Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Tuesday, 24 March 2015

Shri Ram Chalisa .(श्री राम चालीसा )।




श्री रघुबीर भक्त हितकारी । सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई ।।
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।
जय जय जय रघुनाथ कृपाला । सदा करो सन्तन प्रतिपाला ।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ।।
तव भुजदण्ड प्रचंड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।
तुम अनाथ के नाथ गोसाई । दीनन के हो सदा सहाई ।।
ब्रम्हादिक तव पार न पावैं। सदा ईश तुम्हारो यश गावैं ।।
चारिउ बेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखी ।।
गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ।।
 नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ।।
राम नाम है अपरम्पारा  । चारिउ वेदन जाहि पुकारा ।।
 गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ।।
शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ।।
फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोउ न तुम्हारो पारा ।।
भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहु न रण में हारो ।।
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा।।
लषन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ।।
ताते रण जीते नहिं कोई । युद्ध जुरे यमहूं किन होई ।।
महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ।।
सीता राम पुनीता गायों । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।
घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई  ।।
सो तुमरे नित पाँव पलोटत । नवो निद्धि चरणन में लोटत ।।
सिद्धि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावे बलिहारी ।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति  तुमहिं बनाई ।।
इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की वारा ।।
जो तुम्हरे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा । निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ।।
सत्य सत्य जय सत्य ब्रत स्वामी ।सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।
सत्य भजन तुम्हरो जो गावैं । सो निश्चय चारों फल पावै ।।
सत्य सपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ।।
सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे ।तुम गुरूदेव प्राण के प्यारे ।।
जो कुछ हो सो तुम ही राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।
राम अात्मा पोषण हारे । जय जय जय दशरथ के दुलारे ।।
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।नाम तुम्हार हरत संतापा ।।
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया । बज्री दुन्दुभी शंख बजाया ।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।तुम ही हो हमारे तन मन धन ।।
याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।
आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिव मेरा ।।
और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ।।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसीदल अरू फूल चढावै ।।
साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्धता पावै ।।
अन्त समय रघुवर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।।
श्री हरिदास कहै अरू गावैो । सो बैकुंठ धाम को जावै ।।

        ।।   दोहा ।।
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।
हरिदास हरि कृपा से , अवसि भक्ति को पाय ।।
राम चालीसा जो पढे, राम चरण चित लाय ।।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय ।।


Ma Durga Ke Battis Namon Ki Mala .माँ दुर्गा के बत्तीस नामों की माला। (दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला )

दुर्गा   दुर्गतिशमनी  दुर्गापद्विनिवारिणी ।    दुर्गमच्छेदिनी  दुर्गसाधिनी  दुर्गनाशिनी  ।।
दुर्गतोद्धारिणी  दुर्गनिहन्त्री   दुर्गमापहा  ।    दुर्गमज्ञानदा  दुर्गदैत्यलोकदवानला ।।
दुर्गमा दुर्गमालोका  दुर्गमात्मस्वरूपिणी ।  दुर्गमार्गप्रदा  दुर्गमविद्या   दुर्गमाश्रिता  ।।
दुर्गमज्ञानसंस्थाना  दुर्गमध्यानभासिनी  ।  दुर्गमोहा  दुर्गमगा  दुर्गामार्थस्वरूपिणी ।।
दुर्गमासुरसंहत्री  दुर्गमायुधधारिणी ।   दुर्गमांगी दुर्गमता दुरगम्या दुर्गमेश्वरी ।।
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी । नामावलिमिमां यस्तु दुर्गया मम मानव: ।।

Monday, 23 March 2015

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Mere Raghav Jee Utarenge Par, Ganga Maiya Dheere Baho.(मेरे राघव जी उतरेंग पार हो ,गंगा मैंया धीरे बहो )।


मेरे राघव जी उतरेंगे पार हो , गंगा मैंया धीरे बहो ।
धीरे बहो धीरे बहो हौले बहो ,गंगा मैंया धीरे बहो ।
मेंरे प्रभू जी उतरेंगे पार हो , गंगा मैंया धीरे बहो ।

आज सफल हुये नयन हमारे, प्रभू जी विराजे हैं नाव हमारे-२
ये तो जग के पालनहार ,गंगा मैंया धीरे बहो 
मेंरे  प्रभू जी उतरेंगे पार हो ,गंगा मैंया धीरे बहो ।

