Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Tuesday, 29 December 2015

GovindDamodarStotram(गोविन्ददामोदरस्तोत्रम्।)



अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां
दु:शासने-नाहृत - वस्त्र -केशा।
कृष्णा  तदाक्रोशदनन्यनाथा
गोविन्द  दामोदर  माधवेति  ।।

(जब कौरव और पाण्डवों के सामने दु:शासन ने द्रौपदी के वस्त्र और बालों को पकड़ कर खींचा, तब अनन्य अनाथ द्रौपदी ने रोकर पुकारा -- 'हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव!--

श्रीकृष्ण  विष्णो  मधुकैटभारे
भक्तानुकम्पिन्  भगवन्  मुरारे ।
त्रायस्व  मां  केशव  लोकनाथा
गोविन्द  दामोदर  माधवेति    ।।

 (हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधुकैटभ को मारने वाले ! हे भक्तों के ऊपर अकारण अनुकम्पा करने वाले ! हे मुरारे ! हे केशव ! हे लोकेश्वर ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।)

ध्येय:  सदा  योगिभिरप्रमेय-
श्चिन्ताहरश्चिन्तिपारिजात: ।
कस्तूरिका - कल्पित - नीलवर्णो
  गोविन्द   दामोदर   माधवेति  ।।

( योगी भी जिन्हें ठीक - ठीक नहीं जान पाते , जो सभी प्रकार की चिन्ताओं को हरने वाले और मनोवांछित वस्तुओं को देने के लिये कल्पवृक्ष के समान हैं तथा जिनके शरीर का वर्ण कस्तूरी के समान नीला है, उन्हें सदा ही 'गोविन्द '! दामोदर ! माधव ! इन नामों से स्मरण करना चाहिये।

संसारकूपे   पतितोअत्यगाधे
मोहान्धपूर्णे   विषयाभितप्ते  ।
करावलम्बं  मम  देहि  विष्णो
गोविन्द  दामोदर   माधवेति  ।।

( जो मोहरूपी अंधकार से व्याप्त और विषयों की ज्वाला से संतप्त है , ऐसे अथाह संसार रूप कूप में मैं पड़ा हुआ हूँ। हे मधूसूदन !हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।)

त्वामेव  याचे  मम  देहि  जिह्वे
 समागते  दण्डधरे   कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं   मधुरं   सुभक्त्या
 गोविन्द  दामोदर   माधवेति  ।।

( हे जिह्वे ! मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूँ , तूही मुझे दे ।वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अंत करने आवें तो बड़े       ही प्रेम से गदगद् स्वर में ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !' इन मन्जुल नामों का उच्चारण करती रहना।)

भजस्व  मन्त्रं  भवबन्धमुक्त्यै 
जिह्वे  रसज्ञे  सुलभं  मनोज्ञम् ।
द्वैपायनाद्यैर्मुनिभि:    प्रजप्तं
गोविन्द   दामोदर    माधवेति ।।

 ( हे जिह्वे ! हे रसज्ञे ! संसाररूपी बंधन को काटने के लिये तू सर्वदा ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ' इन नामरूपी मन्त्र का जप किया कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और जिसे व्यास , वसिष्ठादि  ऋषियों ने भी जपा है।)

गोपाल   वंशीधर   रूपसिन्धो
लोकेश   नारायण  दीनबन्धो ।
उच्चस्वरैस्त्वं   वद    सर्वदैव 
गोविन्द    दामोदर   माधवेति ।।

( रे जिह्वे ! तू निरन्तर ' गोपाल !  वंशीधर ! रूपसिन्धो ! लोकेश ! नारायण ! दीनबंधो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन नामों का उच्च स्वर से कीर्तन किया करती रहना।

जिह्वे  सदैवं  भज  सुन्दराणि
नामानि  कृष्णस्य  मनोहराणि।
समस्त - भक्तार्ति  विनाशनानि
गोविन्द   दामोदर   माधवेति  ।।

( हे जिह्वे ! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन मनोहर मंजुल नामों को , जो भक्तों के संकटों की निवृत्ति करने वाले हैं, भजती रह।)

गोविन्द  गोविन्द  हरे  मुरारे
गोविन्द  गोविन्द  मुकुन्द  कृष्ण।
गोविन्द  गोविन्द   रथांड़्गपाणे
गोविन्द    दामोदर    माधवेति  ।।

 (हे जिह्वे ! ' गोविन्द ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! गोविन्द ! गोविन्द ! मुकुन्द ! कृष्ण ! गोविन्द ! गोविन्द ! रथाड़्गपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव! ' इन नामों को तू सदा जपती रह ।)

सुखावसाने  त्विदमेव  सारं
दु:खावसाने  त्विदमेव  गेयम्।
देहावसाने  त्विदमेव  जाप्यं 
गोविन्द  दामोदर   माधवेति ।।

(सुख के अंत में यही सार है अर्थात् सभी सुख इसी नाम में समाहित हैं।दु:ख के अंत में यही गाने योग्य है और शरीर का अंत होने के समय भी ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! यही मन्त्र जपने योग्य है।)

दुर्वारवाक्यं  परिगृह्य  कृष्णा 
मृगीव  भीता  तु  कथं  कथंचित।
 सभां   प्रविष्टा   मनसाजुहाव 
गोविन्द    दामोदर   माधवेति  ।।

( दु:शासन के दुर्वचनों को स्वीकार कर मृगी के समान भयभीत हुई द्रौपदी किसी तरह सभा में प्रवेश कर स्वयं को अनाथ मानती हुई मन ही मन ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इस प्रकार भगवान का स्मरण करने लगी ।)

श्रीकृष्ण   राधावर   गोकुलेश
गोपाल  गोवर्धन  नाथ  विष्णो । 
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
 गोविन्द   दामोदर    माधवेति ।।

( हे जिह्वे ! तू ' श्रीकृष्ण ! राधारमण ! व्रजराज ! गोपाल ! गोवर्धन ! नाथ ! विष्णो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ---इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह।)

श्रीनाथ   विश्वेश्वर   विश्वमूर्ते
श्रीदेवकीनन्दन       दैत्यशत्रो  ।
जिह्वे       पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर     माधवेति ।।

( हे जिह्वे ! तू  ' श्रीनाथ ! सर्वेश्वर ! श्रीविष्णु स्वरूप देवकीनन्दन ! असुर निकन्दन ! गोविन्द ! दामोदर !  माधव ! इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह। ) 

गोपीपते   कंसरिपो   मुकुन्द
लक्ष्मीपते   केशव    वासुदेव। 
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर    माधवेति    ।।

( हे जिह्वे ! तू ' गोपीपते ! कंसरिपो ( कंस का संहार करने वाले ) ! मुकुन्द ! लक्ष्मीपते ! केशव ! वासुदेव ! गोविन्द ! माधव ! ' --- इन नामामृत का निरंतर पान करती रह।) 

गोपीजनाह्लादकर          व्रजेश
गोचारणा- रण्य - कृत - प्रवेश ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर     माधवेति ।।

( व्रजराज, व्रजांगनाओं को आनन्दित करने वाले , जिन्होंने गौओं को चराने के लिये वन में प्रवेश किया, हे जिह्वे ! तू उन्हीं मुरारी के गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' --- इन नामामृत का निरन्तर पान कर। ) 

प्राणेश   विश्वम्भर   कैटभारे
वैकुण्ठ    नारायण    चक्रपाणे ।
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर     माधवेति।।

( हे जिह्वे ! तू ' प्राणेश ! विश्वम्भर ! कैटभारे ! वैकुण्ठ ! नारायण ! चक्रपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !--- इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह ।)

हरे   मुरारे     मधुसूदनाद्य
श्रीराम      सीतावर    रावणारे ।
जिह्वे           पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति ।।

( ' हे हरे ! हे मुरारे ! हे मधुसूदन ! हे पुराणपुरुषोत्तम ! हे रावणारे ! हे सीतापते श्रीराम ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! --- इन नामामृत का हे जिह्वे ! तू निरन्तर पान करती रह ।)' 

श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष
गोगोपगोपीसुखदानदक्ष। 
जिह्वे    पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर  माधवेति।।

( हे जिह्वे ! ' श्रीयदुकुलनाथ ! गिरिधर ! कमलनयन ! गो, गोप और गोपियों को सुख देने में कुशल श्रीगोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह ।) 

धरा- भरोत्तारण - गोप - वेश
विहारलीला - कृतबन्धुशेष   ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति  ।।

( जिन्होंने पृथ्वी का भार उतारने के लिये सुन्दर ग्वाला का रूप धारण किया है और आनन्दमयी लीला करने के निमित्त ही शेषजी (बलराम ) को अपना भाई बनाया है , ऐसे उन नटवर नागर के गोविन्द' ! दामोदर ! माधव ! ' - इस नामामृत का तू निरन्तर पान करती रह ।) 

बकी - बकाघासुर - धेनुकारे
केशी -  तृणावर्तविघातदक्ष  ।
जिह्वे       पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर   माधवेति ।।

( जो  पूतना , बकासुर ,अघासुर , और धेनुकासुर , आदि राक्षसों के शत्रु हैं और केशी तथा तृणावर्त  को पछाड़ने वाले हैं , हे जिह्वे!उन असुरारि मुरारि के 'गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' -- इन नामामृत का तू निरन्तर पान करती रह ।) 

श्रीजानकीजीवन      रामचन्द्र
निशाचरारे          भरताग्रजेश।
 जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द       दामोदर     माधवेति ।।

( ' हे जानकीजीवन भगवान राम ! हे दैत्यदलन भरताग्रज ! हे ईश ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ' - इन नामामृत का हे जिह्वे ! तू निरन्तर पान करती रह।)

