Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Thursday, 29 October 2015

Karwa chauth Vrat Katha.

कार्तिक मास में कृष्णपक्ष के चतुर्थी को करवा चौथ मनाया जाता है।इस दिन गणेश जी का पूजन होता है ।इस दिन सुहागन स्त्रीयाँ अपने पति की लम्बी आयु के लिये व्रत रखती है।प्राचीन काल में द्विज नामक ब्राह्मण के सात पुत्र और एक पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था।वीरावती विवाह के बाद प्रथम बार करवा चौथ का व्रत कर रही थी।भूख प्यास से व्याकुल होने के कारन मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ी।बहन को इस अवस्था में देखकर वीरावती के भाइ परेशान होकर रोने लगे और जल से मुँह धुलवाकर, एक भाई वट के वृक्ष पर चढ़कर चलनी में दीपक दिखाकर बहन से कहा कि चन्द्रमा निकल आया है।बहन ने भी उस अग्निरूप को चन्द्रमा समझ कर अर्ध दे कर भोजन के लिये बैठी। पहले कौर में बाल निकला , दूसरे कौर में छींक हुई, तीसरे कौर में ससुराल से बुलावा आ गया।ससुराल जाने पर उसने देखा , उसका पति मृत पड़ा है ।बहन ने सोचा मैंने तो एेसा कोई अपराध नहीं किया, जिस पाप का दण्ड मुझे मिल रहा है।सारे संसार की नारियाँ आज अपने सुहाग की शुभ कामना तथा दीर्घायु के लिये पूजा कर रही हैं, और मेरे पति इस अवस्था में पड़े हैं।वीरावती विलाप करने लगी।तभी वहाँ इन्द्राणी आई ,विलाप करती हुई इरावती बोली हे माँ ! यह किस अपराध का मुझे दण्ड मिला। माँ ! मेरे पति को जीवित कर दो । माँ से उसने प्रार्थना करते हुये कहा। इन्द्राणी ने कहा कि तुमने करवा चौथ व्रत में बिना चाँद निकले चन्द्रमाँ को अर्ध दे दिया था , यह सब उसी के फल से हुआ है अत: अब तुम बारह माह के चौथ के व्रत व करवाचौथ व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ विधिपूर्वक करो तब तुम्हारा पति पुन: जीवित हो जायेगा।इन्द्राणी के वचन सुन वीरावती ने विधि पूर्वक बारह माह के चौथ तथा करवाचौथ व्रत को बड़ी भक्ति - भाव के साथ किया और इस व्रत के प्रभाव से वीरावती का पति पुन: जीवित हो उठा ।इस तरह करवाचौथ व्रत से  जैसे वीरावती के सुहाग  की रक्षा हुई , वैसे ही माता सभी स्त्रियों के सुहाग की रक्षा करें।

BhaiDooj Ki Katha ( yam Dwitia ) .

भगवान् सूर्यनारायण की पत्नी का नाम छाया था। उन्हीं की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था ।यमुना अपने भाई यमराज  से बड़ा स्नेह करती थी। वह भाई से हमेशा निवेदन करती थी कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करे। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ल द्वितीया का दिन आया । यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर उसे अपने घर आने के लिए वचनवद्ध कर लिया।

                    यमराज ने सोचा -- मैं तो प्राणों को हरने वाला हूँ । मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता है। बहिन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है , उसका पालन करना भी मेरा धर्म है। बहिन के घर आते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया।यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा।उसने स्नान तथा पूजा करके अनेक व्यंजन परोसकर भाई को भोजन कराया। यमुना द्वारा किये गये आतिथेय से यमराज ने प्रसन्न होकर बहिन को वर माँगने को कहा।यमुना ने कहा --- भद्र! आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो बहिन इस दिन अपने भाई को आदर - सत्कार करके टीका लगाए , उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह ली। इसी दिन से इस पर्व की परम्परा बनी।ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहिनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता है। इसलिये भैयादूज में यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।

   यदि बहिन अपने हाथ से भोजन बनाकर भाई को खिलाये , तो भाई की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। इस दिन बहिन के घर भोजन करने का विशेष महत्व है।बहिन सगी या रिस्ते में अथवा धर्म की भी हो सकती है।

इस पर्व का महत्व तथा लक्ष्य , बहिन - भाई के पावन सम्बन्ध तथा समाज में प्रेमभाव की स्थापना करना है।इस दिन बहिनें अपने भाईयों के स्वस्थ जीवन एवं दीर्घायु होने की कामनाकरती हैं।संसार में बहिन - भाईयों को प्रेम से रहते देखकर उनके पूर्वज तथा देवता सभी मिलकर उनको आशीर्वाद देते हैं। 

 

Wednesday, 28 October 2015

Ath Sapt Shloki Ma Durga Ke Siddh Mantra.