भव सरिता के खेवनहारे , आज हमारे नाव पधारे ।---२
ये तो दशरथ राजकुमार ,गंगा मैंया धीरे बहो ।
मेंरे राघव जी उतरेंगे पार हो, गंगा मैंया धीरे बहो ।

सीता लखन ,प्रभू पार उतारो, बिगड़ी जनम आगे की सुधारो।------२
ये तो रघुबर प्राणाधार ,गंगा मैंया धीरे बहो।
मेंरे राघव जी उतरेंगे पार हो ,गंगा मैंया धीरे बहो।

केवट उतरी दंडबत कीना, प्रभू उतराई मणि मुद्रिका दीना।
कहें कृपालु लेलो उतराई, केवट चरण पकड़ अकुलाई ।
अब कछु नाथ न चाहिये मोरे, दीन दयालु अनुग्रह तोरे।
फिरती बार मैं जो कछु पावा ,समझ प्रसाद मैं सिर धरि पावा।
मेंरे राघव जी उतरेंगे पार हो, गंगा मैंया धीरे बहो----२ 





Tuesday, 17 March 2015

Bhaye Pragat Kripala Deen Dayala Kaushalya Hitkari. ( भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी ) (राम चरित मानस )



भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी ।
  हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी  ।।
   लोचन अभिरामा तनु घन स्यामा निज आयुध भुज चारी ।
     भूषण बनमाला नयन बिसालासोभा सिंधु खरारी ।।

    कह दुख कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
       माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ।।
     करूना सुख सागर सब गुन आगर जाहिं गावहिं श्रुति संता।
      सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता । ।

     ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै ।
       मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ।।
       उपजा जब ग्याना प्रभु मुस्काना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
         कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै। ।

      माता पुनि बोली सो मति डोली तजहूँ तात यह रूपा ।
      कीजै सिसुलीला अति प्रिय सीला यह सुख परम अनूपा ।।
         सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।
       यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं ते न परहिं भवतूपा ।।

          बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ।
           निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ।।
    

Monday, 16 March 2015

Radhe Tere Charano Ki Dhool Jo Mil Jaye(राधे तेरे चरणों की गर धूल जो मिल जाए)।



 राधे तेरे चरणों की गर धूल जो मिल जाए ,
  सच कहती हूँ, मैया मेरी , तकदीर बदल जाए।
 राधे तेरे चरणों की................................

   सुनते हैं तेरी रहमत, दिन रात बरसती है-२
  एक बूँद ही मिल जाए, जीवन ही बदल जाए।
  राधे तेरे चरणों की.................................

     ये मन बड़ा चंचल है, तेरा भजन नहीं करता -२
     जितना इसे समझाऊँ ,उतना ही मचल जाए।
     राधे तेरे चरणों की.....................,.......,,,,

      नज़रों से गिराना ना, चाहे जितनी सजा देना -२
      नज़रों से जो गिर जाएँ, मुश्किल है सम्भल पायें।
     राधे तेरे चरणों की गर.................... ...........

       माँ इस जीवन की , बस इतनी तमन्ना है।
       तू सामने हो मेरे, और प्राण निकल जाये ।
       राधे तेरे चरणों की ,गर धूल ही मिल जाये।
      सच कहती हूँ, मैया मेरी तक़दीर बदल जाये।
      राधे तेरे चरणों की...............................

Mane Chakar Rakho Jee.( मने चाकर राखो जी ) (मीरा जी के भजन ) ।




  मने चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी।
            गिरधारीलाला चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी।
  
      चाकर रहसूँ ,बाग लगासूँ, नित उठि दरसन पासूँ ।
 बृंदावन की कुंज गली में, गोविन्द लीला गाँठूँ ।
      मने चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी ।

        चाक गली में दरसन पाऊँ, सुमिरन पाऊँ फरजी।
         भाव -भक्ति जागीरे पाऊँ , तीनों माता सरसी ।
          मने चाकर राखो जी , मने चाकर राखो जी ।

          मोर मुकुट पीताम्बर सोहे ,गले बैजन्तीमाला ।
          बृंदावन में धेनु चरावे , मोहन मुरलीवाला ।
           मने चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी।