नारायणानन्त    हरे   नृसिंह
प्रह्लादबाधाहर    हे    कृपालो।
जिह्वे         पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति।।

(' हे प्रह्लाद की बाधा हरने वाले दयामय नृसिंह ! नारायण ! अनन्त ! हरे  ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का हे जिह्वे ! तू हमेशा पान करती रह।' )

लीला - मनुष्याकृति - रामरूप
प्रताप - दासी - कृत - सर्वभूप ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द    दामोदर      माधवेति ।।

(' हे जिह्वे ! जिन्होंने लीला ही से मनुष्यों की सी आकृति बनाकर रामरूप प्रकट किया है और अपने प्रबल पराक्रम से सभी भूपों को दास बना लिया है , तू उन नीलाम्बुज श्यामसुन्दर श्रीराम के ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! - इस नामामृत का ही निरन्तर पान करती रह ।' ) 

श्रीकृष्ण    गोविन्द   हरे   मुरारे
हे नाथ   नारायण     वासुदेव   ।
जिह्वे           पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति ।।

( ' हे जिह्वे ! तू ' श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का निरन्तर पान करती रह।' )

वक्तुंसमर्थोअपि न वक्ति कश्चि दहो
जाननां         व्यसनाभिमुख्यम्   ।
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति  ।।

(' अहो ! मनुष्यों की विषयलोलुपता कैसी आश्चर्यजनक है ! कोई - कोई तो बोलने में समर्थ होने पर भी भगवान नाम का उच्चारण  नहीं करते , किन्तु हे जिह्वे ! मैं तुमसे कहता हूँ , तू ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का प्रेमपूर्वक निरन्तर पान करती रह।')






Saturday, 26 December 2015

Maiya Mohi Daoo Bahut Khijayau.(मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायौ।) सूरदासजी के पद ।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि रिस के मारैं , खेलन हौं नहिं जात ।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता , को है तेरौ तात  ।।
गोरे नंद  जसोदा  गोरी , तू कत स्यामल गात  ।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत , हँसत , सबै मुसुकात।।
तू मोही कौं मारन सीखी , दाउहि कबहुँ न खीझै ।
मोहन मुख रिस की ये बातैं , जसुमति सुनि-सुनि रीझै।।
सुनहु कान्ह , बलभद्र चबाई , जनमत ही कौ धूत ।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं , हौं माता तू पूत ।।

(श्यामसुन्दर कहते हैं------ )' मैया! दाऊ दादा ने मुझे बहुत चिढ़ायाहै। मुझसे कहते हैं---तू मोल लिया हुआ है, यशोदा मैया ने भला, तुझे कब जन्म दिया।' क्या करूँ, इसी क्रोध के मारे मैं खेलने नहीं जाता।वे बार-बार कहते हैं --तेरी माता कौन है? तेरे पिता कौन हैं? नन्दबाबा तो गोरे हैं, यशोदा मैया भी गोरी हैं, तू साँवले अंगवाला कैसे है?'चुटकी देकर ग्वाल-बाल मुझे नचाते हैं,फिर सब हँसते और मुस्कुराते हैं। मैया से कहते हैं-तूने तो मुझे ही मारना सीखा है, दाऊ दादा को कभी नहीं डाँटती।' सूरदासजी कहते हैं----मोहन के मुख से क्रोध भरी बातें बार-बार सुनकर यशोदाजी मन ही मन प्रसन्न हो रही हैं। वे कहती हैं--' कन्हाई ' ! सुनो, बलराम तो चुगलखोर है, वह जन्म से ही धूर्त है, श्यामसुन्दर मुझे गोधन ( गायों ) की शपथ, मैं तुम्हारी माता हूँ और तुम मेरे पुत्र हो।'

Tuesday, 22 December 2015

ShriKrishna aur RukminiJi Ka Vivah.



कुण्डिनपुर के राजा भीष्मक अपनी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्री कृष्ण से करना चाहते थे, परन्तु उनका बड़ा पुत्र रुक्मी श्रीकृष्ण का विरोधी था। वह शिशुपाल से अपनी बहिन रुक्मिणी का विवाह करना चाहता था।रुक्मिणीजी  मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकि थी।रुक्मी के हठ के कारण राजा भीष्मक ने शिशुपाल से ही अपनी कन्या का विवाह निश्चित करके शिशुपाल के यहाँ निमन्त्रण भेज दिया।रुक्मिणीजी को लगा अब शिशुपाल से उनकी शादी निश्चित हो जायेगी,तो उन्होंने पत्र लिखकर संदेश एक ब्राह्मण के द्धारा भेजा। रुक्मिणी का पत्र पाकर श्रीकृष्ण उन्का हरण करने रथ में कुण्डिनपुर जा पहुँचे।पीछे से बलरामजी भी बड़ी सेना साथ लेकर कुण्डिनपुर पहुँच गये।शिशुपाल भी अपनी बारात लेकर वहाँ पहुँच गया।विवाह से एक दिन पहले रुक्मिणीजी अपनी सखियों के साथ गौरी-पूजन के लिए मंदिर अाई और श्रीकृष्ण ने वहीं से रुक्मिणीजी का हरण कर लिया और द्वारका अपने रथ में बैठा कर ले आए।शिशुपाल के सहायक राजाओं तथा रुक्मी के सेनाओं ने कृष्ण तथा बलरामजी के सेनाओं के साथ युद्ध किया, लेकिन बलरामजी के द्वारा हारकर सभी को वापस कुण्डिनपुर लौटना पड़ा।द्वारका पहुँचकर श्रीकृष्णजी ने रुक्मिणीजी के साथ विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया।

Tuesday, 15 December 2015

Shri Ram Katha (Short version )





 मंगल  भवन  अमंगल   हारी ।
द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी ।।

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाड़्ग  सीतासमारोपितवामभागम् ।
  पाणौ  महासायकचारूचापं नमामि   रामं  रघुवंशनाथम् ।।

रामायण प्रभु श्रीराम की कथा है, जिन्हें श्रवण करने से या पाठ करने से पाप ताप संताप (त्रयताप ) का नाश होता है।रामायण को राम रूप भी कहा गया है।रामायण में सात काण्ड हैं। ये सात काण्ड सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजी की भक्ति को प्राप्त करने के मार्ग हैं।जिस पर श्रीहरि की अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्ग पर पैर रखता है।

बाल काण्ड-----रामायण का प्रथम अध्याय बालकाण्ड है ।प्रभु श्रीराम के चरण समान हैं।जहाँ प्रभु के चरण पड़ते हैं, वहाँ जय जयकार होती है।बालक के समान निश्छल, निष्कपट तथा अभिमान रहित जिसका मन है अर्थात जिसका मन सरल है, वही प्रभु को पा सकता है।प्रभु ने रामायण में स्वयं कहा है-----निर्मल मन जन सो मोहे पावा। मोहे कपट छल छिद्र न भावा ।।
     

अयोध्याकाण्ड----- श्रीराम का अवतार अयोध्या में हुआ।अयोध्या का अर्थ है न  युद्धा भवति अर्थात जहाँ युद्ध न हो।जैसे राम सबसे प्रेम करते हैं, यदि हम भी इसी तरह सबसे प्रेम करें तो प्रभु श्रीराम जैसे अयोध्या में प्रकट हुए वैसे ही हमारे अंदर भी प्रकट होंगे।अपना सर्वस्व प्रभु के चरणों में अर्पित कर हमें प्रेमपूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए।

अरण्यकाण्ड ---------अरण्यकाण्ड में प्रभु श्रीराम ने अयोध्या के महल तथा वहाँ का वैभव का त्याग कर वन गमन किया।मन में सन्यास धारण किया। पिता की आज्ञा से उन्होंने चौदह वर्षों तक का वनवास स्वीकार किया।वन जाते समय उनके मुख पर कोई दु:ख नहीं था ।श्रीराम तो पिता के वचन का मान रख रहे थे। मन से सन्यासी प्रभु श्री राम के चरणों में हमें भी उनकी भक्ति के सिवा और कोई इच्छा नहीं होनी चाहिये। माया मोह स्वार्थ लोभ अहंकार को तजकर अपना सर्वस्व प्रभु को समर्पित कर उनकी शरण ग्रहण करना चाहिये।

वनवासी सीताराम को, लक्ष्मण सहित प्रणाम ।
जिनके सुमिरन भजन से , होत सफल सब काम ।।

किष्किन्धाकान्ड --------किष्किन्धाकाण्ड जहाँ प्रभु श्रीराम की मुलाकात हनुमान से हुई।हनुमान ने सुग्रीव को प्रभु से मिलाया तथा सुग्रीव का दु:ख मिटाया था।किष्किन्धाकाण्ड प्रभु का कंठ स्वरूप है।प्रभु जिसे अपना जानकर गले से लगा लेते हैं,उसके सारे दु:ख दूर कर, जन्म मरण के चक्र से भी मुक्त कर देते हैं।

हनुमान सुसंयम ब्रह्मचारी, प्रभु को निज पीठ पर बिठाया था ।
राम सुकंठ पास पहुँचाय उनको, सुग्रीव का दु:ख मिटाया था ।।

सुन्दरकाण्ड -------सुन्दरकाण्ड का रहस्य है , हनुमान जी के तरह सुन्दर और निर्मल हृदय बनें ,हनुमान जैसे हृदय में सीता रामजी को धारण करते हैं, हर पल हर क्षण सुमिरन करते रहते हैं , वैसे ही हमें भी प्रभु को अपने मन मंदिर मे बिठाकर उनका सुमिरन करते रहना चाहिये।सुन्दरकाण्ड मे हनुमानजी की लीलाओं का वर्णन है। राम चरित मानस का पाठ करने से प्रभु श्रीरामजी के साथ- साथ हनुमानजी भी प्रसन्न होते हैं।

