Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Thursday, 30 April 2015

Shri Krishna Bhagwan Ke 108 Nam (श्री कृष्ण भगवान के १०८ नाम) ।

ऊँ
कन्हैया
कृष्ण
केशव
चक्रधारी
नन्दलाल
माधव
श्यामसुन्दर
मुरारी
कमलनाथ
त्रिभंगी
नंदगोपप्रियात्मज
गोविन्द
द्वारिकानायक
नारायण
माखन चोर
नटनागर
मोरमुकुटधारी
गीताचार्य
नन्दनंदन
अविनाशी
नरोत्तम
नन्द गोप प्रियात्मज
गोपेश्वर
रणछोड़
गदाधर
गोपाल
दामोदर
ब्रजनाथ
दीनबंधु
जगदीश
दीनानाथ
रसिक बिहारी
जगतपिता
यशोदालाल
बाँकेबिहारी
मदन मोहन
कृपानिधि
सर्वरक्षक
सर्वशक्तिमान
सर्वब्यापक
मन हरन
बाँकेबिहारी
गोपीनाथ
ब्रजवल्लभ
गोवर्धनधारी
घनश्याम
परमानन्द
जनार्दन
राधारमण
माधो
मधुसूदन
हरि
मुरलीमनोहर
श्याम
कल्याणकारी
अनन्त
पीताम्बरधारी
चक्रधारी
परमपिता
गोसाईं
भग्त वत्सल
वासुदेव
परमात्मा
निरंजन
कालीनाग नथैया
अन्तर्यामी
सर्वाधार
अद्वैत
घट - घट के वासी
दीनानाथ
परमेश्वर
रमणीक
निराकार
निर्विकार
अच्युत
त्रिभुवन नाथ
सनातन
विष्णु
सत्यनारायण
ज्योति स्वरूप
परम पिता
ब्रह्म
संहरता
पालन करता
सच्चिदानंद स्वरूप
गोपिकावल्लभ
राधेश्याम
सत्यस्वरूप
आनन्ददाता
अनादि
कल्याणकारी
विश्वकर्ता
पूर्ण परमानन्द
चतुर्भुजात
श्रीशाय
त्रिनावर्ताय
कोटिसूर्यसमप्रभा
परम पुरूष
जगतगुरू
परब्रह्म
परात्पराय
यादवेन्द्र
सकटासुरभंजन
पार्थसारथी
वेणुनादविषारद
नारकान्तक
सत्यवाचे
जगन्नाथ

Jis Ki chitvan Ka ishara dil me hai. (जिस की चितवन का इशारा दिल में है।)

जिसकी चितवन का इशारा दिल में है,
  एक वही दिल का सहारा दिल में है ।
बस गया जिस दिन से दिल में साँवरा-२
  क्या बताएँ, क्या नजारा दिल में है ।जिसकी चितवन...

हर जगह पर हमको थी जिसकी तलाश ,
वह दिले, रहजंग हमारा दिल में है ।जिसकी चितवन...

दर्दे दिल को, दिल से क्यों हम रूखसत करें-२
यह भी एक दिलवर का प्यारा दिल में है ।
    क्या बताएँ क्या नज़ारा दिल में है। 

   बिन्दू ये आँखों को देते हैं सबूत ,-२
प्रेम की गंगा की धारा दिल में ।
एक वही दिल का सहारा दिल में है ।
जिसकी चितवन का इशारा दिल में है,
एक वही दिल का सहारा दिल में है।

Wednesday, 29 April 2015

Sab Ka Bhala Karo Bhagwan .( सबका भला करो भगवान ) ।

सब का भला करो भगवान, सब का भला करो भगवान ।
  दाता दया निधान , सबका भला करो भगवान ।।
तुम दुनिया का प्रीतम प्यारा, सबसे ऊँचा सबसे न्यारा ।
सकल गुणों की धाम , सबका भला करो भगवान ।।

तू सबका है पालनहारा, सबको मिलता तेरा सहारा।
हे जगदीश महान , सबका भला करो भगवान ।।

भर दो सबकी झोलियाँ दाता , तू है सबका भाग्य विधाता।
    दो सबको वरदान , सबका भला करो भगवान ।।