          ऊँचे-ऊँचे महल बनाऊँ , बीच-बीच राखूँ बारी।
           साँवरिया के दरसन पाऊँ ,पहन कुशुमरी साड़ी।
            मने चाकर राखो जी ,मने चाकर राखो जी ।

           जोगी आया जोग करन को, तप करने सन्यासी।
            हरि भजन को साधु आये, बृंदावन के बासी ।
            मने चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी ।

             मीरा के प्रभु गहिर गंभीरा, रूते रहो जी धीरा ।
             आधी रात प्रभु दरसन दीनों, जमुना जी के तीरा।
             मने चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी।
             गिरधारी लाला , चाकर राखो जी, मने चाकर राखो जी ।
             

Friday, 13 March 2015

Jai Ram Rama Ramanam Samanamजय राम रमा रमनं समनं भवताप भयाकुल पाहि जनं । (राम चरित मानस )

         

जय राम रमा रमनं समनं । भवताप भयाकुल पाहि जनं ।।
          अवधेस सुरेस रमेस विभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो ।।
           
            दससीस बिनासन बीस भुजा ।कृत दूरि महा महि भूरि रूजा।।
            रजनीचर बृंद पतंग रहे ।सर पावक तेज़ प्रचंड दहे ।।

            महि मंडल मंडन चारूतरं । घृत सायक चाप निषंग बरं ।।
             मद मोह महा ममता रजनी ।तम पुंज दिवाकर तेज अनी ।।

              मनजात की रात निपात किये ।मृग लोग कुभोग सरेन हिये ।।
               हति नाथ अनाथिनी पाहि हरे । विषया बन पावँर भूलि परे।।

                बहू रोग वियोगन्हि लोग हए। भवदंध्रि निरादर के फल ए ।।
                 भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ।।

                अति दीन मलीन दुखी नित ही। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं।।
                 अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें ।प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह के ।।

                   नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह कें सम वैभव वा विपदा ।।
                    एही ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।

                   करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ ।पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ।।
                    सम मानि निरादर आदरही ।सब संत सुखी विचरंति मही ।।

                    मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुवीर महा रणधीर अजे ।।
                    तव नाम जपामि नमामि हरि ।भवरोग महागद मान अरी ।।

                     गुन सील कृपा परमायतनं  ।प्रनमामि  निरंतर श्री रमनं ।।
                     रघुनंद निकंदय द्वन्दघनम ।महीपाल विलोकय दीन जनम ।।

                      बार -बार बर माँगउँ हरषि देहु श्रीरंग।
                      पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग। ।

                      बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास ।
                      तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ।।


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Wednesday, 11 March 2015

Jab Tu Hi Tu Hai Sab Me Vasaजब तू ही तू है सब में बसा,फिर कौन भला और कौन बुरा ।


              जब तू ही तू है सब में बसा, फिर कौन भला और कौन बुरा .....२

               हर चीज में जलवा तेरा ही,मुझे नज़र आया इन आँखों से,
                एक बार जो देखा,परदा हटा,फिर कौन भला और कौन बुरा।

                 जब तू ही तू है सबमें बसा, फिर कौन भला और कौन बुरा।

                किस चीज से अब मैं प्यार करूँ, और ठोकर से ठुकराऊँ किसे,
                 जब दिल से दिल का भेद मिटा, फिर कौन भला और कौन बुरा, 
                   जब तू ही तू है सबमें बसा................................   

                    फिर सुख दु:ख में रोना हँसना क्या, और जीवन मरण विछोना क्या,
                     जब सबमें है प्रभू तेरी रजा,  फिर कौन भला और कौन बुरा ।
                     जब तू ही तू है सबमें बसा, फिर कौन भला और कौन बुरा ।      




   Ref: ma kankeshwari devi ji 

                     
            

Ab Tak Jo Nibhaya Hai , Aage Bhi Nibha Dena.अब तक जो निभाया है, आगे भी निभा देना ।(राम जी का भजन )



                अब तक जो निभाया है, आगे भी निभा देना ,
                  हे नाथ मेरी नैया ,उस पार लगा देना ।.........२

                    संभव है झंझटों में, मैं तुमको भूल जाऊँ ..२
                     पर नाथ कहीं तुम भी, मुझको न भुला देना,
                      हे नाथ मेरी नैया ,उस पार लगा देना ।
                       अब तक जो निभाया........................
                        ..,,..........., .............................., 

