Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Friday, 17 April 2015

ईश्वर तू है दयालु ,दु:ख दूर कर हमारा । (कृष्णा भजन )

ईश्वर तू है दयालु , दु:ख दूर कर हमारा ,
तेरी शरण में आये , प्रभू दीजिये सहारा ।
ईश्वर तू है ...................................
तू है पिता या माता, सब विश्व का विधाता,
तुझसा नहीं है दाता , तेरा सभी पसारा ।
ईश्वर तू है .....................................
भूमि ,आकाश , तारे, रवि ,चन्द्र , सिन्धु सारे ,
 तेरे हुकुम में सारे , सबका तू ही अधारा ।
ईश्वर..............................................।
जग चक्र में चढ़ा हूँ  , भव सिन्धु में पड़ा हूँ  ,
दर पे तेरे खड़ा हूँ  , अब दे मुझे दीदारा  ।
ईश्वर तू है .......................................
अपनी शरण में लीजिये , सब दोष दूर कीजिये ,
ब्रह्मानन्द  ज्ञान दीजिये , तेरा नाम निर्विकारा ।
ईश्वर तू है ..................................।


Wednesday, 15 April 2015

भिक्षा का उपयोग , महात्मा जी की उदारता ।

स्वामी रामदास जी का यह नियम था, कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत होकर भिक्षा माँगने के लिए केवल पाँच घर ही जाते थे और कुछ न कुछ लेकर ही वहाँ से लौटा करते थे।
एक बार उन्होंने एक घर के द्वार पर खड़े होकर ,जय जय रघुवीर का घोष किया ही था कि गृहस्वामिनी , जिसकी थोड़ी ही देर पूर्व अपने पति से कुछ कहा सुनी हुई थी, जिसके कारन वो बहुत ग़ुस्से में थी बाहर आकर चिल्लाकर बोली , तुम लोगों को भीख माँगने के अलावा कोई दूसरा और धंधा नहीं आता है । मुफ़्त में मिल जाता है , इसलिए चले आते हो , जाओ यहाँ से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, कोई और घर ढूँढो ।
स्वामी जी हँसकर बोले , माता जी मैं बिना भिक्षा लिये किसी द्वार से खाली नहीं जाता । कुछ न कुछ तो लेकर ही जाऊँगा ।गृहस्वामिनी भोजनोपरान्त रसोई की साफ सफाई कर रही थी उसके हाथ में सफ़ाई का कपड़ा था ।उस महिला ने उस कपड़े को ही महात्मा जी के झोली में डाल दिया और कहने लगी, भिक्षा मिल गया? अब यहाँ से जाइये ।
 
स्वामीजी प्रसन्न हो वहाँ से चले गये और नदी में जा कर कपड़े को अच्छी तरह धोकर तथा सुखाकर उसकी बाती बनाए और मंदिर में जाकर दिया जला दिये ।इधर स्वामीजी के जाते ही उस महिला को अपने किये व्यवहार पर ग्लानी होनें लगी।उसने व्यर्थ ही एक धर्मात्मा का दिल दुखाया था। वो महात्माजी को ढूँढने बाहर निकली और ढूँढते हुये मंदिर पहुँची । वहाँ स्वामीजी को पाकर उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगी। क्षमा माँगते समय उसके नेत्र से अविरल आँसू बह रहे थे।
  स्वामी रामदासजी बोले -देवि तुमने उचित ही भिक्षा दी थी । तुम्हारी भिक्षा का ही प्रताप है कि यह मंदिर प्रकाशित हो उठा है, अन्यथा तुम्हारा दिया भोजन तो जल्द ही समाप्त हो गया होता ।

                  (Ref. Sharat Chandra's article from Kalyan Magazine)

माटी का खिलौना , माटी में मिल जायगा । (कृष्णा भजन )

मान मेरा कहना नहीं तो पछतायेगा ।
माटी का खिलौना , माटी में मिल जाएगा ।।
सुन्दर रूप देख क्यों भूला ,धन यौवन के मद में फूला ।
एक दिन हंसा अकेला उड़ जाएगा ।। माटी का ........
पत्नी सुपति पिता अरू माता , सखा सुमित्र सहोदर भ्राता ।
पल भर में नाता सभी से छूट जाएगा ।। माटी का ...........।
हीरा जवाहर की माला तुम्हारी , मखमल के गद्दे और रेशम की साड़ी ।
धन दौलत और इज्जत तुम्हारी सब यहीं धरा रह जएगा ।। माटी का......।
हीरा जन्म गवाँय दियो सोए सोए , पछताओगे रे मन आँसु बहाय के ।
भाई फिर ऐसा समय न दुबारा आएगा ।। माटी का ................।

Tuesday, 14 April 2015

राधा रमण , राधा रमण कहो ।

जिस काम में , जिस नाम नाम में ,जिस धाम में रहो ।
    राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  कहो ।।
  जिस रंग में , जिस ढंग में , जिस संग में रहो ।
     राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  कहो  ।।
    जिस देह में , जिस गेह में , जिस नेह में रहो  ।
   राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  जपो  ।।
    जिस राग में , अनुराग में , बैरांट में रहो  ।
   राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  भजो  ।।
  जिस मान में , सम्मान में , अपमान में रहो  ।
  राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  कहो ।।
      संसार में , परिवार में , घरवार में रहो  ।
 राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  भजो ।।
  जिस हाल में जिस चाल में , जिस डाल में रहो ।
     राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण कहो  ।।
     जिस देश में ,  परदेश में , स्वदेश में रहो । 
    राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  भजो ।।
    