सुन्दरकाण्ड रामायण का सबसे सुन्दर काण्ड।
पढ़े सुने जो सादर सदा , पाप ताप हो नाश ।।
सुन्दर श्री हनुमान के , सुन्दर ही सब खेल ।
पावन सीता राम का ,  करवाते हैं  मेल    ।।

लंकाकाण्ड --------लंकाकाण्ड में प्रभु श्रीराम ने रावण का वध कर समस्त संसार को सुखी किया । रावण अर्थात काम, क्रोध, मोह तथा अहंकार का नाश कर शांति स्थापित किया।रावण मोह रूपी अविद्या का नाम है जो हर मनुष्य के अंदर है।इसे समाप्त किये बिना सच्ची शांति नहीं मिल सकती है।

उत्तरकाण्ड-------प्रभु श्रीराम ने रावण का संहार कर राम राज्य स्थापित किया । जब मन से सारे विकार दूर हो जाते हैं तभी ज्ञान तथा भक्ति का प्रकाश उदित होता है और जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों एक स्वरूप होते हैं।

   दोहा-       राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
                  भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ।।

जो श्रीरामजी के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्ष पद चाहता हो , वह इस कथारूपी अमृत को  प्रेम पूर्वक अपने कान रूपी दोने से                             पिये ।जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्रीरामजी का यह चरित्र कहते हैं , सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजी के परम धाम को चले जाते हैं।

Dhanyawad Prabhu (Prayer)


धन्यवाद प्रभु तुमने हमको ,
अपना ये अंश स्वीकार किया।

आकार दिया, प्रकार दिया
मन वाणी और विचार दिया,
अपनी इस पावन सृष्टि में,
लाकर जीवन साकार किया।

धन्यवाद प्रभु तुमने हमको,
अपने जैसे पितु मात दिये 
कुटुम्ब दिया, भोजन भी दिया ,
ममता और प्रीत अपार दिया ,
जलवायु ,अग्नि ,साधन से 
पोषित करके निर्माण किया।

धन्यवाद प्रभु तुमने हमको,
सदगुरू का आशीर्वाद दिया,
सत्य दिया और ज्ञान दिया,
तुम तक आने का मार्ग दिया,
जिनकी करूणा की छाँव ने ,
हर भाँति से कल्याण किया ।
धन्यवाद प्रभु तुमने हमको,
अपना ये अंश स्वीकार किया।



(Kanupriya)


Sunday, 29 November 2015

गोस्वामी तुलसीदासजी की संक्षिप्त जीवनी।

प्रयाग के पास चित्रकूट जिले में राजापुर नामक एक ग्राम है, वहाँ आत्माराम दूबे नाम के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे।उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी देवी था।संवत् १५५४ की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में इन्हीं भाग्यवान् दंपति के यहाँ बारह महीने तक गर्भ में रहने के पश्चात् गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म हुआ।जन्मते समय बालक तुलसीदास रोये नहीं,किन्तु उनके मुख से 'राम ' का शब्द निकला।उनके मुख में बत्तीसों दाँत मौजूद थे।उनका डील-डौल पाँच वर्ष के बालक के तरह था।इस प्रकार के अद्भुत बालक को देखकर पिता अमंगल की शंका से भयभीत हो गये और बालक के सम्बन्ध में कई प्रकार की कल्पनाएँ करने लगे।माता हुलसी को यह देखकर बड़ी चिन्ता हुई।उन्होंने बालक के अनिष्ट की आशंका से दशमी की रात को नवजात शिशु को अपनी दासी के साथ उसके ससुराल भेज दिया,और दूसरे दिन स्वयं इस संसार से चल बसीं।दासी ने , जिसका नाम चुनियाँ था, बड़े प्रेम से बालक का पालन-पोषण किया।जब तुलसीदास लगभग साढ़े पाँच वर्ष के हुए , चुनियाँ का भी देहान्त हो गया।बालक तुलसीदास अनाथ हो गये।वे द्वार-द्वार भटकने लगे।इस पर जगज्जननी पार्वती को उस होनहार बालक पर दया आयी।वे ब्राह्मणी का वेष धारण कर प्रतिदिन उसके पास जातीं और उसे अपने हाथों से भोजन करा जातीं।

                     इधर भगवान शंकरजी की प्रेरणा से रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्दजी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्दजी ने इस बालक को ढूँढ़ निकाला और उसका नाम रामबोला रखा।उसे वे अयोध्या ले गये और वहाँ संवत् १५६१ माघ शुक्ला पंचमी शुक्रवार को उनका यज्ञोपवीत-संस्कार कराया।बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मंत्र का उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये।इसके बाद नरहरि स्वामी ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके रामबोला को राममंत्र की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे।बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी।एक बार गुरूमख से जो सुन लेते थे, उन्हें वह कंठस्थ हो जाता था।वहाँ से कुछ दिन बाद गुरू - शिष्य दोनों शूकर क्षेत्र ( सोरों ) पहुँचे। वहाँ श्रीनरहरिजी ने तुलसीदास को रामचरित सुनाया। कुछ दिन बाद वे काशी चले आए।काशी में शेषसनातनजी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद - वेदांग का अध्ययन किया। इधर उनकी लोकवासना कुछ जाग्रत हो उठी और अपने विद्यागुरू से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि को लौट आये।वहाँ आकर उन्होंने देखा कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। उन्होंने विधिपूर्वक अपने पिता आदि का श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगों को भगवान् राम की कथा सुनाने लगे ।

                   संवत् १५८३ ज्येष्ठ शुक्ला १३ गुरूवार को भारद्वाज गोत्र की एक सुन्दर कन्या के साथ उनका विवाह हुआ और वे सुखपूर्वक  अपनी नवविवाहिता वधू के साथ रहने लगे।एक बार उनकी पत्नी अपने भाई के साथ मायके चली गयी।तुलसीदासजी भी पीछे-पीछे वहाँ जा पहुँचे। उनकी पत्नी ने उन्हें इसपर बहुत धिक्कारा और कहा कि ' मेरे इस हार - मांस के शरीर में जितनी तुम्हारी आसक्ति है , उससे आधी भी यदि भगवान् में होती तो तुम्हारा बेड़ा पार हो गया होता।'

                    तुलसीदासजी को ये शब्द लग गये।वे एक क्षण भी नहीं रुके, तुरंत वहाँ से चल दिये।
वहाँ से चलकर तुलसीदासजी प्रयाग आये।वहाँ उन्होंने गृहस्थ वेष का परित्याग कर साधु वेष ग्रहण किया। फिर तीर्थाटन करते हुए काशी पहुँचे।मानसरोवर के पास उन्हें काकभुशुण्डिजी के दर्शन हुए।

                        काशी में तुलसीदासजी रामकथा कहने लगे।वहाँ उन्हें एकदिन एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमानजी का पता बतलाया। हनुमानजी से मिलकर तुलसीदासजी ने उनसे श्रीरघुनाथजी का दर्शन कराने की प्रार्थना की।हनुमान् जी ने कहा , ' तुम्हें चित्रकूट में रघुनाथजी के दर्शन होंगे।' इसलिये तुलसीदासजी चित्रकूट की ओर चल पड़े।

                       चित्रकूट पहुँच कर रामघाट पर उन्होंने अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिना करने निकले थे, कि मार्ग में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-वाण लिए जा रहे हैं।तुलसीदासजी उन्हें देखकर मुग्ध हो गए, परन्तु उन्हें पहचान न सके।पीछे से हनुमान् जी ने आकर उन्हें सारा भेद बताया तो  वे बड़ा पश्चाताप करने लगे। हनुमान् जी ने उन्हें सान्त्वना दी और कहा प्रात: काल फिर दर्शन होंगे।

              संवत्  १६०७ की मौनी अमावस्या वुधबार के दिन उनके सामने भगवान् श्रीराम पुन: प्रकट हुए। श्रीरामजी बालक रूप में तुलसीदासजी से कहने लगे---बाबा! हमें चन्दन दो। हनुमानजी ने सोचा, वे इस बार भी न धोखा खा जायँ, इसलिये तोते का रूप धारण कर के यह दोहा कहा -----

                            चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर ।
                            तुलसीदास चंदन घिसें  तिलक देत रघुवीर ।।

तुलसीदासजी उस अद्भुत छवि को निहारकर शरीर की सुधि भूल गये।भगवान ने अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदासजी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गये।

संवत् १६०२८ में ये हनुमानजी की आज्ञा से अयोध्या की ओर चल पड़े।उन दिनों प्रयाग में माघ मेला था।वहाँ कुछ दिन वे ठहर गये।पर्व के छ: दिन बाद एक वटवृक्ष के नीचे उन्हें भरद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हुये। वहाँ उस समय वही कथा हो रही थी,जो उन्होंने सूकरक्षेत्र में अपने गुरू से सुनी थी।वहाँ से वे काशी चले आये और वहाँ प्रह्लादघाट पर एक ब्राह्मण के घर निवास किया।वहाँ उनके अंदर कवित्वशक्ति का स्फुरण हुआ और वे संस्कृत में पद्य-रचना करने लगे।दिन में वे जितने पद्य की रचना करते, रात्रि में वे सारी रचना लुप्त हो जाते।यह घटना रोज घटती।आठवें दिन तुलसीदासजी को स्वप्न हुआ।भगवान् शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में काव्य - रचना करो।तुलसीदासजी की नींद उचट गई।वे उठ कर बैठ गये।उसी समय भगवान् शिव और पार्वतीजी उनके सामने प्रकट हुए।तुलसीदासजी ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।शिवजी ने कहा---' तुम अयोध्या मे जाकर रहो और हिन्दी में काव्य-रचना करो।मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फलवती होगी।' इतना कहकर श्री गौरीशंकर अन्तर्धान हो गये।तुलसीदासजी उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर काशी से अयोध्या चले आये।