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जाहि  ।।१ ।। (आरोग्य और सौभाग्यकी प्राप्ति के लिए )

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:         ( दारिद्रयदु:खादिनाश के लिए )
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव  शुभां  ददासि ।
दारिद्रयदु:खभयहारिणी  का  त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय  सदार्द्रचित्ता ।।२ ।।

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।   ( सब प्रकार के कल्याण के लिए )
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते ।।३ ।।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।                  ( विपत्ति नाश  के लिए )
सर्वस्यार्तिहरे देवि  नारायणि नमोस्तु ते  ।।४ ।।

सर्वस्वरूपे  सर्वेशे  सर्वशक्तिसमन्विते ।           (भय - नाश के लिए मंत्र। )
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ।।५ ।।

रोगानशेषनपहंसि तुष्टा               ( रोग- नाश के लिए )
रूष्टातु कामान सकलानभीष्टान।
त्वाममश्रिताम न विपन्नाणाम्
त्वाममश्रितां ह्राश्रयतां प्रयान्ति ।।६ ।।

सर्वबाधाप्रशमनं  त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि  ।     ( बाधा - शांति के लिए )
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।७ ।।

इति सप्त श्लोकी दुर्गा सम्पूर्णम् ।।

Monday, 12 October 2015

Durga Maa Ki Stuti , Devyaparadhkshmapan Stotram. (देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् )



न  मन्त्रं  नो  यन्त्रं  तदपि च न जाने स्तुतिमहो:
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने  स्तुतिकथा ।
न  जाने  मुद्रास्ते  तदपि च  न  जाने  विलपनं
 परं  जाने  मातस्त्वदनुसरणं   क्लेशहरणम्   ।।१ ।।

हे मात: ! मैं तुम्हारा मन्त्र , यन्त्र , स्तुति , आवाहन , ध्यान स्तुतिकथा , मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता , परन्तु सब प्रकार के कलेशों को दूर करने वाला , आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ ।

विधेर ज्ञानेन  द्रविणविरहेणा लसतया
विधेया शक्यत्वात्तव  चरणयोर्या  च्युतिरभूत ।
तदेतत्  क्षन्तव्यं जननी सकलोद्धारिणि  शिवे 
कुपुत्रो  जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति  ।।२ ।।

सबका उद्धार करने वाली हे करूणामयी माता ! तुम्हारी पूजा की विधि न जानने के कारण, धनके अभाव में , आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण , तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ।

पृथिव्यां  पुत्रास्ते  जननि  बहव:  सन्ति  सरला: 
परं  तेषां  मध्ये  विरलतरलोअहं  तव  सुत:  ।
मदीयोयं  त्याग:  समुचितमिदं  नो  तव  शिवे 
कुपुत्रो  जायेत क्वचिदपि  कुमाता न  भवति   ।।३ ।।

माँ! भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेकों हैं पर उनमें एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे! मुझे त्याग देना तुम्हें उचित नहीं,क्योंकि पूत  तो  कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ।

जगन्मातार्मातस्तव  चरण सेवा न  रचिता 
न वा दत्तं देवी द्रविणमपि भूयस्तव  मया ।
तथापि  त्वं स्नेहं  मयि  निरूपमं  यत्प्रकुरुषे 
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति  ।।४ ।।

हे जगदम्ब ! हे माँ ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिये प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया , तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है कि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती।

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया ,
मयापंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि   ।
इदानीं चेन्मास्तव यदि कृपा नापि भविता ,
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ।। ५ ।।

हे गणेशजननि ! मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने पर विविध विधियों द्वारा पूजा करने से घबड़ा कर सब देवों को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊँ ?

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा ,
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटि कनकै:  ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं   , 
जन: को जानीते जननि जपनीयं जप विधौ  ।। ६ ।।

हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मन्त्राक्षरों के कान में पड़ते ही चाण्डाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बनकर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है , उसे कौन जान सकता है ?

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पपटधरो , 
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति: ।
कपाली भूतेशो भवति जगदीशैकपदवीं ,
भवानी त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटी फलमिदम् ।। ७ ।।

जो चिता का भस्म रमाये हैं , विष पीते हैं , दिगम्बर हैं , जटाजूट बाँधे हैं , गले में सर्पमाला है, हाथ में खप्पर लिए हैं , पशुपति और भूतों के स्वामी हैं , ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है , वह हे भवानी ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है।

न मोक्ष्याकांक्षा भवविभववाँक्षापि च न मे ,
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन: ।
अतस्त्वां  संयाचे जननि जननं यातु मम वै  , 
मृडानी रूद्राणी शिव शिव  भवानीति जपत: ।।८ ।।

हे चन्द्रमुखी माता ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है , सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है , विज्ञान तथा सुख की भी अभिलाषा नहीं है , इसलिए मैं तुमसे यही माँगता हूँ कि मेरी सारी आयु मृडानी , रूद्राणी , शिव - शिव , भवानी आदि नामों जपते- जपते ही बीते।

नाराधितासि विधिना विविधौपचारै: , 
किं रक्षचिन्तनपरैर्न कृतं  वचौभि:  ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्नाथे ,
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव   ।।९ ।।

हे श्यामे ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं की ।यही नहीं , इसके विपरीत अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या नहीं किया ? फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह उचित ही है, क्योंकि तुम मेरी माता हो ।

आपत्सु  मग्न:  स्मरणं  त्वदीयं ,
  करोमि  दुर्गे  करूणार्णेश       ।
नैतच्छठत्वं   मम      भावयेथा:  ,
क्षुदातुषार्ता  जननीं   स्मरन्ति    ।।१०  ।।

हे दुर्गे ! हे दयासागर महेश्वरी ! जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो केवल तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ , इसे मेरी धृष्टता न समझना माँ ! क्योंकि भूखे प्यासे बालक अपनी माँ को ही याद करते हैं।

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करूणास्ति चेन्मयि, ।
अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते  सुतम्  ।। ११ ।।

हे जगज्जनी ! मुझपर तुम्हारी पूर्ण कृपा है , इसमें आश्चर्य ही क्या है ? क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती।

मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि , 
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरू   ।। १२ ।।

हे महादेवि ! मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पापोंका नाश करने वाला नहीं है , यह जानकर जैसा उचित समझो , वैसा करो ।

       इति श्रीमच्छ़्ड़्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् ।





Sunday, 11 October 2015

Aarti Shri Ambe Jee Ki ( आरती श्री अम्बे जी की )

जय अम्बे गौरी , मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी ।। १।।जय अंबे

माँग सिन्दूर विराजत , टीको मृगमद को ।
उज्जवल से दोउ नैना , चन्द्रवदन नीको  ।।२ ।।जय अंबे

कनक समान कलेवर , रक्ताम्बर राजे  ।
रक्तपुष्प गल माला ,  कण्ठन पर साजे ।।३ ।।जय अंबे

केहरि वाहन राजत , खड़ग खप्पर धारी ।
सुर - नर - मुनि - जन सेवत , तिनके दुखहारी ।।४ ।। जय अंबे

कानन कुंडल शोभित , नासाग्रे मोती  ।
कोटिक चन्द्र दिवाकर - राजत सम ज्योति ।।५ ।। जय अंबे 

शुम्भ  निशुम्भ विडारे , महिषासुर - घाती  ।
धूम्रविलोचन  नैना   निशदिन   मदमाती  ।।६ ।। जय अंबे

चण्ड  मुण्ड  संहारे , शोणितबीज   हरे  ।
मधु  कैटभ  दोउ  मारे ,  सुर  भयहीन करे ।।७ ।। जय अंबे 

ब्रह्माणी  रुद्राणी ,  तुम  कमलारानी  ।
आगम -निगम - बखानी , तुम शिव -पटरानी ।।८ ।।जय अंबे

चौसठ योगिनी गावत ,  नृत्य करत  भैरूं। 
बाजत ताल मृदंगा,    और बाजत  डमरू ।।९ ।। जय अंबे

भुजा  अष्ट अति शोभित ,  वर मुद्रा धारी ।
मन वांछित फल पावत ,   सेवत नर - नारी ।।१० ।। जय अंबे 

तुम ही जग की माता , तुम ही हो भरता ।
भक्तन के दुख हरता , सुख सम्पत्ति करता ।।११ ।।

कंचन थाल विराजत , अगर  कपूर  बाती  ।
श्री मालकेतू में राजत , कोटि रतन ज्योति ।।१२ ।।जय अंबे

श्री अम्बेजी की आरती  जो कोई नित गावै ।
कहत शिवानन्द स्वामी ,  सुख सम्पति पावै ।।१३  ।। जय अंबे



Durga Maa Se Kshama Prarthana दुर्गा माँ से क्षमा प्रार्थना

आपत्सु  मग्न:  स्मरणं  त्वदीयं ।
करोमि  दुर्गे  करूणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं   मम   भावयेथा:  ।
क्षुधातृषार्ता   जननीं  स्मरन्ति  ।।

हे दुर्गे!  हे दयासागर  महेश्वरी !  जब  मैं किसी विपत्ति  में पड़ता हूँ , तो तुम्हारा ही  स्मरण करता हूँ । इसे तुम मेरी धृष्टता मत समझना , क्योंकि  भूखे - प्यासे बालक अपनी माँ को ही याद किया करते हैं ।

जगदम्ब   विचित्रमत्र  किं ,
परिपूर्णा  करूणास्ति  चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं  न   हि ।
माता  समुपेक्षते   सुतम्    ।।

हे जगज्जननी !  मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है , इसमें आश्चर्य ही क्या है?  क्योंकि  अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देतीं ।

मत्सम:  पातकी  नास्ति 
पापघ्नी  त्वत्समा न  हि ।
एवं  ज्ञात्वा   महादेवी  
यथा  योग्यं  तथा  कुरू  ।।

हे महादेवी ! मेरे समान कोई पापी नहीं है , और तुम्हारे समान कोई पाप का नाश करने वाला नहीं है , यह जानकर जैसा उचित समझो माँ! वैसा ही करो ।




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Durga Kavach (hindi translation) श्री दुर्गा कवचम् (हिन्दी अनुवाद के साथ )

।।ओम् नमश्चण्डिकायै ।।

मार्कण्डेय उवाच:

ओम् यद् गुह्यं परमं लोके
सर्वरक्षाकरं   नृणाम्   ।
यन्न    कस्यचिदाख्यातं
तन्मे ब्रूहि   पितामह ! ।।१ ।।।

मार्कण्डेय जी ने कहा है ---हे पितामह! जो साधन संसार में अत्यन्त गोपनीय है, जिनसे मनुष्य मात्र की रक्षा होती है, वह साधन मुझे बताइए ।
           ब्रह्मोवाच:

अस्ति गुह्यतमं विप्र !
सर्व-  भूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं
तच्छृणुष्व   महामुने ।।२ ।।

ब्रह्मा जी ने कहा --हे ब्राह्मन!  सम्पूर्ण प्राणियों का कल्याण करने वाला देवों का कवच ( रक्षा कवच ) यह स्तोत्र है,इनके पाठ करने से साधक सदैव सुरक्षित रहता  है, अत्यन्त गोपनीय है, हे महामुने! उसे सुनिए ।

प्रथमं  शैलपुत्री च , द्वितीयं  ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्दघण्टेति ,  कूष्माण्डेति  चतुर्थकम् ।।३ ।।