                         तुम देव मैं पुजारी, तुम इष्ट मैं उपासक,
                          गर बात यही सच है, तो सच कर के दिखा देना,
                           हे नाथ मेरी नैया, उस पार लगा देना ।
                             अब तक जो निभाया है,................,,,.,,,,,,,
                             ...,...,,.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 

                             दल-बल के साथ माया, घेरे जो मुझको आकर,
                              तुम देखते न रहना, झट आके बचा लेना,
                                हे नाथ मेरी नैया, उस पार लगा देना।
                                अब तक जो निभाया है, आगे भी निभा देना,
                                   हे नाथ मेरी नैया, उस पार लगा देना ।
                                     हे नाथ मेरी नैया ,उस पार लगा देना।

Monday, 9 March 2015

Apna Nahi Jag Me Koi , Nishidin Bhajo Shri Bhagwan Re.(अपना नहीं जग में कोई , निशिदिन भजो श्री भगवान रे )।


                  अपना नहीं जग में कोई , निशिदिन भजो श्री भगवान रे।

                   पैर दिये तीरथ करने को, हाथ दिये करो दान रे ।
                 
                    अपना नहीं जग में कोई, निशिदिन भजो श्री भगवान रे।
                  
                    दान बिना सर झुक जाये, नहीं मिल पाये सम्मान रे ।

                    अपना नहीं जग में कोई , निशिदिन भजो श्री भगवान रे।

                     दाँत दिये मुख की शोभा को, जिह्वा दी कर हरि गान रे।

                      अपना नहीं जग में कोई, निशिदिन भजो श्री भगवान रे।

                      आँखें दी हरि दर्शन को,कान दिये सुन ग्यान रे ।

                       चित्त दियो प्रभु के चिन्तन को, मन दिये कर प्रभु ध्यान रे।

                        अपना नहीं जग में कोई, निशिदिन भजो श्री भगवान रे......२

Govind Hare Gopal Hare.(गोविन्द हरे गोपाल हरे ) ( श्री कृष्ण भजन )।

          गोविन्द हरे गोपाल हरे,
          जय जय प्रभु दीन दयाल हरे ....२
            
           मेंरे मन मंदिर में आ जाओ  ,
           मेरी जीवन ज्योत जगा जाओ
           तुमसे नहीं कोई देव परे ।
           गोविन्द हरे गोपाल हरे........२

             तुम दीन बंधु हितकारी हो,
             अघहारी अरू असुरारी हो ,
              मधुरी मुरली तुम अधर धरे ।
              गोविन्द हरे गोपाल हरे ..........२

              तुम संत जनों के प्यारे हो,
               तुम ही जग के उजियारे हो ,
               थारी सेवा से सब संत तरे।
                गोविन्द हरे गोपाल हरे .........२

                 तुम सच्चे पिता और माता हो,
                 सब रिद्धी सिद्धी के दाता हो ,
                  तुमको सुमिरत सब दु:ख टरे।
                  गोविन्द हरे गोपाल हरे
                   जय जय प्रभु दीन दयाल हरे ।

Tuesday, 3 March 2015

Itna To Karna Swami, Jab Pran Tan Se Nikle.(इतना तो करना स्वामी , जब प्राण तन से निकले)।


 
       इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले।
     
       गोविन्द नाम लेकर, राधे का नाम लेकर,
        जब प्राण तन से निकले, हर हर कंठ बोले।
          जब प्राण तन से निकले,इतना तो करना स्वामी,
               जब प्राण तन निकले। ।

                          गंगा जी का तट हो, यमुना का बंशीबट हो।
                              मेंरा साँवला निकट हो, जब प्राण तन से निकले।
                              इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन निकले।

                 मेंरा साँवला  खंड़ा हो, मुरली में स्वर भरा हो।
                   तिरछी चरण धरा हो, जब प्राण तन से निकले।
                     इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले।

                                 बृंदावन का स्थल हो, मेंरे मुख में तुलसी दल हो।
                                   विष्णु चरण का जल हो, जब प्राण तन से निकले।
                                    इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले।

                        उस वक़्त जल्दी आना, नहीं श्याम भूल जाना ।
                         राधे को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले।
                         इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले।