     संवत्  १६३१ का प्रारंभ हुआ। उस साल रामनवमी के दिन प्राय: वैसा ही योग था जैसा त्रेतायुग में रामजन्म के दिन था। उस दिन प्रात: काल श्रीतुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारंभ की।दो वर्ष, सात महीने,छब्बीस दिन में ग्रंथ समाप्ति हुई।संवत्  १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

इसके बाद भगवान की आज्ञा से तुलसीदासजी काशी चले आये।वहाँ उन्होंने भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को श्रीरामचरितमानस सुनाया। रात को पुस्तक श्रीविश्वनाथजी के मन्दिर में रख दी गयी।सबेरे जब पट खोला गया तो उसपर लिखा हुआ पाया गया -------' सत्यं शिवम् सुन्दरम् '। और नीचे भगवान शंकर की सही थी।उस समय उपस्थित लोगों ने ' सत्यं शिवम् सन्दरम् ' की आवाज भी कानों से सुनी।

इधर पंडितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई।वे दल बाँधकर तुलसीदासजी की निन्दा करने लगे और उस पुस्तक को भी नष्ट कर देने का प्रयाश करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भी भेजे।चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदासजी की कुटी के आस-पास दो वीर धनुष बाण लेकर पहरा दे रहे हैं।वे बड़े ही सुन्दर श्याम और गौर वर्ण के थे।उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गई।उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भजन में लग गये।

तुलसीदासजी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा सामान लुटा दिया, और पुस्तक अपने मित्र टोडरमल के यहाँ रखवा दिया।इसके बाद उन्होंने एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की जाने लगीं।पुस्तक का प्रचार दिनोंदिन बढ़ने लगा।

इधर पंडितों ने और कोई उपाय न देख श्रीमधुसूदन सरस्वतीजी को उस पुस्तक को देखने की प्रेरणा की। श्रीमधुसूदन सरस्वतीजी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उसपर यह सम्मति लिख दी-------

           '   इस काशी रूपी आनंदवन में तुलसीदासजी चलता-फिरता तुलसी का पौधा हैं।उनकी कविता रूपी मंजरी बड़ी ही सुंदर है , जिसपर राम रूपी भँवरा सदा मँडराया करता है।'

पंडितों को इस पर भी संतोष नहीं हुआ।तब पुस्तक की परीक्षा का एक उपाय और सोंचा गया।भगवान विश्वनाथ के सामने सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र , शास्त्रों के नीचे पुराण और सबसे नीचे रामचरितमानस रख दिया गया।मंदिर बंद कर दिया गया।प्रात:काल जब मन्दिर खोला गया तो लोगों ने देखा कि श्रीरामचरितामानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है।अब तो पंडित लोग बड़े लज्जित हुए।उन्होंने तुलसीदासजी से क्षमा माँगी और भक्ति से उनका चरणोंदक लिया।

तुलसीदासजी अब असीघाट पर रहने लगे।रात को एक दिन कलियुग मूर्तरूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें त्रास देने लगा।गोस्वामीजी ने हनुमान् जी का ध्यान किया।हनुमान् जी ने उन्हें विनय के पद रचने को कहा , इसपर गोस्वामीजी ने विनय पत्रिका लिखा और भगवान् के चरणों में उसे समर्पित कर दिया।श्रीराम ने उसपर अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदासजी को निर्भय कर दिया।

        संवत्  १६८०  श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को असीघाट पर गोस्वामीजी ने राम-राम कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया।

Thursday, 19 November 2015

भेद नहीं करता मेरा कान्हा, है परखता भाव ही।

भेद नहीं करता मेरा कान्हा, है परखता भाव ही ।

जिस हाथ से माखन खाया, उस हाथ से ही तूने माटी भी ,
जिस स्वाद से छप्पन भोग लिये, उसी स्वाद से साग और रोटी भी ,
जिस मौज से खेले ग्वाले संग , उसी मौज से मारे असुर को भी ,
भेद नहीं करता मेरा कान्हा , है परखता भाव ही।

जैसा मान दिया यशोदा माँ को , वैसे ही देवकी माँ को भी ,
जिस प्रेम से ब्याहा राधे संग, उसी प्रेम से वर ली मीरा भी ,
जैसे हृदय से लगाया पार्थ को, वैसे ही मित्र सुदामा भी ।
भेद नहीं करता मेरा कान्हा, है  परखता भाव ही ।

जिस शान से बैठे थे रथ पे, वैसे ही चराई गैया भी।
जिस शान्त चित्त से निकुंज बसे , वैसे ही रणभूमि मे भी,
जो मोक्ष दिया पांडव सेना को , वही कुरू सेना को भी ।
भेद नहीं करता मेरा कान्हा , है परखता भाव ही ।


(Kanupriya)

Tuesday, 3 November 2015

Yashoda Tori Bhagya Ki Kahi Na Jaye.(यशोदा तोरी भाग्य की कही न जाए )

  

अहा भाग्य की कहि न जाई ।
यशोदा तोरी भाग्य की कहि न जाई।

जो मूरत ब्रह्मादिक , मुनि दुर्लभ ,
सो प्रगटे हैं आई ,भाग्य की कहि न जाई ।
यशोदा तोरी भाग्य की कहि न जाई ।

शिव नारद सनकादि महामुनि , मिलवे करत उपाई ।
ते नंदलाल धूलि धुसरित हैं  यशोदा कण्ठ लपटाई ।
 भाग्य की कहि न जाई ,यशोदा तोरी भाग्य की कहि न जाई ।

रत्न जटित पौढ़ाय पालने, मदन  देख मुसकाई।
झूलो मेरे लाल  , जाऊ बलिहारी, देखि देखि मुसकाई।
 परमानंद बलि जाई ,यशोदा तोरी भाग्य की कहि न जाई।
हाँ भाग्य की कहि न जाई।

Thursday, 29 October 2015

Karwa chauth Vrat Katha.

कार्तिक मास में कृष्णपक्ष के चतुर्थी को करवा चौथ मनाया जाता है।इस दिन गणेश जी का पूजन होता है ।इस दिन सुहागन स्त्रीयाँ अपने पति की लम्बी आयु के लिये व्रत रखती है।प्राचीन काल में द्विज नामक ब्राह्मण के सात पुत्र और एक पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था।वीरावती विवाह के बाद प्रथम बार करवा चौथ का व्रत कर रही थी।भूख प्यास से व्याकुल होने के कारन मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ी।बहन को इस अवस्था में देखकर वीरावती के भाइ परेशान होकर रोने लगे और जल से मुँह धुलवाकर, एक भाई वट के वृक्ष पर चढ़कर चलनी में दीपक दिखाकर बहन से कहा कि चन्द्रमा निकल आया है।बहन ने भी उस अग्निरूप को चन्द्रमा समझ कर अर्ध दे कर भोजन के लिये बैठी। पहले कौर में बाल निकला , दूसरे कौर में छींक हुई, तीसरे कौर में ससुराल से बुलावा आ गया।ससुराल जाने पर उसने देखा , उसका पति मृत पड़ा है ।बहन ने सोचा मैंने तो एेसा कोई अपराध नहीं किया, जिस पाप का दण्ड मुझे मिल रहा है।सारे संसार की नारियाँ आज अपने सुहाग की शुभ कामना तथा दीर्घायु के लिये पूजा कर रही हैं, और मेरे पति इस अवस्था में पड़े हैं।वीरावती विलाप करने लगी।तभी वहाँ इन्द्राणी आई ,विलाप करती हुई इरावती बोली हे माँ ! यह किस अपराध का मुझे दण्ड मिला। माँ ! मेरे पति को जीवित कर दो । माँ से उसने प्रार्थना करते हुये कहा। इन्द्राणी ने कहा कि तुमने करवा चौथ व्रत में बिना चाँद निकले चन्द्रमाँ को अर्ध दे दिया था , यह सब उसी के फल से हुआ है अत: अब तुम बारह माह के चौथ के व्रत व करवाचौथ व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ विधिपूर्वक करो तब तुम्हारा पति पुन: जीवित हो जायेगा।इन्द्राणी के वचन सुन वीरावती ने विधि पूर्वक बारह माह के चौथ तथा करवाचौथ व्रत को बड़ी भक्ति - भाव के साथ किया और इस व्रत के प्रभाव से वीरावती का पति पुन: जीवित हो उठा ।इस तरह करवाचौथ व्रत से  जैसे वीरावती के सुहाग  की रक्षा हुई , वैसे ही माता सभी स्त्रियों के सुहाग की रक्षा करें।

BhaiDooj Ki Katha ( yam Dwitia ) .

