड़ा।पार्वतीजी बोलीं--- हे प्रभो! कृपा करके इस ब्रत की विधि तथा इसके करने से क्या फल मिलता है यह भी बताने का कष्ट करें।शिवजी बोले--- हे देवि! यह ब्रत सौभाग्यवर्धक है।जो स्त्री अपने सौभाग्य की रक्षा करना चाहती है, उसेइस ब्रत को करना चाहिये।इस ब्रत में शिवजी तथा पार्वतीजी की प्रतिमा बनाकर स्थापित करे तथा पुष्प धूप मिष्ठान तथा फल आदि से विधिवत पूजन करें , नारियल पान सुपारी श्रद्धापूर्वक अर्पित करें तथा पार्वतीजीके श्रृंगार की सभी आवश्यक वस्तुयें ( चुन्नी चूड़ी सिंदूर विन्दी आदि) चढ़ाएँ।
    शिवजी तथा पार्वतीजी को श्रद्धा से दोनों हाथ जोड़कर नमन करें।फिर शिवजी तथा माता पार्वती की आरती करें।दूसरे दिन सूर्योदय से पहले पूजन कर अपना ब्रत समापन करना चाहिये।शिवजी तथा पार्वतीजी की प्रतिमा को नदी में विसर्जन कर ब्राह्मण को अन्न तथा द्रव्य दान देकर पारण करना चाहिये।
"जय भोलेनाथ जय माँ जगदम्बे।"


  

Saturday, 6 August 2016

Bhakt aur bhagwan ke beech madhur Vinod

श्रीकृष्ण भगवान का एक बहुत ही प्यारा भक्त था, जिसका नाम अहमदशाह था।अहमद को भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते रहते थे।उन्हें प्रभु की अहैतुकी कृपा प्राप्त होती रहती थी।भगवान अपने भक्त के साथ कभी-कभी मधुर विनोद भी किया करते थे।एक दिन अहमदशाह अपनी लम्बी टोपी पहन कर भगवान के ध्यान में बैठे थे ।भगवान को उनकी टोपी देखकर हँसी सूझी।वे उनके पास प्रकट होकर बोले---- "अहमद ! मेरे हाथ अपनी टोपी बेचोगे क्या ?" अहमद श्रीकृष्ण की बात सुनकर प्रेम से भर गये, पर उन्हें भी विनोद सूझा।अहमद ने कहा ---"चलो हटो , दाम ( कीमत )देने के लिये तो कुछ है नहीं और अाये हैं टोपी खरीदने!" अब प्रभु को इस विनोद में आनंद आने लगा था उन्होंने कहा "नहीं जी , मेरे पास बहुत कुछ है !" अहमद ने कहा "बहुत कुछ क्या है, लोक - परलोक की समस्त सम्पत्ति ही तो आपके पास है, पर यह सब लेकर मैं क्या करूँगा ?"
                भगवान ने कहा---- "देखो अहमद! यदि तुम मेरी इस प्रकार उपेक्षा करोगे तो मैं संसार में तुम्हारा मूल्य घटा दूँगा।तुम्हें लोग इसलिये पूछते हैं, तुम्हारा आदर करते हैं कि तुम मेरे भक्त हो और मैं भक्त के हृदय में निवास करता हूँ। किन्तु अब मैं सभी से कह दूँगा कि अहमद मेरी हँसी उड़ाता है , इसलिये तुमलोग उसका आदर मत करना।फिर संसार का कोई व्यक्ति तुम्हें आदर नहीं करेगा।" अब तो अहमद भी बड़े तपाक से बोले ---- "अच्छा जी ! मुझे दुनिया का डर दिखा रहे हो ! यदि आप मेरा मूल्य घटा दोगे तो मैं भी आपका मूल्य घटा दूँगा।मैं सबसे कह दूँगा कि भगवान् बहुत सस्ते मिल सकते हैं , वे सर्वत्र रहते हैं , सबके हृदय मे निवास करते हैं।जो कोई उन्हें अपने हृदय में झाँककर देखना चाहेगा , उसे वो वहीं मिल सकते हैं ,कही जाने की जरूरत नहीं है।फिर लोगों में आपका सम्मान भी कम हो जायेगा।"
                             भगवान हँसे और अहमद से बोले "तुम जीते और मैं अपने भक्त से हारकर भी खुश हूँ।" यह कह कर प्रभु अन्तर्धान हो गये।अहमद पुन: प्रभु के ध्यान में लग गये।