हे मुने ! दुर्गा माँ की नव शक्तियाँ हैं-----पहली शक्ति का नाम शैलपुत्री ( हिमालय कन्या पार्वती ) , दूसरी शक्ति का नाम ब्रह्मचारिणी (परब्रह्म परमात्मा को साक्षात कराने वाली ) , तीसरी शक्ति चन्द्रघण्टा हैं। चौथी शक्ति कूष्माण्डा ( सारा संसार जिनके उदर में निवास करता हो ) हैं।

पंचमं  स्कन्दमातेति , षष्ठं कात्यायनीति  च ।
सप्तमं   कालरात्रीति , महागौरीति  चाष्टमम् ।। ४ ।।

पाँचवीं शक्ति स्कन्दमाता ( कार्तिकेय की जननी ) हैं।छठी शक्ति कात्यायनी (महर्षि कात्यायन के अप्रतिभ तेज से उत्पन्न होने वाली) हैं सातवीं शक्ति कालरात्रि ( महाकाली ) तथा आठवीं शक्ति महागौरी हैं।

नवमं  सिद्धिदात्री , च  नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि  नामानि , ब्रह्मणैव महात्मना ।।५ ।।

नवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं और ये नव दुर्गा कही गई हैं।

अग्निना दह्यमानस्तु , शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव , भयार्ता: शरणं गता: ।।६ ।।

जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, युद्ध भूमि मे शत्रुओं से घिर गया हो तथा अत्यन्त कठिन विपत्ति में फँस गया हो, वह यदि भगवती दुर्गा की शरण का सहारा ले ले ।

न तेषां जायते , किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि , शोक-दु:ख भयं न हि ।।७ ।।

तो इसका कभी युद्ध या संकट में कोई कुछ विगाड़ नहीं सकता , उसे कोई विपत्ति घेर नहीं सकती न उसे शोक , दु:ख तथा भय की प्राप्ति ही हो सकती है।

यैस्तु भक्तया स्मृता नूनं , तेषां वृद्धि : प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि ! , रक्षसे तान्न  संशय: ।।८ ।।

जो लोग भक्तिपूर्वक भगवती का स्मरण करते हैं , उनका अभ्युदय होता रहता है। हे भगवती ! जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं , निश्चय ही तुम उनकी रक्षा करती हो।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा , वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा , वैष्णवी  गरूड़ासना   ।।९ ।।

चण्ड -मुण्ड का विनाश करने वाली देवी चामुण्डा प्रेत के वाहन पर निवास करती हैं ,वाराही महिष के आसन पर रहती हैं , ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है, वैष्नवी का वाहन गरुड़  है।

माहेश्वरी  वृषारूढ़ा ,  कौमारी शिखिवाहना  ।
लक्ष्मी:  पद्मासना देवी , पद्महस्ता  हरिप्रिया ।।१० ।।

माहेश्वरी बैल के वाहन पर तथा कौमारी मोर के आसन पर विराजमान हैं। श्री विष्णुपत्नी भगवती लक्ष्मी  के हाथों में कमल है तथा वे कमल के आसन पर निवास करती हैं।

श्वेतरूपधरा   देवी , ईश्वरी   वृषवाहना  ।
ब्राह्मी   हंससमारूढ़ा , सर्वाभरण भूषिता ।।११।।

श्वेतवर्ण वाली ईश्वरी वृष-बैल पर सवार हैं , भगवती ब्राह्मणी ( सरस्वती ) सम्पूर्ण आभूषणों से युक्त हैं तथा वे हंस पर विराजमान रहती हैं।

इत्येता  मातर:  सर्वा: , सर्वयोग समन्विता ।
नाना भरण शोभाढ्या ,नानारत्नोपशोभिता: ।।१२ ।।

अनेक आभूषण तथा रत्नों से देदीप्यमान उपर्युक्त सभी देवियाँ सभी योग शक्तियों से युक्त हैं।

दृश्यन्ते  रथमारूढ़ा , देव्य:  क्रोधसमाकुला: ।
शंख  चक्र  गदां शक्तिं, हलं च मूसलायुधम् ।।१३ ।।

इनके अतिरिक्त और भी देवियाँ हैं, जो दैत्यों के विनाश के लिए तथा भक्तों की रक्षा के लिए क्रोधयुक्त रथ में सवार हैं तथा उनके हाथों में शंख ,चक्र ,गदा ,शक्ति, हल, मूसल हैं।

खेटकं  तोमरं  चैव , परशुं  पाशमेव  च  ।
कुन्तायुधं  त्रिशूलं  च ,  शार्ड़गमायुधमुत्तमम्।।१४।।

खेटक, तोमर, परशु , (फरसा) , पाश , भाला, त्रिशूल तथा उत्तम शार्ड़ग धनुष आदि अस्त्र -शस्त्र हैं।

दैत्यानां  देहनाशाय , भक्तानामभयाय  च ।
धारन्तया  युधानीत्थ , देवानां च हिताय वै ।।१५ ।।

जिनसे देवताओं की रक्षा होती है तथा देवी जिन्हें दैत्यों को नाश तथा भक्तों के मन से भय नाश करने के लिए धारण करती हैं।

नमस्तेस्तु  महारौद्रे  , महाघोर  पराक्रमें ।
महाबले  महोत्साहे ,  महाभयविनाशिनि ।।१६ ।।

महाभय का विनाश करने वाली , महान बल, महाघोर क्रम तथा महान उत्साह से सुसम्पन्न हे महारौद्रे तुम्हें नमस्कार है।