भगवान् सूर्यनारायण की पत्नी का नाम छाया था। उन्हीं की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था ।यमुना अपने भाई यमराज  से बड़ा स्नेह करती थी। वह भाई से हमेशा निवेदन करती थी कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करे। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ल द्वितीया का दिन आया । यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर उसे अपने घर आने के लिए वचनवद्ध कर लिया।

                    यमराज ने सोचा -- मैं तो प्राणों को हरने वाला हूँ । मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता है। बहिन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है , उसका पालन करना भी मेरा धर्म है। बहिन के घर आते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया।यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा।उसने स्नान तथा पूजा करके अनेक व्यंजन परोसकर भाई को भोजन कराया। यमुना द्वारा किये गये आतिथेय से यमराज ने प्रसन्न होकर बहिन को वर माँगने को कहा।यमुना ने कहा --- भद्र! आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो बहिन इस दिन अपने भाई को आदर - सत्कार करके टीका लगाए , उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह ली। इसी दिन से इस पर्व की परम्परा बनी।ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहिनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता है। इसलिये भैयादूज में यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।

   यदि बहिन अपने हाथ से भोजन बनाकर भाई को खिलाये , तो भाई की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। इस दिन बहिन के घर भोजन करने का विशेष महत्व है।बहिन सगी या रिस्ते में अथवा धर्म की भी हो सकती है।

इस पर्व का महत्व तथा लक्ष्य , बहिन - भाई के पावन सम्बन्ध तथा समाज में प्रेमभाव की स्थापना करना है।इस दिन बहिनें अपने भाईयों के स्वस्थ जीवन एवं दीर्घायु होने की कामनाकरती हैं।संसार में बहिन - भाईयों को प्रेम से रहते देखकर उनके पूर्वज तथा देवता सभी मिलकर उनको आशीर्वाद देते हैं। 

 

Wednesday, 28 October 2015

Ath Sapt Shloki Ma Durga Ke Siddh Mantra.

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जाहि  ।।१ ।। (आरोग्य और सौभाग्यकी प्राप्ति के लिए )

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:         ( दारिद्रयदु:खादिनाश के लिए )
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव  शुभां  ददासि ।
दारिद्रयदु:खभयहारिणी  का  त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय  सदार्द्रचित्ता ।।२ ।।

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।   ( सब प्रकार के कल्याण के लिए )
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते ।।३ ।।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।                  ( विपत्ति नाश  के लिए )
सर्वस्यार्तिहरे देवि  नारायणि नमोस्तु ते  ।।४ ।।

सर्वस्वरूपे  सर्वेशे  सर्वशक्तिसमन्विते ।           (भय - नाश के लिए मंत्र। )
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ।।५ ।।

रोगानशेषनपहंसि तुष्टा               ( रोग- नाश के लिए )
रूष्टातु कामान सकलानभीष्टान।
त्वाममश्रिताम न विपन्नाणाम्
त्वाममश्रितां ह्राश्रयतां प्रयान्ति ।।६ ।।

सर्वबाधाप्रशमनं  त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि  ।     ( बाधा - शांति के लिए )
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।७ ।।

इति सप्त श्लोकी दुर्गा सम्पूर्णम् ।।

Monday, 12 October 2015

Durga Maa Ki Stuti , Devyaparadhkshmapan Stotram. (देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् )



न  मन्त्रं  नो  यन्त्रं  तदपि च न जाने स्तुतिमहो:
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने  स्तुतिकथा ।
न  जाने  मुद्रास्ते  तदपि च  न  जाने  विलपनं
 परं  जाने  मातस्त्वदनुसरणं   क्लेशहरणम्   ।।१ ।।

हे मात: ! मैं तुम्हारा मन्त्र , यन्त्र , स्तुति , आवाहन , ध्यान स्तुतिकथा , मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता , परन्तु सब प्रकार के कलेशों को दूर करने वाला , आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ ।

विधेर ज्ञानेन  द्रविणविरहेणा लसतया
विधेया शक्यत्वात्तव  चरणयोर्या  च्युतिरभूत ।
तदेतत्  क्षन्तव्यं जननी सकलोद्धारिणि  शिवे 
कुपुत्रो  जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति  ।।२ ।।

सबका उद्धार करने वाली हे करूणामयी माता ! तुम्हारी पूजा की विधि न जानने के कारण, धनके अभाव में , आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण , तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ।

पृथिव्यां  पुत्रास्ते  जननि  बहव:  सन्ति  सरला: 
परं  तेषां  मध्ये  विरलतरलोअहं  तव  सुत:  ।
मदीयोयं  त्याग:  समुचितमिदं  नो  तव  शिवे 
कुपुत्रो  जायेत क्वचिदपि  कुमाता न  भवति   ।।३ ।।

माँ! भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेकों हैं पर उनमें एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे! मुझे त्याग देना तुम्हें उचित नहीं,क्योंकि पूत  तो  कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ।

जगन्मातार्मातस्तव  चरण सेवा न  रचिता 
न वा दत्तं देवी द्रविणमपि भूयस्तव  मया ।
तथापि  त्वं स्नेहं  मयि  निरूपमं  यत्प्रकुरुषे 
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति  ।।४ ।।

हे जगदम्ब ! हे माँ ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिये प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया , तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है कि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती।

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया ,
मयापंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि   ।
इदानीं चेन्मास्तव यदि कृपा नापि भविता ,
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ।। ५ ।।

हे गणेशजननि ! मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने पर विविध विधियों द्वारा पूजा करने से घबड़ा कर सब देवों को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊँ ?

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा ,
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटि कनकै:  ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं   , 
जन: को जानीते जननि जपनीयं जप विधौ  ।। ६ ।।

हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मन्त्राक्षरों के कान में पड़ते ही चाण्डाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बनकर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है , उसे कौन जान सकता है ?

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पपटधरो , 
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति: ।
कपाली भूतेशो भवति जगदीशैकपदवीं ,
भवानी त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटी फलमिदम् ।। ७ ।।

जो चिता का भस्म रमाये हैं , विष पीते हैं , दिगम्बर हैं , जटाजूट बाँधे हैं , गले में सर्पमाला है, हाथ में खप्पर लिए हैं , पशुपति और भूतों के स्वामी हैं , ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है , वह हे भवानी ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है।

न मोक्ष्याकांक्षा भवविभववाँक्षापि च न मे ,
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन: ।
अतस्त्वां  संयाचे जननि जननं यातु मम वै  , 
मृडानी रूद्राणी शिव शिव  भवानीति जपत: ।।८ ।।

हे चन्द्रमुखी माता ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है , सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है , विज्ञान तथा सुख की भी अभिलाषा नहीं है , इसलिए मैं तुमसे यही माँगता हूँ कि मेरी सारी आयु मृडानी , रूद्राणी , शिव - शिव , भवानी आदि नामों जपते- जपते ही बीते।

नाराधितासि विधिना विविधौपचारै: , 
किं रक्षचिन्तनपरैर्न कृतं  वचौभि:  ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्नाथे ,
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव   ।।९ ।।

हे श्यामे ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं की ।यही नहीं , इसके विपरीत अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या नहीं किया ? फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह उचित ही है, क्योंकि तुम मेरी माता हो ।

आपत्सु  मग्न:  स्मरणं  त्वदीयं ,
  करोमि  दुर्गे  करूणार्णेश       ।
नैतच्छठत्वं   मम      भावयेथा:  ,
क्षुदातुषार्ता  जननीं   स्मरन्ति    ।।१०  ।।

हे दुर्गे ! हे दयासागर महेश्वरी ! जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो केवल तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ , इसे मेरी धृष्टता न समझना माँ ! क्योंकि भूखे प्यासे बालक अपनी माँ को ही याद करते हैं।

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करूणास्ति चेन्मयि, ।
अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते  सुतम्  ।। ११ ।।

हे जगज्जनी ! मुझपर तुम्हारी पूर्ण कृपा है , इसमें आश्चर्य ही क्या है ? क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती।

मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि , 
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरू   ।। १२ ।।

हे महादेवि ! मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पापोंका नाश करने वाला नहीं है , यह जानकर जैसा उचित समझो , वैसा करो ।

       इति श्रीमच्छ़्ड़्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् ।





Sunday, 11 October 2015

Aarti Shri Ambe Jee Ki ( आरती श्री अम्बे जी की )

जय अम्बे गौरी , मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी ।। १।।जय अंबे

माँग सिन्दूर विराजत , टीको मृगमद को ।
उज्जवल से दोउ नैना , चन्द्रवदन नीको  ।।२ ।।जय अंबे

कनक समान कलेवर , रक्ताम्बर राजे  ।
रक्तपुष्प गल माला ,  कण्ठन पर साजे ।।३ ।।जय अंबे

केहरि वाहन राजत , खड़ग खप्पर धारी ।
सुर - नर - मुनि - जन सेवत , तिनके दुखहारी ।।४ ।। जय अंबे

कानन कुंडल शोभित , नासाग्रे मोती  ।
कोटिक चन्द्र दिवाकर - राजत सम ज्योति ।।५ ।। जय अंबे 

शुम्भ  निशुम्भ विडारे , महिषासुर - घाती  ।
धूम्रविलोचन  नैना   निशदिन   मदमाती  ।।६ ।। जय अंबे

चण्ड  मुण्ड  संहारे , शोणितबीज   हरे  ।
मधु  कैटभ  दोउ  मारे ,  सुर  भयहीन करे ।।७ ।। जय अंबे 

ब्रह्माणी  रुद्राणी ,  तुम  कमलारानी  ।
आगम -निगम - बखानी , तुम शिव -पटरानी ।।८ ।।जय अंबे

चौसठ योगिनी गावत ,  नृत्य करत  भैरूं। 
बाजत ताल मृदंगा,    और बाजत  डमरू ।।९ ।। जय अंबे

भुजा  अष्ट अति शोभित ,  वर मुद्रा धारी ।
मन वांछित फल पावत ,   सेवत नर - नारी ।।१० ।। जय अंबे 

तुम ही जग की माता , तुम ही हो भरता ।
भक्तन के दुख हरता , सुख सम्पत्ति करता ।।११ ।।