ये जग चलता तेरे सहारे, तुम हो मात पिता हमारे ।
  हम तेरी सन्तान , सबका भला करो भगवान ।।

दाता दया निधान , सबका भला करो भगवान ।।

Saturday, 25 April 2015

Shree Krishna Bhakta RasKhan Ji Ki Katha (श्री कृष्ण भक्त रसखान जी की कथा ।)

आने श्रीकृष्ण के भक्त रसखान एक मुसलमान व्यक्ति थे । एक बार वो अपने उस्ताद के साथ मक्का मदीना, हज पर जा रहे थे। उनके
उस्ताद ने कहा - देखो हिन्दुओं का तीर्थ स्थल वृन्दावन आने बाला है, वहाँ एक काला नाग रहता है। मैंने सुना है , नाग वृंदावन आने बाले यात्रियों को डस लेता है। इसलिये तुम सम्भल कर चलना ।इधर उधर ताक झाँक नहीं करना, सीधे मेरे पीछे-पीछे चलना।
           इतना कहना था उस्तादजी का कि , रसखान को उत्सुकता होने लगी । उन्होंने सुन रखा था वृंदावन कृष्ण धाम है , फिर यहाँ नाग लोगों को कैसे डँस सकता है? यह सोचते हुए वो चले जा रहे थे कि बिहारीजी अपनी लीला प्रारम्भ करना शुरू कर दिये। प्रभु ने सोचा, देखूँ ये कब तक बिना इधर- उधर देखे बच सकता है।और फिर बिहारीजी ने अपने मुरली की प्यारी धुन छेड़ दिया। रसखान अभी बचने की कोशिष ही कर रहे थे कि प्रभु के पाँव की नुपुर भी बजने लगी । रसखान को अब अपने नियंत्रण रखना मुश्किल हो रहा था।उस्तादजी की काला नाग बाली बात भी याद आ रही थी,  अब वो करे तो क्या करें ।मुरली तथा नुपुर की धुनें मन मुग्ध हुए जा रहा था। इतने में यमुना नदी आ गया, और रसखान देखे बिना नहीं रह सके। वहाँ श्रीबिहारीजी अपने प्रियाजी के साथ विराजमान थे। रसखान उनकी एक झलक पाकर मतवाले हो गए। मुरलीधर के युगल छवि के दर्शन पाकर वो भूल गए कि ख़ुद कहाँ हैं , और उनके उस्तादजी कहाँ गए ।रसखान अपना सुध-बुध खो बैठे ।उन्हें अपना ध्यान ही नहीं रहा । वे ब्रज की रज में लोट पोट हो रहे थे , मुँह से उनके झाग निकलने लगा ।इधर-उधर वो श्रीबिहारीजी को ढूँढने लगे ।उनकी साँवली छवि उनके आँखो से हट नहीं रही थी ।परन्तु प्रभु अपनी लीला कर अन्तर्ध्यान हो गए।
                              थोड़ी दूर जाकर जब उस्तादजी ने पीछे मुड़कर देखा, उन्हें रसखान कहीं नज़र नहीं आया, वो वापस पीछे आए, और उन्होंने रसखान की दशा देखकर समझ गए कि उन्हें कालिया नाग ने डँस लिया है और अब ये हमारे किसी काम के नहीं हैं।उस्तादजी रसखान को वहीं छोड़कर हज पर चले गए ।
                           रसखान को जब होश आया तो फिर वो कृष्ण को ढूँढने लगे।आस-पास आने-जाने वाले मुसाफ़िर से पूछने लगे , तुमने कहीं साँवला सलोना ,जिनके हाथ में मुरली है , साथ में उनकी बेगम भी हैं ,कही देखा है? वो कहाँ रहता है? किसी ने  श्रीबाँकेबिहारीजी के मंदिर का पता बता दिया ।रसखान मंदिर गये , किन्तु मंदिर के अंदर पुजारी ने प्रवेश  करने नहीं दिया। वो वहीं मंदिर के बाहर तीन दिनों। तक भूखे -प्याशे पड़े रहे। तीसरे दिन बाँकेबिहारीजी अपना प्रिय दूध-भात चाँदी के कटोरे में लेकर आए और उन्हें अपने हाथों से खिलाया।
    