त्राही मां देवि ! दुष्प्रेक्ष्ये , शत्रूणां भयवद्धिनि ।
प्राच्यां  रक्षतु  मामेन्द्री , आग्नेय्यामग्निदेवता ।।१७ ।।

हे शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली देवी ! तुम मेरी रक्षा करो। दुर्घर्ष तेज के कारण मैं तुम्हारी ओर देख भी नहीं सकता । ऐन्द्री शक्ति पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें तथा अग्नि देवता की आग्नेयी शक्ति अग्निकोण में हमारी रक्षा करें।

दक्षिणेअवतु  वाराही , नैरित्वां  खडगधारिणी ।
प्रतीच्यां वारूणी रक्षेद्- , वायव्यां  मृगवाहिनी ।।१८ ।।

वाराही शक्ति दक्षिन दिशा में, खडगधारिणी नैरित्य कोण में, वारुणी शक्ति पश्चिम दिशा में तथा मृग के ऊपर सवार रहने वाली शक्ति वायव्य कोण में हमारी रक्षा करें।

उदीच्यां पातु कौमारी , ईशान्यां  शूलधारिणी ।
उर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद , धस्ताद्  वैष्नवी तथा ।।१९ ।।

भगवान कार्तिकेय की शक्ति कौमारी उत्तर दिशा में , शूल धारण करने वाली ईश्वरी शक्तिईशान कोण में ब्रह्माणी ऊपर तथा वैष्नवी शक्ति नीचे हमारी रक्षा करें।

एवं दश दिशो रक्षे , चामुण्डा  शववाहना ।
जया मे चाग्रत: पातु , विजया पातु पृष्ठत: ।।२० ।।

इसी प्रकार शव के ऊपर विराजमान चामुण्डा देवी दसों दिशा में हमारी रक्षा करें।आगे जया ,पीछे विजया हमारी रक्षा करें।

अजिता वामपाश्वे तु , दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षे, दुमा मूर्घिन व्यवस्थिता ।।२१ ।।

बायें भाग में अजिता, दाहिने हाथ में अपराजिता, शिखा में उद्योतिनी तथा शिर में उमा हमारी रक्षा करें।

मालाधरी ललाटे च , भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा  च  भ्रूवोर्मध्ये , यमघण्टा च नासिके ।।२२ ।।

ललाट में मालाधरी , दोनों भौं में यशस्विनी ,भौं के मध्य में त्रिनेत्रा तथा नासिका में यमघण्टा हमारी रक्षा करें।

शंखिनी  चक्षुषोर्मध्ये , श्रोत्रयोर्द्वार   वासिनी ।
कपोलो कालिका रक्षेत् , कर्णमूले  तु  शांकरी ।।२३ ।।ल

दोनों नेत्रों के बीच में शंखिनी , दोनों कानों के बीच में द्वारवासिनी , कपाल में कालिका , कर्ण के मूल भाग में शांकरी हमारी रक्षा करें।

नासिकायां सुगंधा  च , उत्तरोष्ठे  च  चर्चिका ।
अधरे   चामृतकला , जिह्वायां  च  सरस्वती ।।२४ ।।

नासिका के बीच का भाग सुगन्धा , ओष्ठ में चर्चिका , अधर में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती हमारी रक्षा करें।

दन्तान् रक्षतु कौमारी , कण्ठ देशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघंटा च , महामाया च तालुके ।।२५ ।।

कौमारी दाँतों की , चंडिका कण्ठ-प्रदेश की , चित्रघंटा गले की तथा महामाया तालु की रक्षा करें।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् , वाचं  मे  सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली  च ,  पृष्ठवंशे  धनुर्धरी   ।।२६ ।।

कामाक्षी ठोढ़ी की , सर्वमंगला वाणी की , भद्रकाली ग्रीवा की तथा धनुष को धारण करने वाली रीढ़ प्रदेश की रक्षा करें।

नीलग्रीवा  बहि:कण्ठे  ,  नलिकां  नलकूबरी  ।
स्कन्धयो:  खंगिनी  रक्षेद् ,  बाहू मे वज्रधारिनी ।।२७ ।।

कण्ठ से बाहर नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी , दोनों कन्धों की खंगिनी तथा वज्र को धारण करने वाली दोनों बाहु की रक्षा करें।

हस्तयोर्दण्डिनी  रक्षे - ,  दम्बिका चांगुलीषु च ।
नखाच्छुलेश्वरी  रक्षेत् ,  कुक्षौ रक्षेत्  कुलेश्वरी ।।२८ ।।

दोनों हाथों में दण्ड को धारण करने वाली तथा अम्बिका अंगुलियों में हमारी रक्षा करें । शूलेश्वरी नखों की तथा कुलेश्वरी कुक्षिप्रदेश में स्थित होकर हमारी रक्षा करें ।

स्तनौ  रक्षेन्महादेवी , मन:शोक   विनाशिनी ।
हृदये  ललिता  देवी ,  उदरे  शूलधारिणी  ।।२९ ।।

महादेवी दोनों स्तन की , शोक को नाश करने वाली मन की रक्षा करें । ललिता देवी हृदय में तथा शूलधारिणी उत्तर प्रदेश में स्थित होकर हमारी रक्षा करें ।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् ,  गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना  कामिका  मेद्रं ,  गुदे  महिषवाहिनी  ।।३० ।।