कंचन थाल विराजत , अगर  कपूर  बाती  ।
श्री मालकेतू में राजत , कोटि रतन ज्योति ।।१२ ।।जय अंबे

श्री अम्बेजी की आरती  जो कोई नित गावै ।
कहत शिवानन्द स्वामी ,  सुख सम्पति पावै ।।१३  ।। जय अंबे



Durga Maa Se Kshama Prarthana दुर्गा माँ से क्षमा प्रार्थना

आपत्सु  मग्न:  स्मरणं  त्वदीयं ।
करोमि  दुर्गे  करूणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं   मम   भावयेथा:  ।
क्षुधातृषार्ता   जननीं  स्मरन्ति  ।।

हे दुर्गे!  हे दयासागर  महेश्वरी !  जब  मैं किसी विपत्ति  में पड़ता हूँ , तो तुम्हारा ही  स्मरण करता हूँ । इसे तुम मेरी धृष्टता मत समझना , क्योंकि  भूखे - प्यासे बालक अपनी माँ को ही याद किया करते हैं ।

जगदम्ब   विचित्रमत्र  किं ,
परिपूर्णा  करूणास्ति  चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं  न   हि ।
माता  समुपेक्षते   सुतम्    ।।

हे जगज्जननी !  मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है , इसमें आश्चर्य ही क्या है?  क्योंकि  अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देतीं ।

मत्सम:  पातकी  नास्ति 
पापघ्नी  त्वत्समा न  हि ।
एवं  ज्ञात्वा   महादेवी  
यथा  योग्यं  तथा  कुरू  ।।

हे महादेवी ! मेरे समान कोई पापी नहीं है , और तुम्हारे समान कोई पाप का नाश करने वाला नहीं है , यह जानकर जैसा उचित समझो माँ! वैसा ही करो ।




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Durga Kavach (hindi translation) श्री दुर्गा कवचम् (हिन्दी अनुवाद के साथ )

।।ओम् नमश्चण्डिकायै ।।

मार्कण्डेय उवाच:

ओम् यद् गुह्यं परमं लोके
सर्वरक्षाकरं   नृणाम्   ।
यन्न    कस्यचिदाख्यातं
तन्मे ब्रूहि   पितामह ! ।।१ ।।।

मार्कण्डेय जी ने कहा है ---हे पितामह! जो साधन संसार में अत्यन्त गोपनीय है, जिनसे मनुष्य मात्र की रक्षा होती है, वह साधन मुझे बताइए ।
           ब्रह्मोवाच:

अस्ति गुह्यतमं विप्र !
सर्व-  भूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं
तच्छृणुष्व   महामुने ।।२ ।।

ब्रह्मा जी ने कहा --हे ब्राह्मन!  सम्पूर्ण प्राणियों का कल्याण करने वाला देवों का कवच ( रक्षा कवच ) यह स्तोत्र है,इनके पाठ करने से साधक सदैव सुरक्षित रहता  है, अत्यन्त गोपनीय है, हे महामुने! उसे सुनिए ।

प्रथमं  शैलपुत्री च , द्वितीयं  ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्दघण्टेति ,  कूष्माण्डेति  चतुर्थकम् ।।३ ।।

हे मुने ! दुर्गा माँ की नव शक्तियाँ हैं-----पहली शक्ति का नाम शैलपुत्री ( हिमालय कन्या पार्वती ) , दूसरी शक्ति का नाम ब्रह्मचारिणी (परब्रह्म परमात्मा को साक्षात कराने वाली ) , तीसरी शक्ति चन्द्रघण्टा हैं। चौथी शक्ति कूष्माण्डा ( सारा संसार जिनके उदर में निवास करता हो ) हैं।

पंचमं  स्कन्दमातेति , षष्ठं कात्यायनीति  च ।
सप्तमं   कालरात्रीति , महागौरीति  चाष्टमम् ।। ४ ।।

पाँचवीं शक्ति स्कन्दमाता ( कार्तिकेय की जननी ) हैं।छठी शक्ति कात्यायनी (महर्षि कात्यायन के अप्रतिभ तेज से उत्पन्न होने वाली) हैं सातवीं शक्ति कालरात्रि ( महाकाली ) तथा आठवीं शक्ति महागौरी हैं।

नवमं  सिद्धिदात्री , च  नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि  नामानि , ब्रह्मणैव महात्मना ।।५ ।।

नवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं और ये नव दुर्गा कही गई हैं।

अग्निना दह्यमानस्तु , शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव , भयार्ता: शरणं गता: ।।६ ।।

जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, युद्ध भूमि मे शत्रुओं से घिर गया हो तथा अत्यन्त कठिन विपत्ति में फँस गया हो, वह यदि भगवती दुर्गा की शरण का सहारा ले ले ।

न तेषां जायते , किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि , शोक-दु:ख भयं न हि ।।७ ।।

तो इसका कभी युद्ध या संकट में कोई कुछ विगाड़ नहीं सकता , उसे कोई विपत्ति घेर नहीं सकती न उसे शोक , दु:ख तथा भय की प्राप्ति ही हो सकती है।

यैस्तु भक्तया स्मृता नूनं , तेषां वृद्धि : प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि ! , रक्षसे तान्न  संशय: ।।८ ।।

जो लोग भक्तिपूर्वक भगवती का स्मरण करते हैं , उनका अभ्युदय होता रहता है। हे भगवती ! जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं , निश्चय ही तुम उनकी रक्षा करती हो।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा , वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा , वैष्णवी  गरूड़ासना   ।।९ ।।

चण्ड -मुण्ड का विनाश करने वाली देवी चामुण्डा प्रेत के वाहन पर निवास करती हैं ,वाराही महिष के आसन पर रहती हैं , ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है, वैष्नवी का वाहन गरुड़  है।

माहेश्वरी  वृषारूढ़ा ,  कौमारी शिखिवाहना  ।
लक्ष्मी:  पद्मासना देवी , पद्महस्ता  हरिप्रिया ।।१० ।।

माहेश्वरी बैल के वाहन पर तथा कौमारी मोर के आसन पर विराजमान हैं। श्री विष्णुपत्नी भगवती लक्ष्मी  के हाथों में कमल है तथा वे कमल के आसन पर निवास करती हैं।

श्वेतरूपधरा   देवी , ईश्वरी   वृषवाहना  ।
ब्राह्मी   हंससमारूढ़ा , सर्वाभरण भूषिता ।।११।।

श्वेतवर्ण वाली ईश्वरी वृष-बैल पर सवार हैं , भगवती ब्राह्मणी ( सरस्वती ) सम्पूर्ण आभूषणों से युक्त हैं तथा वे हंस पर विराजमान रहती हैं।

इत्येता  मातर:  सर्वा: , सर्वयोग समन्विता ।
नाना भरण शोभाढ्या ,नानारत्नोपशोभिता: ।।१२ ।।

अनेक आभूषण तथा रत्नों से देदीप्यमान उपर्युक्त सभी देवियाँ सभी योग शक्तियों से युक्त हैं।

दृश्यन्ते  रथमारूढ़ा , देव्य:  क्रोधसमाकुला: ।
शंख  चक्र  गदां शक्तिं, हलं च मूसलायुधम् ।।१३ ।।

इनके अतिरिक्त और भी देवियाँ हैं, जो दैत्यों के विनाश के लिए तथा भक्तों की रक्षा के लिए क्रोधयुक्त रथ में सवार हैं तथा उनके हाथों में शंख ,चक्र ,गदा ,शक्ति, हल, मूसल हैं।

खेटकं  तोमरं  चैव , परशुं  पाशमेव  च  ।
कुन्तायुधं  त्रिशूलं  च ,  शार्ड़गमायुधमुत्तमम्।।१४।।

खेटक, तोमर, परशु , (फरसा) , पाश , भाला, त्रिशूल तथा उत्तम शार्ड़ग धनुष आदि अस्त्र -शस्त्र हैं।

दैत्यानां  देहनाशाय , भक्तानामभयाय  च ।
धारन्तया  युधानीत्थ , देवानां च हिताय वै ।।१५ ।।

जिनसे देवताओं की रक्षा होती है तथा देवी जिन्हें दैत्यों को नाश तथा भक्तों के मन से भय नाश करने के लिए धारण करती हैं।

नमस्तेस्तु  महारौद्रे  , महाघोर  पराक्रमें ।
महाबले  महोत्साहे ,  महाभयविनाशिनि ।।१६ ।।

महाभय का विनाश करने वाली , महान बल, महाघोर क्रम तथा महान उत्साह से सुसम्पन्न हे महारौद्रे तुम्हें नमस्कार है।

त्राही मां देवि ! दुष्प्रेक्ष्ये , शत्रूणां भयवद्धिनि ।
प्राच्यां  रक्षतु  मामेन्द्री , आग्नेय्यामग्निदेवता ।।१७ ।।

हे शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली देवी ! तुम मेरी रक्षा करो। दुर्घर्ष तेज के कारण मैं तुम्हारी ओर देख भी नहीं सकता । ऐन्द्री शक्ति पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें तथा अग्नि देवता की आग्नेयी शक्ति अग्निकोण में हमारी रक्षा करें।

दक्षिणेअवतु  वाराही , नैरित्वां  खडगधारिणी ।
प्रतीच्यां वारूणी रक्षेद्- , वायव्यां  मृगवाहिनी ।।१८ ।।

वाराही शक्ति दक्षिन दिशा में, खडगधारिणी नैरित्य कोण में, वारुणी शक्ति पश्चिम दिशा में तथा मृग के ऊपर सवार रहने वाली शक्ति वायव्य कोण में हमारी रक्षा करें।