Wednesday, 22 April 2015

Ma Kali Ki Aarti.(माँ काली जी की आरती।)

अम्बे तू है जगदम्बे काली जय दुर्गे खप्पर वाली,
     तेरे   ही    गुण गायें      भारती। 
ओ मैया हम सब उतारें तेरी  आरती ।
  माता तेरे भक्त जनों पर भीड़ पड़ी है भारी ।
दानव दल पर टूट पड़ो माँ करके सिंह सवारी ।
सौ सौ सिंहों से है बलशाली ,दस दस भुजाओं वाली।
     दुखियों के दु:ख को निवारती ।
     ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ।अम्बे तू है ।
     माँ बेटे का इस जग में है बड़ा ही निर्मल नाता।
      पूत कपूत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता ।
   सब पर करुणा दरसाने , वाली अमृत बरसाने वाली ।
             दुखियों के दु:ख को निवारती ।
            ओ मैया हम सब उतारें तेरी अरती ।अम्बे तू ।
    नहीं माँगते धन और दौलत , ना चाँदी ना सोना ।
 हम तो माँगे माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना ।
   सबकी बिगड़ी बनाने वाली , लाज बचाने वाली ।
        सतियों के सत को सँवारती ।
      ओ मैंया हम सब उतारें तेरी आरती ।अम्बे तू ।



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More Articles : 

Friday, 17 April 2015

Eshwar Tu Hai Dayalu Dukh Door Kar Hamara (ईश्वर तू है दयालु ,दु:ख दूर कर हमारा । (कृष्णा भजन ) ।

ईश्वर तू है दयालु , दु:ख दूर कर हमारा ,
तेरी शरण में आये , प्रभू दीजिये सहारा ।
ईश्वर तू है ...................................
तू है पिता या माता, सब विश्व का विधाता,
तुझसा नहीं है दाता , तेरा सभी पसारा ।
ईश्वर तू है .....................................
भूमि ,आकाश , तारे, रवि ,चन्द्र , सिन्धु सारे ,
 तेरे हुकुम में सारे , सबका तू ही अधारा ।
ईश्वर..............................................।
जग चक्र में चढ़ा हूँ  , भव सिन्धु में पड़ा हूँ  ,
दर पे तेरे खड़ा हूँ  , अब दे मुझे दीदारा  ।
ईश्वर तू है .......................................
अपनी शरण में लीजिये , सब दोष दूर कीजिये ,
ब्रह्मानन्द  ज्ञान दीजिये , तेरा नाम निर्विकारा ।
ईश्वर तू है ..................................।


Wednesday, 15 April 2015

Bhiksha Ka upyog , Mahatma Jee Ki Udarta. (भिक्षा का उपयोग , महात्मा जी की उदारता ) ।

स्वामी रामदास जी का यह नियम था, कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत होकर भिक्षा माँगने के लिए केवल पाँच घर ही जाते थे और कुछ न कुछ लेकर ही वहाँ से लौटा करते थे।
एक बार उन्होंने एक घर के द्वार पर खड़े होकर ,जय जय रघुवीर का घोष किया ही था कि गृहस्वामिनी , जिसकी थोड़ी ही देर पूर्व अपने पति से कुछ कहा सुनी हुई थी, जिसके कारन वो बहुत ग़ुस्से में थी बाहर आकर चिल्लाकर बोली , तुम लोगों को भीख माँगने के अलावा कोई दूसरा और धंधा नहीं आता है । मुफ़्त में मिल जाता है , इसलिए चले आते हो , जाओ यहाँ से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, कोई और घर ढूँढो ।
स्वामी जी हँसकर बोले , माता जी मैं बिना भिक्षा लिये किसी द्वार से खाली नहीं जाता । कुछ न कुछ तो लेकर ही जाऊँगा ।गृहस्वामिनी भोजनोपरान्त रसोई की साफ सफाई कर रही थी उसके हाथ में सफ़ाई का कपड़ा था ।उस महिला ने उस कपड़े को ही महात्मा जी के झोली में डाल दिया और कहने लगी, भिक्षा मिल गया? अब यहाँ से जाइये ।
 