नाभि में कामिनी तथा गुह्य भाग में गुह्येश्वरी हमारी रक्षा करें। कामिका तथा पूतना लिंग की तथा महिषवाहिनी गुदा में हमारी रक्षा करें।

कट्यां   भगवती  ,  रक्षेज्जानुनि   विन्ध्यवासिनी ।
जंघे   महाबला रक्षेद् ,   सर्वकामप्रदायिनी     ।।३१ ।।

भगवती कटि प्रदेश में तथा विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें। सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाली  महाबला जांघों की रक्षा करें।

गुल्फयोर्नारसिंही  च  , पादपृष्ठे तु  तैजसी ।
पादाड़्गुलीषु  श्री रक्षेत् , पादाधस्तलवासिनी ।।३२ ।।

नारसिंही दोनों पैर के घुटनों की , तेजसी देवी दोनों पैर के पिछले भाग की, श्रीदेवी पैर की अंगुलियों की तथा तलवासिनी पैर के निचले भाग की रक्षा करें।

नखान्  दंष्ट्राकराली  च , केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी  ।
रोमकूपेषु  कौनेरी  ,       त्वचं वागीश्वरी तथा ।।३३ ।।

दंष्ट्राकराली नखों की , उर्ध्वकेशिनी देवी केशों की , कौवेरी रोमावली के छिद्रों में तथा वागीश्वरी हमारी त्वचा की रक्षा करें।

रक्त-मज्जा - वसा -मांसा , न्यस्थि- मेदांसि  पार्वती ।
अन्त्राणि  कालरात्रिश्च , पित्तं च मुकुटेश्वरी  ।।३४ ।।

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस , हड्डी और मेदे की रक्षा करें । कालरात्रि आँतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें ।

पद्मावती   पद्मकोशे , कफे  चूड़ामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी  नखज्वाला , मभेद्या  सर्वसन्धिषु ।।३५ ।।

पद्मावती सहस्र दल कमल में , चूड़ामणि कफ में , ज्वालामुखी नखराशि में उत्पन्न तेज की तथा अभेद्या सभी सन्धियों में हमारी रक्षा करें।

शुक्रं  ब्रह्माणिमे  रक्षे , च्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं ,   रक्षेन् मे धर्मधारिणी  ।।३६ ।।

ब्रह्माणि शुक्र की , छत्रेश्वरी छाया की , धर्म को धारण करने वाली , हमारे अहंकार , मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ    तथा , व्यानमुदान च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेद , प्राणंकल्याणं शोभना ।।३७ ।।

वज्रहस्ता प्राण , अपान , व्यान , उदान तथा समान वायु की , कल्याण से सुशोभित होने वाली कल्याणशोभना ,हमारे प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे गन्धे च , शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्वं   रजस्तमश्चचैव , रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८ ।।

रस , रूप , गन्ध , शब्द तथा स्पर्श रूप विषयों का अनुभव करते समय योगिनी तथा हमारे सत्व , रज , एवं तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें ।

आयु रक्षतु वाराही , धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यश: कीर्ति च लक्ष्मी च , धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९ ।।

वाराही आयु की , वैष्णवी धर्म की , चक्रिणी यश और कीर्ति की , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि  मे  रक्षेत् , पशुन्मे  रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मी ,    भार्यां रक्ष्तु  भैरवी ।।४० ।।

हे इन्द्राणी , तुम मेरे कुल की तथा हे चण्डिके , तुम हमारे पशुओं की रक्षा करो ।हे महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की तथा भैरवी देवी हमारी स्त्री की रक्षा करें।

पन्थानं  सुपथा  रक्षेन्मार्गं , क्षेमकरी    तथा ।
राजद्वारे   महालक्ष्मी , र्विजया  सर्वत: स्थिता ।।४१ ।।

सुपथा हमारे पथ की , क्षेमकरी ( कल्याण करने वाली ) मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया भयों से हमारी रक्षा करें।

रक्षाहीनं  तु  यत्  स्थानं , वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं  रक्ष मे  देवी !  जयन्ती  पापनाशिनी ।।४२ ।।

हे देवी ! इस कवच में जिस स्थान की रक्षा नहीं कही गई है उस अरक्षित स्थान में पाप को नाश करने वाली , जयन्ती देवी ! हमारी रक्षा करें।

पदमेकं   न   गच्छेतु , यदीच्छेच्छुभमात्मन:   ।
कवचेनावृतो   नित्यं  ,  यत्र  यत्रैव  गच्छति  ।।४३ ।।

यदि मनुष्य  अपना कल्याण चाहे तो वह कवच के पाठ के बिना एक पग भी कहीं यात्रा न करे । क्योंकि कवच का पाठ करके चलने वाला मनुष्य जिस-जिस स्थान पर जाता है।

तत्र   तत्रार्थलाभश्च ,  विजय:  सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते  कामं तं तं , प्राप्नोति  निश्चितम ।।४४ ।।

उसे वहाँ- वहाँ धन का लाभ होता है और कामनाओं को सिद्ध करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह पुरुष जिस जिस अभीष्ट वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसे निश्चय ही प्राप्त होती है।

परमैश्वर्यमतुलं  प्राप्स्यते , भूतले पूमान ।
 निर्भयो  जायते मर्त्य: , सड़्ग्रामेष्वपराजित: ।। ४५ ।।

कवच का पाठ करने वाला इस पृथ्वी पर अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है । वह किसी से नहीं डरता और युद्ध में उसे कोई हरा भी नहीं सकता ।