Monday, 13 April 2015

पार्वती जी की आरती ।

जय पार्वती माता , मैया जय पार्वती माता ।
ब्रह्म सनातन देवी ,   शुभ फल की दाता  ।।
जय पार्वती माता ..................................
अरिकुल पद्म  विनासनि,  जय सेवक  त्राता ।
  जग जीवन जगदम्बा , हरिहर गुण  गाता ।।
जय पार्वती माता ...................................
  सिंह को वाहन साजे ,  कुण्डल है   साथा   ।
  देव बंधु जस गावत ,   नृत्य करत  ता था   ।।
 जय पार्वती माता ................................
 सतयुग रूप शील अति सुन्दर , नाम सति कहलाता ।
 हेमांचल घर जन्मी ,  सखियन  संग राता   । ।
 जय पार्वती माता ..........................................
 शुम्भ निशुम्भ    विदारे ,    हेमांचल स्याता    ।
 सहस्र भुजा तनु धरिके ,  चक्र लियो  हाथा  ।।
 जय पार्वती माता ...........................................
  सृष्टि रूप  तू ही है जननी ,  शिव संग  रंगराता ।
   नन्दी   भृंगी   बीन  लही है , हाथन  मदमाता  ।।
  जय पार्वती माता .....................................
      देवन अरज करत   ,  तब चित  को  लाता ।
        गावत  दे दे ताली ,      मन में रंग  राता ।।
   जय पार्वती माता .................................
    मैंया जी की आरती ,  जो कोई भक्त   गाता ।
   सदा सुखी नित रहता ,    सुख सम्पत्ति पाता ।।
   जय पार्वती माता ......................................

  

Saturday, 11 April 2015

भक्त और भगवान के बीच मधुर विनोद ।

भगवान का एक मुसलमान भक्त थे जिनका नाम अहमदशाह था ।अहमदशाह को प्रायः भगवान श्रीकृष्ण 
के दर्शन होते रहते थे।भगवान उनसे विनोद भी किया करते थे । एक दिन अहमदशाह एक बड़ी लम्बी टोपी
पहन कर बैठे हुए थे। भगवान को उनकी टोपी देखकर हँसी आ गई और उन्हें विनोद करने का ख़्याल आया।
प्रभु भक्त के पास प्रकट होकर बोले, अहमद! मेंरे हाथ अपनी टोपी बेचोगे क्या ? अहमद श्रीकृष्ण को अपने
समीप पाकर तथा उनकी बात सुनकर प्रेम से भर गए , पर उन्हें भी विनोद सूझा ।वे बोले- चलो हटो, दाम देने
के लिए तो कुछ है नहीं और आए हैं टोपी खरीदनें । भगवान ने कहा नहीं जी मेरे पास बहुत कुछ है! तब अहमद
ने कहा , बहुत कुछ क्या है , लोक परलोक की समस्त सम्पत्ति ही तो तुम्हारे पास है , पर वह लेकर मैं क्या करूँगा?
भगवान ने कहा , देखो अहमद यदि तुम इस प्रकार मेरी उपेक्षा करोगे तो मैं संसार में तुम्हारा मूल्य घटा दूँगा । तुम्हें लोग
इसलिए पूछते हैं, तुम्हारा आदर करते हैं कि तुम भक्त हो और मैं भक्त के हृदय में निवास करता हूँ । किंतु अब मैं कह दूँगा
कि अहमद मेरी हँसी उड़ाता है , उसका आदर तुम लोग मत करना । फिर संसार का कोई व्यक्ति तुम्हें नहीं पूछेगा ।
अब तो अहमद भी बड़े तपाक से बोले ,अजी मुझे क्या डर दिखाते हो ? तुम यदि मेरा मूल्य घटा दोगे तो तुम्हारा
मूल्य भी मैं घंटा दूँगा । मैं सबसे कह दूँगा कि भगवान बहुत सस्ते में मिल सकते हैं , वे सर्वत्र रहते हैं , सबके हृदय में
निवास करते हैं ।जो कोई उन्हें अपने हृदय में झाँककर देखना चाहेगा , उसे वे वहीं मिल सकते हैं, कहीं जाने की ज़रूरत नहीं ।
फिर तुम्हारा आदर भी घट जायगा ।
                         भगवान हँसे और बोले - अच्छा अहमद , न तुम्हारी , न मेंरी ठीक है ।
                           और यह कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये ,भक्त अहमद भी प्रभु के ध्यान में
                            लीन हो गये ।
   

Friday, 10 April 2015

प्रभू श्रीराम के चरणों में शबरी की अनन्य भक्ति ,( श्रीराम चरित मानस ) ।

ताहि देइ  गति राम उदारा । शबरी कें आश्रम पंगु धारा ।।
शबरी देखि राम गृहँ आए । मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ।।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला । जटा मुकुट सिर उर बनमाला ।।
स्याम ग़ौर सुंदर दोउ भाई । शबरी परी चरन लपटाई ।।
प्रेम मगन मुख बचन न आवा । पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ।।
सादर जल लै चरन पखारे ।   पुनि सुंदर आसन बैठारे ।।
         
              कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि ।
               प्रेम  सहित प्रभु  खाए   बारंबार    बखानि ।।

  पानि जोरि आगे भइ  ठाढी । प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ।।
  केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी । अधम जाति मैं जड़मति भारी ।।
  अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ।।
  कह रघुपति सुनु भामिनि बाता ।    मानउँ एक भगति कर नाता ।।
    जाति पाँति कुल  धर्म बड़ाई  ।  धन बल परिजन गुन चतुराई ।।
       भगति हीन नर सोहइ कैसा ।  बिनु  जल बारिद देखिअ जैसा ।।