स्वामीजी प्रसन्न हो वहाँ से चले गये और नदी में जा कर कपड़े को अच्छी तरह धोकर तथा सुखाकर उसकी बाती बनाए और मंदिर में जाकर दिया जला दिये ।इधर स्वामीजी के जाते ही उस महिला को अपने किये व्यवहार पर ग्लानी होनें लगी।उसने व्यर्थ ही एक धर्मात्मा का दिल दुखाया था। वो महात्माजी को ढूँढने बाहर निकली और ढूँढते हुये मंदिर पहुँची । वहाँ स्वामीजी को पाकर उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगी। क्षमा माँगते समय उसके नेत्र से अविरल आँसू बह रहे थे।
  स्वामी रामदासजी बोले -देवि तुमने उचित ही भिक्षा दी थी । तुम्हारी भिक्षा का ही प्रताप है कि यह मंदिर प्रकाशित हो उठा है, अन्यथा तुम्हारा दिया भोजन तो जल्द ही समाप्त हो गया होता ।

                  (Ref. Sharat Chandra's article from Kalyan Magazine)

Mati Ka Khilauna , Mati me mil Jayega . माटी का खिलौना , माटी में मिल जायगा । (कृष्णा भजन )

मान मेरा कहना नहीं तो पछतायेगा ।
माटी का खिलौना , माटी में मिल जाएगा ।।
सुन्दर रूप देख क्यों भूला ,धन यौवन के मद में फूला ।
एक दिन हंसा अकेला उड़ जाएगा ।। माटी का ........
पत्नी सुपति पिता अरू माता , सखा सुमित्र सहोदर भ्राता ।
पल भर में नाता सभी से छूट जाएगा ।। माटी का ...........।
हीरा जवाहर की माला तुम्हारी , मखमल के गद्दे और रेशम की साड़ी ।
धन दौलत और इज्जत तुम्हारी सब यहीं धरा रह जएगा ।। माटी का......।
हीरा जन्म गवाँय दियो सोए सोए , पछताओगे रे मन आँसु बहाय के ।
भाई फिर ऐसा समय न दुबारा आएगा ।। माटी का ................।

Tuesday, 14 April 2015

Radha Raman ,Radha Raman Kaho. (राधा रमण , राधा रमण कहो )।

जिस काम में , जिस नाम नाम में ,जिस धाम में रहो ।
    राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  कहो ।।
  जिस रंग में , जिस ढंग में , जिस संग में रहो ।
     राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  कहो  ।।
    जिस देह में , जिस गेह में , जिस नेह में रहो  ।
   राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  जपो  ।।
    जिस राग में , अनुराग में , बैरांट में रहो  ।
   राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  भजो  ।।
  जिस मान में , सम्मान में , अपमान में रहो  ।
  राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  कहो ।।
      संसार में , परिवार में , घरवार में रहो  ।
 राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  भजो ।।
  जिस हाल में जिस चाल में , जिस डाल में रहो ।
     राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण कहो  ।।
     जिस देश में ,  परदेश में , स्वदेश में रहो । 
    राधा रमण , राधा रमण , राधा रमण  भजो ।।
    

Monday, 13 April 2015

Parvati Jee Ki Aarti. (पार्वती जी की आरती )।

जय पार्वती माता , मैया जय पार्वती माता ।
ब्रह्म सनातन देवी ,   शुभ फल की दाता  ।।
जय पार्वती माता ..................................
अरिकुल पद्म  विनासनि,  जय सेवक  त्राता ।
  जग जीवन जगदम्बा , हरिहर गुण  गाता ।।
जय पार्वती माता ...................................
  सिंह को वाहन साजे ,  कुण्डल है   साथा   ।
  देव बंधु जस गावत ,   नृत्य करत  ता था   ।।
 जय पार्वती माता ................................
 सतयुग रूप शील अति सुन्दर , नाम सति कहलाता ।
 हेमांचल घर जन्मी ,  सखियन  संग राता   । ।
 जय पार्वती माता ..........................................
 शुम्भ निशुम्भ    विदारे ,    हेमांचल स्याता    ।
 सहस्र भुजा तनु धरिके ,  चक्र लियो  हाथा  ।।
 जय पार्वती माता ...........................................
  सृष्टि रूप  तू ही है जननी ,  शिव संग  रंगराता ।
   नन्दी   भृंगी   बीन  लही है , हाथन  मदमाता  ।।
  जय पार्वती माता .....................................
      देवन अरज करत   ,  तब चित  को  लाता ।
        गावत  दे दे ताली ,      मन में रंग  राता ।।
   जय पार्वती माता .................................
    मैंया जी की आरती ,  जो कोई भक्त   गाता ।
   सदा सुखी नित रहता ,    सुख सम्पत्ति पाता ।।
   जय पार्वती माता ......................................