रोमकूपेषु  कौनेरी  ,       त्वचं वागीश्वरी तथा ।।३३ ।।

दंष्ट्राकराली नखों की , उर्ध्वकेशिनी देवी केशों की , कौवेरी रोमावली के छिद्रों में तथा वागीश्वरी हमारी त्वचा की रक्षा करें।

रक्त-मज्जा - वसा -मांसा , न्यस्थि- मेदांसि  पार्वती ।
अन्त्राणि  कालरात्रिश्च , पित्तं च मुकुटेश्वरी  ।।३४ ।।

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस , हड्डी और मेदे की रक्षा करें । कालरात्रि आँतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें ।

पद्मावती   पद्मकोशे , कफे  चूड़ामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी  नखज्वाला , मभेद्या  सर्वसन्धिषु ।।३५ ।।

पद्मावती सहस्र दल कमल में , चूड़ामणि कफ में , ज्वालामुखी नखराशि में उत्पन्न तेज की तथा अभेद्या सभी सन्धियों में हमारी रक्षा करें।

शुक्रं  ब्रह्माणिमे  रक्षे , च्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं ,   रक्षेन् मे धर्मधारिणी  ।।३६ ।।

ब्रह्माणि शुक्र की , छत्रेश्वरी छाया की , धर्म को धारण करने वाली , हमारे अहंकार , मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ    तथा , व्यानमुदान च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेद , प्राणंकल्याणं शोभना ।।३७ ।।

वज्रहस्ता प्राण , अपान , व्यान , उदान तथा समान वायु की , कल्याण से सुशोभित होने वाली कल्याणशोभना ,हमारे प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे गन्धे च , शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्वं   रजस्तमश्चचैव , रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८ ।।

रस , रूप , गन्ध , शब्द तथा स्पर्श रूप विषयों का अनुभव करते समय योगिनी तथा हमारे सत्व , रज , एवं तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें ।

आयु रक्षतु वाराही , धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यश: कीर्ति च लक्ष्मी च , धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९ ।।

वाराही आयु की , वैष्णवी धर्म की , चक्रिणी यश और कीर्ति की , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि  मे  रक्षेत् , पशुन्मे  रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मी ,    भार्यां रक्ष्तु  भैरवी ।।४० ।।

हे इन्द्राणी , तुम मेरे कुल की तथा हे चण्डिके , तुम हमारे पशुओं की रक्षा करो ।हे महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की तथा भैरवी देवी हमारी स्त्री की रक्षा करें।

पन्थानं  सुपथा  रक्षेन्मार्गं , क्षेमकरी    तथा ।
राजद्वारे   महालक्ष्मी , र्विजया  सर्वत: स्थिता ।।४१ ।।

सुपथा हमारे पथ की , क्षेमकरी ( कल्याण करने वाली ) मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया भयों से हमारी रक्षा करें।

रक्षाहीनं  तु  यत्  स्थानं , वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं  रक्ष मे  देवी !  जयन्ती  पापनाशिनी ।।४२ ।।

हे देवी ! इस कवच में जिस स्थान की रक्षा नहीं कही गई है उस अरक्षित स्थान में पाप को नाश करने वाली , जयन्ती देवी ! हमारी रक्षा करें।

पदमेकं   न   गच्छेतु , यदीच्छेच्छुभमात्मन:   ।
कवचेनावृतो   नित्यं  ,  यत्र  यत्रैव  गच्छति  ।।४३ ।।

यदि मनुष्य  अपना कल्याण चाहे तो वह कवच के पाठ के बिना एक पग भी कहीं यात्रा न करे । क्योंकि कवच का पाठ करके चलने वाला मनुष्य जिस-जिस स्थान पर जाता है।

तत्र   तत्रार्थलाभश्च ,  विजय:  सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते  कामं तं तं , प्राप्नोति  निश्चितम ।।४४ ।।

उसे वहाँ- वहाँ धन का लाभ होता है और कामनाओं को सिद्ध करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह पुरुष जिस जिस अभीष्ट वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसे निश्चय ही प्राप्त होती है।

परमैश्वर्यमतुलं  प्राप्स्यते , भूतले पूमान ।
 निर्भयो  जायते मर्त्य: , सड़्ग्रामेष्वपराजित: ।। ४५ ।।

कवच का पाठ करने वाला इस पृथ्वी पर अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है । वह किसी से नहीं डरता और युद्ध में उसे कोई हरा भी नहीं सकता ।

त्रैलोक्ये तु भवेत् पूज्य: , कवचेनावृत:  पुमान् ।
इदं तु देव्या:  कवचं ,  देवानामपि   दुर्लभम्  ।।४६ ।।

तीनों लोकों में उसकी पूजा होती है।यह देवी का कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

य: पठेत् प्रयतो नित्य , त्रिसंध्यं  श्रद्धयान्वित: ।
दैवीकला    भवेत्तस्य ,  त्रैलोक्येष्वपराजित: ।। ४७ ।।

जो लोग तीनों संध्या में श्रद्धापूर्वक इस कवच का पाठ करते हैं उन्हें देवी कला की प्राप्ति होती है। तीनों लोकों में उन्हें कोई जीत नहीं सकता ।

जीवेद  वर्षशतं , साग्रम  पमृत्युविवर्जित: ।
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे , लूता  विस्फोटकादय: ।।४८ ।।