उदीच्यां पातु कौमारी , ईशान्यां  शूलधारिणी ।
उर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद , धस्ताद्  वैष्नवी तथा ।।१९ ।।

भगवान कार्तिकेय की शक्ति कौमारी उत्तर दिशा में , शूल धारण करने वाली ईश्वरी शक्तिईशान कोण में ब्रह्माणी ऊपर तथा वैष्नवी शक्ति नीचे हमारी रक्षा करें।

एवं दश दिशो रक्षे , चामुण्डा  शववाहना ।
जया मे चाग्रत: पातु , विजया पातु पृष्ठत: ।।२० ।।

इसी प्रकार शव के ऊपर विराजमान चामुण्डा देवी दसों दिशा में हमारी रक्षा करें।आगे जया ,पीछे विजया हमारी रक्षा करें।

अजिता वामपाश्वे तु , दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षे, दुमा मूर्घिन व्यवस्थिता ।।२१ ।।

बायें भाग में अजिता, दाहिने हाथ में अपराजिता, शिखा में उद्योतिनी तथा शिर में उमा हमारी रक्षा करें।

मालाधरी ललाटे च , भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा  च  भ्रूवोर्मध्ये , यमघण्टा च नासिके ।।२२ ।।

ललाट में मालाधरी , दोनों भौं में यशस्विनी ,भौं के मध्य में त्रिनेत्रा तथा नासिका में यमघण्टा हमारी रक्षा करें।

शंखिनी  चक्षुषोर्मध्ये , श्रोत्रयोर्द्वार   वासिनी ।
कपोलो कालिका रक्षेत् , कर्णमूले  तु  शांकरी ।।२३ ।।ल

दोनों नेत्रों के बीच में शंखिनी , दोनों कानों के बीच में द्वारवासिनी , कपाल में कालिका , कर्ण के मूल भाग में शांकरी हमारी रक्षा करें।

नासिकायां सुगंधा  च , उत्तरोष्ठे  च  चर्चिका ।
अधरे   चामृतकला , जिह्वायां  च  सरस्वती ।।२४ ।।

नासिका के बीच का भाग सुगन्धा , ओष्ठ में चर्चिका , अधर में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती हमारी रक्षा करें।

दन्तान् रक्षतु कौमारी , कण्ठ देशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघंटा च , महामाया च तालुके ।।२५ ।।

कौमारी दाँतों की , चंडिका कण्ठ-प्रदेश की , चित्रघंटा गले की तथा महामाया तालु की रक्षा करें।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् , वाचं  मे  सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली  च ,  पृष्ठवंशे  धनुर्धरी   ।।२६ ।।

कामाक्षी ठोढ़ी की , सर्वमंगला वाणी की , भद्रकाली ग्रीवा की तथा धनुष को धारण करने वाली रीढ़ प्रदेश की रक्षा करें।

नीलग्रीवा  बहि:कण्ठे  ,  नलिकां  नलकूबरी  ।
स्कन्धयो:  खंगिनी  रक्षेद् ,  बाहू मे वज्रधारिनी ।।२७ ।।

कण्ठ से बाहर नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी , दोनों कन्धों की खंगिनी तथा वज्र को धारण करने वाली दोनों बाहु की रक्षा करें।

हस्तयोर्दण्डिनी  रक्षे - ,  दम्बिका चांगुलीषु च ।
नखाच्छुलेश्वरी  रक्षेत् ,  कुक्षौ रक्षेत्  कुलेश्वरी ।।२८ ।।

दोनों हाथों में दण्ड को धारण करने वाली तथा अम्बिका अंगुलियों में हमारी रक्षा करें । शूलेश्वरी नखों की तथा कुलेश्वरी कुक्षिप्रदेश में स्थित होकर हमारी रक्षा करें ।

स्तनौ  रक्षेन्महादेवी , मन:शोक   विनाशिनी ।
हृदये  ललिता  देवी ,  उदरे  शूलधारिणी  ।।२९ ।।

महादेवी दोनों स्तन की , शोक को नाश करने वाली मन की रक्षा करें । ललिता देवी हृदय में तथा शूलधारिणी उत्तर प्रदेश में स्थित होकर हमारी रक्षा करें ।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् ,  गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना  कामिका  मेद्रं ,  गुदे  महिषवाहिनी  ।।३० ।।

नाभि में कामिनी तथा गुह्य भाग में गुह्येश्वरी हमारी रक्षा करें। कामिका तथा पूतना लिंग की तथा महिषवाहिनी गुदा में हमारी रक्षा करें।

कट्यां   भगवती  ,  रक्षेज्जानुनि   विन्ध्यवासिनी ।
जंघे   महाबला रक्षेद् ,   सर्वकामप्रदायिनी     ।।३१ ।।

भगवती कटि प्रदेश में तथा विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें। सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाली  महाबला जांघों की रक्षा करें।

गुल्फयोर्नारसिंही  च  , पादपृष्ठे तु  तैजसी ।
पादाड़्गुलीषु  श्री रक्षेत् , पादाधस्तलवासिनी ।।३२ ।।

नारसिंही दोनों पैर के घुटनों की , तेजसी देवी दोनों पैर के पिछले भाग की, श्रीदेवी पैर की अंगुलियों की तथा तलवासिनी पैर के निचले भाग की रक्षा करें।

नखान्  दंष्ट्राकराली  च , केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी  ।
रोमकूपेषु  कौनेरी  ,       त्वचं वागीश्वरी तथा ।।३३ ।।

दंष्ट्राकराली नखों की , उर्ध्वकेशिनी देवी केशों की , कौवेरी रोमावली के छिद्रों में तथा वागीश्वरी हमारी त्वचा की रक्षा करें।

रक्त-मज्जा - वसा -मांसा , न्यस्थि- मेदांसि  पार्वती ।
अन्त्राणि  कालरात्रिश्च , पित्तं च मुकुटेश्वरी  ।।३४ ।।

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस , हड्डी और मेदे की रक्षा करें । कालरात्रि आँतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें ।

पद्मावती   पद्मकोशे , कफे  चूड़ामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी  नखज्वाला , मभेद्या  सर्वसन्धिषु ।।३५ ।।

पद्मावती सहस्र दल कमल में , चूड़ामणि कफ में , ज्वालामुखी नखराशि में उत्पन्न तेज की तथा अभेद्या सभी सन्धियों में हमारी रक्षा करें।

शुक्रं  ब्रह्माणिमे  रक्षे , च्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं ,   रक्षेन् मे धर्मधारिणी  ।।३६ ।।

ब्रह्माणि शुक्र की , छत्रेश्वरी छाया की , धर्म को धारण करने वाली , हमारे अहंकार , मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ    तथा , व्यानमुदान च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेद , प्राणंकल्याणं शोभना ।।३७ ।।

वज्रहस्ता प्राण , अपान , व्यान , उदान तथा समान वायु की , कल्याण से सुशोभित होने वाली कल्याणशोभना ,हमारे प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे गन्धे च , शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्वं   रजस्तमश्चचैव , रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८ ।।

रस , रूप , गन्ध , शब्द तथा स्पर्श रूप विषयों का अनुभव करते समय योगिनी तथा हमारे सत्व , रज , एवं तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें ।

आयु रक्षतु वाराही , धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यश: कीर्ति च लक्ष्मी च , धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९ ।।

वाराही आयु की , वैष्णवी धर्म की , चक्रिणी यश और कीर्ति की , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि  मे  रक्षेत् , पशुन्मे  रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मी ,    भार्यां रक्ष्तु  भैरवी ।।४० ।।

हे इन्द्राणी , तुम मेरे कुल की तथा हे चण्डिके , तुम हमारे पशुओं की रक्षा करो ।हे महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की तथा भैरवी देवी हमारी स्त्री की रक्षा करें।

पन्थानं  सुपथा  रक्षेन्मार्गं , क्षेमकरी    तथा ।
राजद्वारे   महालक्ष्मी , र्विजया  सर्वत: स्थिता ।।४१ ।।

सुपथा हमारे पथ की , क्षेमकरी ( कल्याण करने वाली ) मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया भयों से हमारी रक्षा करें।

रक्षाहीनं  तु  यत्  स्थानं , वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं  रक्ष मे  देवी !  जयन्ती  पापनाशिनी ।।४२ ।।

हे देवी ! इस कवच में जिस स्थान की रक्षा नहीं कही गई है उस अरक्षित स्थान में पाप को नाश करने वाली , जयन्ती देवी ! हमारी रक्षा करें।

पदमेकं   न   गच्छेतु , यदीच्छेच्छुभमात्मन:   ।
कवचेनावृतो   नित्यं  ,  यत्र  यत्रैव  गच्छति  ।।४३ ।।

यदि मनुष्य  अपना कल्याण चाहे तो वह कवच के पाठ के बिना एक पग भी कहीं यात्रा न करे । क्योंकि कवच का पाठ करके चलने वाला मनुष्य जिस-जिस स्थान पर जाता है।

तत्र   तत्रार्थलाभश्च ,  विजय:  सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते  कामं तं तं , प्राप्नोति  निश्चितम ।।४४ ।।

उसे वहाँ- वहाँ धन का लाभ होता है और कामनाओं को सिद्ध करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह पुरुष जिस जिस अभीष्ट वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसे निश्चय ही प्राप्त होती है।

परमैश्वर्यमतुलं  प्राप्स्यते , भूतले पूमान ।
 निर्भयो  जायते मर्त्य: , सड़्ग्रामेष्वपराजित: ।। ४५ ।।