Monday, 2 March 2015

Pandavon Ke Prati ShriKrishan Ka Sneh (पांडवों के प्रति श्रीकृष्ण का स्नेह) ।


      कुरुक्षेत्र  के युद्ध में , दुर्योधन  अपनी सेना को कमज़ोर पड़ता देख ,भीष्म पितामह के पास गया

       और पितामह को पांडवों पर पक्षपात का आरोप लगाया ।दुर्योधन ने पितामह से काफ़ी कड़े शब्दों

        में कहा कि आप पांडवों को मारना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे आपके प्रिय हैं। पितामह को दुर्योधन

         के  कटु वचन तथा अपनें उपर लगा लांछन सुनकर अच्छा नहीं लगा और उन्होंने प्रण ले लिया कि

         अगले दिन युद्ध में पाँचो पांडवों का वध कर देगें । यह समाचार सुनकर पांडव घबरा गये ,और श्री कृष्ण

           के पास  समाधान के लिये गये।

           श्री कृष्ण द्रौपदी को साथ लेकर अर्ध रात्रि के समय भीष्म पितामह के पास गये । कृष्ण  ने

            द्रौपदी से कहा, अपने पाँव की जूती यहीं उतार कर अंदर जाओ और पितामह के चरणों में

             झुक कर सौभाग्यवती होने काआशीर्वाद ,वचन में माँग लो जिससे पितामह पांडव वध का प्रण

             त्याग दें। श्री कृष्ण की इच्छानुसार द्रौपदी पितामह के कक्ष में गयी । पितामह उस समय प्रभु चरणों

              में ध्यान लगाये समाधि में बैठे थे।द्रोपदी ने जाकर पितामह के चरण पकड़ लिये तथा आशीर्वाद माँगा।

              पितामह को लगा दुर्योधन की पत्नी आशीर्वाद लेने आयी है, युद्ध में कौरवों की दशा ठीक नहीं है इसलिये

               घबराकर मेंरे पास आई है।पितामह ने सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया।द्राैपदी ने चरण नहीं छोड़े।

                पितामह ने पुनह सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया। इस तरह द्रौपदी ने पितामह के चरण तब तक नहीं

                छोड़े जब तक पितामह ने पाँच बार सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद उन्हें नहीं दे दिया।

                 द्रौपदी ने आशीर्वाद सुनकर कहा , बाबा आप सत्य वक़्ता तथा धर्म निष्ठ हैं ,आपने मुझे सौभाग्यवती होनें        

                  का आशीर्वाद  दिया है , परन्तु कल युद्ध में मेरे एक भी पति की मृत्यु हुइ तो आपका आशीर्वाद सफल

                   सिद्ध नहीं होगा।

                  द्रौपदी के ऐसे वचन सुनकर पितामह को होश आया। उनकी समाधि भंग हो गयी, हाथ से पूजा की माला  

                   छूट  गयी। पितामह समझ गये कि सामने द्रौपदी है तथा उसे लाने वाला कोई और नहीं मेंरे प्रण का

                    रखवाला श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्ण  के सिवा ऐसी युक्ति तथा चतुराई कोई और नहीं कर सकता । पितामह

                     ने कहा , बेटी तुम्हें लाने वाला वो छलिया कहाँ है? उम्र में पुत्र तथा पौत्रों वाला हो गया है,फिर भी चोरी

                      की आदत नहीं गयी है। युद्ध में वो माखन चोर नित नई नीतियाँ बनाता है। द्रौपदी से पितामह ने कहा ,

                       बेटी तुमने हमारे कुल का यश बढ़ाया है यह कहकर वो श्रीकृष्ण से मिलने बाहर की तरफ़ दौड़े ।

                        बाहर  आकर देखा तो वहाँ का दृश्य बड़.ही निराला था,  श्रीकृष्ण अपने पीताम्बर से घुंघट ओढ़े,

                       तथा बग़ल में द्रोपदी के पाँव की जूती दबाये खड़े थे।पितामह को देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।

                       पितामह  ने द्रौपदी से कहा , बेटी तुम्हारे पतियों का शत्रु युद्ध में बाल भी बाँका नहीं कर सकेगा क्योंकि

                        तुम्हारे साथ विश्व रचाने वाला स्वयं युद्ध में सारथी बनकर मार्गदर्शन कर रहा है ,इसलिये मेंरा भी आशीर्वाद     

                      तुम्हारे साथ है।