उस पुरुष की अपमृत्यु नहीं होती । वह सौ से भी अधिक वर्ष तक जीवित रहता है । इस कवच का पाठ करने से लूता ( सिर में होने वाला खाज का रोग मकरी ,) विस्फोटक (चेचक) आदि सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।

स्थावरं  जंगमं  चैव , कृत्रिमं  चाअपि  यद्विषम्  ।
अभिचाराणि  सर्वाणि , मन्त्र-यन्त्राणि भूतले  ।।४९ ।।

स्थावर तथा  कृत्रिम विष , सभी नष्ट हो जाते हैं ।मारण , मोहन तथा उच्चाटन आदि सभी प्रकार के किये गए अभिचार यन्त्र तथा मन्त्र , पृथवी तथा आकाश में विचरण करने वाले 

भूचरा: खेचराश्चैव , जलजा श्चोपदेशिका: ।
सहजा कुलजा माला , डाकिनी- शाकिनी तथा ।।५० ।।

ग्राम देवतादि, जल में उत्पन्न होने वाले तथा उपदेश से सिद्ध होने वाले सभी प्रकार के क्षुद्र देवता आदि कवच के पाठ करने वाले मनुष्य को देखते ही विनष्ट हो जाते हैं।जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले ग्राम देवता ,कुल देवता , कण्ठमाला, डाकिनी, शाकिनी आदि ।

अन्तरिक्षचरा   घोरा , डाकिन्यश्च   महाबला: ।
ग्रह - भूत   पिशाचाश्च , यक्ष गन्धर्व - राक्षसा: ।।५१ ।।

अन्तरिक्ष में विचरण करने वाली अत्यन्त भयानक बलवान डाकिनियां ,ग्रह, भूत पिशाच ।

ब्रह्म    -  राक्षस  - बेताला: , कुष्माण्डा   भैरवादय: ।
नश्यन्ति     दर्शनातस्य , कवचे हृदि   संस्थिते  ।।५२ ।।

ब्रह्म राक्षस , बेताल , कूष्माण्ड तथा भयानक भैरव आदि सभी अनिष्ट करने वाले जीव , कवच का पाठ करने वाले पुरुष को देखते ही विनष्ट हो जाते हैं।

मानोन्नतिर्भवेद्  राज्ञ , स्तेजोवृद्धिकरं  परम् ।
यशसा वर्धते सोअपि  ,  कीर्ति  मण्डितभूतले ।।५३ ।।

कवचधारी पुरूष को राजा के द्वारा सम्मान की प्राप्ति होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला है।कवच का पाठ करने वाला पुरुष  इस पृथ्वी को अपनी कीर्ति से  सुशोभित करता है और अपनी कीर्ति के साथ वह नित्य अभ्युदय को प्राप्त करता है।

जपेत्  सप्तशतीं  चण्डीं , कृत्वा  तु  कवचं  पुरा ।
यावद्  भूमण्डलं  धत्ते - , स - शैल - वनकाननम् ।।५४ ।।

जो पहले कवच का पाठ करके सप्तशती का पाठ करता है , उसकी पुत्र - पौत्रादि संतति पृथ्वी पर तब तक विद्धमान रहती है जब तक  पहाड़ , वन , कानन , और कानन से युक्त यह पृथ्वी टिकी हुई है।

तावत्तिष्ठति  मेदिन्यां , सन्तति:  पुत्र- पौत्रिकी ।
देहान्ते  परमं  स्थानं ,  यत्सुरैरपि  दुर्लभम्   ।।५५ ।।

कवच का पाठ कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाला मनुष्य मरने के बाद - महामाया की कृपा से देवताओं के लिए  जो अत्यन्त दुर्लभ स्थान है 

प्राप्नोति  पुरुषो  नित्यं ,  महामाया  प्रसादत: ।
लभते   परमं    रूपं  ,   शिवेन    सह   मोदते ।।५६ ।।

उसे प्राप्त कर लेता है और उत्तम रूप प्राप्त कर  शिवजी के साथ  आन्नदपूर्वक  निवास करता है।

          ।।   इति  वाराह पुराणे  हरिहरब्रह्मविरचित  देव्या:  कवचं  समाप्तम्   ।।

 







माँ से क्षमा प्रार्थना ।

आपत्सु  मग्न:  स्मरणं  त्वदीयं ।
करोमि  दुर्गे  करूणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं   मम   भावयेथा:  ।
क्षुधातृषार्ता   जननीं  स्मरन्ति  ।।

हे दुर्गे!  हे दयासागर  महेश्वरी !  जब  मैं किसी विपत्ति  में पड़ता हूँ , तो तुम्हारा ही  स्मरण करता हूँ । इसे तुम मेरी धृष्टता मत समझना , क्योंकि  भूखे - प्यासे बालक अपनी माँ को ही याद किया करते हैं ।

जगदम्ब   विचित्रमत्र  किं ,
परिपूर्णा  करूणास्ति  चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं  न   हि ।
माता  समुपेक्षते   सुतम्    ।।

हे जगज्जननी !  मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है , इसमें आश्चर्य ही क्या है?  क्योंकि  अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देतीं ।

मत्सम:  पातकी  नास्ति 
पापघ्नी  त्वत्समा न  हि ।
एवं  ज्ञात्वा   महादेवी  
यथा  योग्यं  तथा  कुरू  ।।

हे महादेवी ! मेरे समान कोई पापी नहीं है , और तुम्हारे समान कोई पाप का नाश करने वाला नहीं है , यह जानकर जैसा उचित समझो माँ! वैसा ही करो ।