कवच का पाठ करने वाला इस पृथ्वी पर अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है । वह किसी से नहीं डरता और युद्ध में उसे कोई हरा भी नहीं सकता ।

रोमकूपेषु  कौनेरी  ,       त्वचं वागीश्वरी तथा ।।३३ ।।

दंष्ट्राकराली नखों की , उर्ध्वकेशिनी देवी केशों की , कौवेरी रोमावली के छिद्रों में तथा वागीश्वरी हमारी त्वचा की रक्षा करें।

रक्त-मज्जा - वसा -मांसा , न्यस्थि- मेदांसि  पार्वती ।
अन्त्राणि  कालरात्रिश्च , पित्तं च मुकुटेश्वरी  ।।३४ ।।

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस , हड्डी और मेदे की रक्षा करें । कालरात्रि आँतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें ।

पद्मावती   पद्मकोशे , कफे  चूड़ामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी  नखज्वाला , मभेद्या  सर्वसन्धिषु ।।३५ ।।

पद्मावती सहस्र दल कमल में , चूड़ामणि कफ में , ज्वालामुखी नखराशि में उत्पन्न तेज की तथा अभेद्या सभी सन्धियों में हमारी रक्षा करें।

शुक्रं  ब्रह्माणिमे  रक्षे , च्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं ,   रक्षेन् मे धर्मधारिणी  ।।३६ ।।

ब्रह्माणि शुक्र की , छत्रेश्वरी छाया की , धर्म को धारण करने वाली , हमारे अहंकार , मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ    तथा , व्यानमुदान च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेद , प्राणंकल्याणं शोभना ।।३७ ।।

वज्रहस्ता प्राण , अपान , व्यान , उदान तथा समान वायु की , कल्याण से सुशोभित होने वाली कल्याणशोभना ,हमारे प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे गन्धे च , शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्वं   रजस्तमश्चचैव , रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८ ।।

रस , रूप , गन्ध , शब्द तथा स्पर्श रूप विषयों का अनुभव करते समय योगिनी तथा हमारे सत्व , रज , एवं तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें ।

आयु रक्षतु वाराही , धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यश: कीर्ति च लक्ष्मी च , धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९ ।।

वाराही आयु की , वैष्णवी धर्म की , चक्रिणी यश और कीर्ति की , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि  मे  रक्षेत् , पशुन्मे  रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मी ,    भार्यां रक्ष्तु  भैरवी ।।४० ।।

हे इन्द्राणी , तुम मेरे कुल की तथा हे चण्डिके , तुम हमारे पशुओं की रक्षा करो ।हे महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की तथा भैरवी देवी हमारी स्त्री की रक्षा करें।

पन्थानं  सुपथा  रक्षेन्मार्गं , क्षेमकरी    तथा ।
राजद्वारे   महालक्ष्मी , र्विजया  सर्वत: स्थिता ।।४१ ।।

सुपथा हमारे पथ की , क्षेमकरी ( कल्याण करने वाली ) मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया भयों से हमारी रक्षा करें।

रक्षाहीनं  तु  यत्  स्थानं , वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं  रक्ष मे  देवी !  जयन्ती  पापनाशिनी ।।४२ ।।

हे देवी ! इस कवच में जिस स्थान की रक्षा नहीं कही गई है उस अरक्षित स्थान में पाप को नाश करने वाली , जयन्ती देवी ! हमारी रक्षा करें।

पदमेकं   न   गच्छेतु , यदीच्छेच्छुभमात्मन:   ।
कवचेनावृतो   नित्यं  ,  यत्र  यत्रैव  गच्छति  ।।४३ ।।

यदि मनुष्य  अपना कल्याण चाहे तो वह कवच के पाठ के बिना एक पग भी कहीं यात्रा न करे । क्योंकि कवच का पाठ करके चलने वाला मनुष्य जिस-जिस स्थान पर जाता है।

तत्र   तत्रार्थलाभश्च ,  विजय:  सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते  कामं तं तं , प्राप्नोति  निश्चितम ।।४४ ।।

उसे वहाँ- वहाँ धन का लाभ होता है और कामनाओं को सिद्ध करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह पुरुष जिस जिस अभीष्ट वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसे निश्चय ही प्राप्त होती है।

परमैश्वर्यमतुलं  प्राप्स्यते , भूतले पूमान ।
 निर्भयो  जायते मर्त्य: , सड़्ग्रामेष्वपराजित: ।। ४५ ।।

कवच का पाठ करने वाला इस पृथ्वी पर अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है । वह किसी से नहीं डरता और युद्ध में उसे कोई हरा भी नहीं सकता ।

त्रैलोक्ये तु भवेत् पूज्य: , कवचेनावृत:  पुमान् ।
इदं तु देव्या:  कवचं ,  देवानामपि   दुर्लभम्  ।।४६ ।।

तीनों लोकों में उसकी पूजा होती है।यह देवी का कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

य: पठेत् प्रयतो नित्य , त्रिसंध्यं  श्रद्धयान्वित: ।
दैवीकला    भवेत्तस्य ,  त्रैलोक्येष्वपराजित: ।। ४७ ।।

जो लोग तीनों संध्या में श्रद्धापूर्वक इस कवच का पाठ करते हैं उन्हें देवी कला की प्राप्ति होती है। तीनों लोकों में उन्हें कोई जीत नहीं सकता ।

जीवेद  वर्षशतं , साग्रम  पमृत्युविवर्जित: ।
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे , लूता  विस्फोटकादय: ।।४८ ।।

उस पुरुष की अपमृत्यु नहीं होती । वह सौ से भी अधिक वर्ष तक जीवित रहता है । इस कवच का पाठ करने से लूता ( सिर में होने वाला खाज का रोग मकरी ,) विस्फोटक (चेचक) आदि सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।

स्थावरं  जंगमं  चैव , कृत्रिमं  चाअपि  यद्विषम्  ।
अभिचाराणि  सर्वाणि , मन्त्र-यन्त्राणि भूतले  ।।४९ ।।

स्थावर तथा  कृत्रिम विष , सभी नष्ट हो जाते हैं ।मारण , मोहन तथा उच्चाटन आदि सभी प्रकार के किये गए अभिचार यन्त्र तथा मन्त्र , पृथवी तथा आकाश में विचरण करने वाले 

भूचरा: खेचराश्चैव , जलजा श्चोपदेशिका: ।
सहजा कुलजा माला , डाकिनी- शाकिनी तथा ।।५० ।।

ग्राम देवतादि, जल में उत्पन्न होने वाले तथा उपदेश से सिद्ध होने वाले सभी प्रकार के क्षुद्र देवता आदि कवच के पाठ करने वाले मनुष्य को देखते ही विनष्ट हो जाते हैं।जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले ग्राम देवता ,कुल देवता , कण्ठमाला, डाकिनी, शाकिनी आदि ।

अन्तरिक्षचरा   घोरा , डाकिन्यश्च   महाबला: ।
ग्रह - भूत   पिशाचाश्च , यक्ष गन्धर्व - राक्षसा: ।।५१ ।।

अन्तरिक्ष में विचरण करने वाली अत्यन्त भयानक बलवान डाकिनियां ,ग्रह, भूत पिशाच ।

ब्रह्म    -  राक्षस  - बेताला: , कुष्माण्डा   भैरवादय: ।
नश्यन्ति     दर्शनातस्य , कवचे हृदि   संस्थिते  ।।५२ ।।

ब्रह्म राक्षस , बेताल , कूष्माण्ड तथा भयानक भैरव आदि सभी अनिष्ट करने वाले जीव , कवच का पाठ करने वाले पुरुष को देखते ही विनष्ट हो जाते हैं।

मानोन्नतिर्भवेद्  राज्ञ , स्तेजोवृद्धिकरं  परम् ।
यशसा वर्धते सोअपि  ,  कीर्ति  मण्डितभूतले ।।५३ ।।

कवचधारी पुरूष को राजा के द्वारा सम्मान की प्राप्ति होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला है।कवच का पाठ करने वाला पुरुष  इस पृथ्वी को अपनी कीर्ति से  सुशोभित करता है और अपनी कीर्ति के साथ वह नित्य अभ्युदय को प्राप्त करता है।

जपेत्  सप्तशतीं  चण्डीं , कृत्वा  तु  कवचं  पुरा ।
यावद्  भूमण्डलं  धत्ते - , स - शैल - वनकाननम् ।।५४ ।।

जो पहले कवच का पाठ करके सप्तशती का पाठ करता है , उसकी पुत्र - पौत्रादि संतति पृथ्वी पर तब तक विद्धमान रहती है जब तक  पहाड़ , वन , कानन , और कानन से युक्त यह पृथ्वी टिकी हुई है।

तावत्तिष्ठति  मेदिन्यां , सन्तति:  पुत्र- पौत्रिकी ।
देहान्ते  परमं  स्थानं ,  यत्सुरैरपि  दुर्लभम्   ।।५५ ।।

कवच का पाठ कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाला मनुष्य मरने के बाद - महामाया की कृपा से देवताओं के लिए  जो अत्यन्त दुर्लभ स्थान है 

प्राप्नोति  पुरुषो  नित्यं ,  महामाया  प्रसादत: ।
लभते   परमं    रूपं  ,   शिवेन    सह   मोदते ।।५६ ।।

उसे प्राप्त कर लेता है और उत्तम रूप प्राप्त कर  शिवजी के साथ  आन्नदपूर्वक  निवास करता है।

          ।।   इति  वाराह पुराणे  हरिहरब्रह्मविरचित  देव्या:  कवचं  समाप्तम्   ।।