  

Saturday, 11 April 2015

Bhakt Aur Bhagwan Ke Beech Madhur Vinod . (भक्त और भगवान के बीच मधुर विनोद )।

भगवान का एक मुसलमान भक्त थे जिनका नाम अहमदशाह था ।अहमदशाह को प्रायः भगवान श्रीकृष्ण 
के दर्शन होते रहते थे।भगवान उनसे विनोद भी किया करते थे । एक दिन अहमदशाह एक बड़ी लम्बी टोपी
पहन कर बैठे हुए थे। भगवान को उनकी टोपी देखकर हँसी आ गई और उन्हें विनोद करने का ख़्याल आया।
प्रभु भक्त के पास प्रकट होकर बोले, अहमद! मेंरे हाथ अपनी टोपी बेचोगे क्या ? अहमद श्रीकृष्ण को अपने
समीप पाकर तथा उनकी बात सुनकर प्रेम से भर गए , पर उन्हें भी विनोद सूझा ।वे बोले- चलो हटो, दाम देने
के लिए तो कुछ है नहीं और आए हैं टोपी खरीदनें । भगवान ने कहा नहीं जी मेरे पास बहुत कुछ है! तब अहमद
ने कहा , बहुत कुछ क्या है , लोक परलोक की समस्त सम्पत्ति ही तो तुम्हारे पास है , पर वह लेकर मैं क्या करूँगा?
भगवान ने कहा , देखो अहमद यदि तुम इस प्रकार मेरी उपेक्षा करोगे तो मैं संसार में तुम्हारा मूल्य घटा दूँगा । तुम्हें लोग
इसलिए पूछते हैं, तुम्हारा आदर करते हैं कि तुम भक्त हो और मैं भक्त के हृदय में निवास करता हूँ । किंतु अब मैं कह दूँगा
कि अहमद मेरी हँसी उड़ाता है , उसका आदर तुम लोग मत करना । फिर संसार का कोई व्यक्ति तुम्हें नहीं पूछेगा ।
अब तो अहमद भी बड़े तपाक से बोले ,अजी मुझे क्या डर दिखाते हो ? तुम यदि मेरा मूल्य घटा दोगे तो तुम्हारा
मूल्य भी मैं घंटा दूँगा । मैं सबसे कह दूँगा कि भगवान बहुत सस्ते में मिल सकते हैं , वे सर्वत्र रहते हैं , सबके हृदय में
निवास करते हैं ।जो कोई उन्हें अपने हृदय में झाँककर देखना चाहेगा , उसे वे वहीं मिल सकते हैं, कहीं जाने की ज़रूरत नहीं ।
फिर तुम्हारा आदर भी घट जायगा ।
                         भगवान हँसे और बोले - अच्छा अहमद , न तुम्हारी , न मेंरी ठीक है ।
                           और यह कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये ,भक्त अहमद भी प्रभु के ध्यान में
                            लीन हो गये ।
   

Friday, 10 April 2015

Prabhu shriRam Ke Charano Me Shabari Ki Ananya Bhakti. (प्रभू श्रीराम के चरणों में शबरी की अनन्य भक्ति)। ,( श्रीराम चरित मानस ) ।

ताहि देइ  गति राम उदारा । शबरी कें आश्रम पगु धारा ।।
शबरी देखि राम गृहँ आए । मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ।।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला । जटा मुकुट सिर उर बनमाला ।।
स्याम ग़ौर सुंदर दोउ भाई । शबरी परी चरन लपटाई ।।
प्रेम मगन मुख बचन न आवा । पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ।।
सादर जल लै चरन पखारे ।   पुनि सुंदर आसन बैठारे ।।
         
              कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि ।
               प्रेम  सहित प्रभु  खाए   बारंबार    बखानि ।।

  पानि जोरि आगे भइ  ठाढी । प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ।।
  केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी । अधम जाति मैं जड़मति भारी ।।
  अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ।।
  कह रघुपति सुनु भामिनि बाता ।    मानउँ एक भगति कर नाता ।।
    जाति पाँति कुल  धर्म बड़ाई  ।  धन बल परिजन गुन चतुराई ।।
       भगति हीन नर सोहइ कैसा ।  बिनु  जल बारिद देखिअ जैसा ।।

Kanha Tatha Baldaoo Dwara Makhan Roti Kee Mang. कान्हा तथा बलदाऊ द्वारा माखन रोटी की माँग । ( सूरदास जी के पद ) ।

दोउ भैया मैया पै माँगत , दै री मैया , माखन रोटी ।
सुनत भावती बात सुतनिकी , झूटहिं धाम के काम अगोटी ।।
बल ज़ू गह्यो नासिका मोती , कान्ह कुँवर गहि दृढ़ करि चोटी ।
मानो हंस मोर भष लीन्हें , कबि उपमा बरनै कछु छोटी ।।
यह छबि देखि नंद मन आनन्द , अति सुख हँसत जात हैं लोटी ।
सूरदास मन मुदित जसोदा , भाग बड़े , कर्मनि दो मोटी।।



Thursday, 9 April 2015

Lakshmi Jee Ki Aarti .लक्ष्मी जी की आरती ।

ओम् जय लक्ष्मी माता , मैया जय लक्ष्मी माता ।
  तुमको निशदिन सेवत , हर विष्णु धाता ।।
  उमा, रमा ब्रह्माणी , तुम ही जग-माता ।
 सूर्य - चन्द्रमा ध्यावत , नारद  ऋषि गाता ।।
  दुर्गा रूप निरंजिनि , सुख सम्पत्ति दाता  ।
 जो कोई तुमको ध्यावत , ऋद्धि - सिद्धि पाता ।।
तुम पाताल - निवासिनि , तुम ही शुभदाता ।
कर्म -प्रभाव - प्रकाशिनि , भवनिधि की त्राता ।।
जिस घर में तुम रहती , सब सदगुण आता ।
   सब संभव हो जाता ,मन नहीं घबराता ।।
तुम बिन यज्ञ न होवे , वस्त्र न कोई पाता ।
खान-पान का वैभव , सब तुमसे आता ।।
शुभ- गुण  मंदिर  सुन्दर , क्षीरोदधि - जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन , कोई नहीं पाता ।।
माँ लक्ष्मीजी की आरती , जो कोई जन गाता ।
उर आनन्द समाता , पाप उतर जाता ।।
ओम् जय लक्ष्मी माता ,मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निशदिन सेवत , हर विष्णु धाता ।।

Saraswati Jee Ki Aarti .सरस्वती जी की आरती ।

जय सरस्वती माता , मैया जय सरस्वती माता ।
सदगुण वैभव शालिनि , त्रिभुवन विख्याता ।।
  चन्द्रवदनि पद्मासिनि , द्युति मंगलकारी ।
सोहे शुभ हंस सवारी , अतुल तेजधारी ।।
जय सरस्वती माता................................
बाएँ कर में वीणा , दाएँ कर माला ।
शीश मुकुट मणि सोहे , गल मोतियन माला ।।
जय सरस्वती माता ,....................................
देवी शरण जो आए , उनका उद्धार किया ।
पैठि मंथरा दासी , रावण संहार किया ।।
जय सरस्वती माता .......................................
विद्या ज्ञान प्रदायिनि , ज्ञान प्रकाश भरो ।
मोह अज्ञान और तिमिर का , जग से नाश करो ।।
जय सरस्वती माता .......................................
धूप दीप फल मेवा , माँ स्वीकार करो ।
ज्ञान चक्षु दे माता , जग निस्तार करो ।।
जय सरस्वती माता ,...........................................
माँ सरस्वती की आरती , जो कोई जन गावे ।
हितकारी सुखकारी , ज्ञान भक्ति पावै ।।
जय सरस्वती माता , मैया जय सरस्वती माता 
सद्गुण वैभव शालिनि , त्रिभुवन विख्याता ।।


Wednesday, 8 April 2015

Gopee virah Geet .(गोपी विरह गीत )।

बिन तेरे सुना जग कान्हा ,नैना जल बरसाये ।
जाने कौन घड़ी गये तुम कान्हा , लौट कर कभी न आये ।।
पूछूँ मैं फूलो से भँवरों से कलियों और लताओं से ।
चले गये कहाँ तुम प्रियतम मुझको बिन बतलाये ।।
जाने कौन घड़ी गये तुम कान्हा ,लौटकर कभी न आये ।
काले बादल घिर घिर आये कान्हा तेरी याद दिलाये ।
मन बेसुध हुआ जाये , तेरे बिन अब तो रहा न जाये ।।
जाने कौन घड़ी गये तुम कान्हा लौट कर कभी न आये ।।



ShriMan Narayan.श्री मन नारायण नारायण नारायण ( श्री कृष्ण भजन ) ।

श्रीमन नारायण नारायण नारायण ।
भज मन नारायण नारायण नारायण ।।
शबरी के बेर सुदामा के टन्डुल ,
रुचि रुचि भोग लगायों न ।
श्रीमन नारायण  नारायण नारायण ,
 भज मन नारायण नारायण नारायण ।
 गज की पुकार पे दौड़े चले आये प्रभू,
 ग्राह्य से रक्षा कीनी ना ।
 श्रीमन नारायण नारायण नारायण,
 भज मन नारायण नारायण नारायण ।
 दुर्योधन घर मेवा त्यागे प्रभू ,
 साग विदुर घर खाये न।
श्रीमन नारायण................................
भज मन नारायण................................।
 द्रुपद सुता की लाज बचायो ,
चीर बढ़ायो भारी न ।
 श्रीमन नारायण नारायण .........................,
 भज मन नारायण .......................................।
 प्रेम के वश अर्जुन रथ हाँक्यो ,
 भूल गए ठकुराई न ।
 श्रीमन नारायण नारायण .................................,
भज मन नारायण नारायण ...................................।

Tuesday, 7 April 2015

Kanha Ne Mati Khayee , Yasoda Mero Maiyaकान्हा ने माटी खाई । यशोदा सुन माई ।। (कृष्णा भजन )।

तेरे लाला ने माटी खाई । यशोदा सुन माई ।।
छोटी सी माटी की ढेली। तुरन्त श्याम ने मुँह में ले ली ।।
यह भी लीला एक नवेली ।जाने गटक- गटक गटकाई ।।
तेरे लाला ने माटी खाई ।यशोदा सुन माई ।।
दूध, दही को कबहुँ नाँय नाटी ।क्यों लाला तूने  खाई माटी ।।
यशोदा ले धमकावे साँटी ।जाय नेक दया नहिं आई ।।
तेरे लाला ने माटी खाई ।.......................,,......
मोहन का मुख खुलवायो। तीन लोक मुख में दर्शायो ।।
तब विश्वास यशोदा आयो । तू है पूरण ब्रह्म कन्हाई ।।
तेरे लाला ने माटीखाई ....................................
इतना स्वाद नहीं माखन में । मेवा मिश्री अरु दाखन में ।।
जितना रस ब्रज रज चाखन में । या ने मुक्ति की मुक्ति कराई ।।
तेरे लाला ने माटी खाई । यशोदा सुन माई ।।


Shri Ram Chandra Kripalu Bhaj Man .Shri Ram Stuti (श्री राम स्तुति )।

श्री राम चन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारूणम् ।
नव कंजलोचन कंज मुख, कर कंज, पद कंजारूणम् ।।
कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम् ।
पटपीत मानहुं तड़ित  रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम् ।।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्यवंश निकन्दनम् ।
रघुनन्द आनन्दकन्द कौशलचन्द दशरथ नन्दनम् ।।
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदार अंग विभूषणम् ।
आजानुभुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणम् ।।
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम् ।
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनम् ।।
मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो ।
करुणा निधान सुजान शील सनेहू, जानत रावरो ।।
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषी अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली ।।
दोहा- जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषि न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।




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