Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Tuesday, 29 December 2015

GovindDamodarStotram(गोविन्ददामोदरस्तोत्रम्।)



अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां
दु:शासने-नाहृत - वस्त्र -केशा।
कृष्णा  तदाक्रोशदनन्यनाथा
गोविन्द  दामोदर  माधवेति  ।।

(जब कौरव और पाण्डवों के सामने दु:शासन ने द्रौपदी के वस्त्र और बालों को पकड़ कर खींचा, तब अनन्य अनाथ द्रौपदी ने रोकर पुकारा -- 'हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव!--

श्रीकृष्ण  विष्णो  मधुकैटभारे
भक्तानुकम्पिन्  भगवन्  मुरारे ।
त्रायस्व  मां  केशव  लोकनाथा
गोविन्द  दामोदर  माधवेति    ।।

 (हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधुकैटभ को मारने वाले ! हे भक्तों के ऊपर अकारण अनुकम्पा करने वाले ! हे मुरारे ! हे केशव ! हे लोकेश्वर ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।)

ध्येय:  सदा  योगिभिरप्रमेय-
श्चिन्ताहरश्चिन्तिपारिजात: ।
कस्तूरिका - कल्पित - नीलवर्णो
  गोविन्द   दामोदर   माधवेति  ।।

( योगी भी जिन्हें ठीक - ठीक नहीं जान पाते , जो सभी प्रकार की चिन्ताओं को हरने वाले और मनोवांछित वस्तुओं को देने के लिये कल्पवृक्ष के समान हैं तथा जिनके शरीर का वर्ण कस्तूरी के समान नीला है, उन्हें सदा ही 'गोविन्द '! दामोदर ! माधव ! इन नामों से स्मरण करना चाहिये।

संसारकूपे   पतितोअत्यगाधे
मोहान्धपूर्णे   विषयाभितप्ते  ।
करावलम्बं  मम  देहि  विष्णो
गोविन्द  दामोदर   माधवेति  ।।

( जो मोहरूपी अंधकार से व्याप्त और विषयों की ज्वाला से संतप्त है , ऐसे अथाह संसार रूप कूप में मैं पड़ा हुआ हूँ। हे मधूसूदन !हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिए।)

त्वामेव  याचे  मम  देहि  जिह्वे
 समागते  दण्डधरे   कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं   मधुरं   सुभक्त्या
 गोविन्द  दामोदर   माधवेति  ।।

( हे जिह्वे ! मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूँ , तूही मुझे दे ।वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अंत करने आवें तो बड़े       ही प्रेम से गदगद् स्वर में ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !' इन मन्जुल नामों का उच्चारण करती रहना।)

भजस्व  मन्त्रं  भवबन्धमुक्त्यै 
जिह्वे  रसज्ञे  सुलभं  मनोज्ञम् ।
द्वैपायनाद्यैर्मुनिभि:    प्रजप्तं
गोविन्द   दामोदर    माधवेति ।।

 ( हे जिह्वे ! हे रसज्ञे ! संसाररूपी बंधन को काटने के लिये तू सर्वदा ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ' इन नामरूपी मन्त्र का जप किया कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और जिसे व्यास , वसिष्ठादि  ऋषियों ने भी जपा है।)

गोपाल   वंशीधर   रूपसिन्धो
लोकेश   नारायण  दीनबन्धो ।
उच्चस्वरैस्त्वं   वद    सर्वदैव 
गोविन्द    दामोदर   माधवेति ।।

( रे जिह्वे ! तू निरन्तर ' गोपाल !  वंशीधर ! रूपसिन्धो ! लोकेश ! नारायण ! दीनबंधो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन नामों का उच्च स्वर से कीर्तन किया करती रहना।

जिह्वे  सदैवं  भज  सुन्दराणि
नामानि  कृष्णस्य  मनोहराणि।
समस्त - भक्तार्ति  विनाशनानि
गोविन्द   दामोदर   माधवेति  ।।

( हे जिह्वे ! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन मनोहर मंजुल नामों को , जो भक्तों के संकटों की निवृत्ति करने वाले हैं, भजती रह।)

गोविन्द  गोविन्द  हरे  मुरारे
गोविन्द  गोविन्द  मुकुन्द  कृष्ण।
गोविन्द  गोविन्द   रथांड़्गपाणे
गोविन्द    दामोदर    माधवेति  ।।

 (हे जिह्वे ! ' गोविन्द ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! गोविन्द ! गोविन्द ! मुकुन्द ! कृष्ण ! गोविन्द ! गोविन्द ! रथाड़्गपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव! ' इन नामों को तू सदा जपती रह ।)

सुखावसाने  त्विदमेव  सारं
दु:खावसाने  त्विदमेव  गेयम्।
देहावसाने  त्विदमेव  जाप्यं 
गोविन्द  दामोदर   माधवेति ।।

(सुख के अंत में यही सार है अर्थात् सभी सुख इसी नाम में समाहित हैं।दु:ख के अंत में यही गाने योग्य है और शरीर का अंत होने के समय भी ' हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! यही मन्त्र जपने योग्य है।)

दुर्वारवाक्यं  परिगृह्य  कृष्णा 
मृगीव  भीता  तु  कथं  कथंचित।
 सभां   प्रविष्टा   मनसाजुहाव 
गोविन्द    दामोदर   माधवेति  ।।

( दु:शासन के दुर्वचनों को स्वीकार कर मृगी के समान भयभीत हुई द्रौपदी किसी तरह सभा में प्रवेश कर स्वयं को अनाथ मानती हुई मन ही मन ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इस प्रकार भगवान का स्मरण करने लगी ।)

श्रीकृष्ण   राधावर   गोकुलेश
गोपाल  गोवर्धन  नाथ  विष्णो । 
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
 गोविन्द   दामोदर    माधवेति ।।

( हे जिह्वे ! तू ' श्रीकृष्ण ! राधारमण ! व्रजराज ! गोपाल ! गोवर्धन ! नाथ ! विष्णो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ---इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह।)

श्रीनाथ   विश्वेश्वर   विश्वमूर्ते
श्रीदेवकीनन्दन       दैत्यशत्रो  ।
जिह्वे       पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर     माधवेति ।।

( हे जिह्वे ! तू  ' श्रीनाथ ! सर्वेश्वर ! श्रीविष्णु स्वरूप देवकीनन्दन ! असुर निकन्दन ! गोविन्द ! दामोदर !  माधव ! इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह। ) 

गोपीपते   कंसरिपो   मुकुन्द
लक्ष्मीपते   केशव    वासुदेव। 
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर    माधवेति    ।।

( हे जिह्वे ! तू ' गोपीपते ! कंसरिपो ( कंस का संहार करने वाले ) ! मुकुन्द ! लक्ष्मीपते ! केशव ! वासुदेव ! गोविन्द ! माधव ! ' --- इन नामामृत का निरंतर पान करती रह।) 

गोपीजनाह्लादकर          व्रजेश
गोचारणा- रण्य - कृत - प्रवेश ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर     माधवेति ।।

( व्रजराज, व्रजांगनाओं को आनन्दित करने वाले , जिन्होंने गौओं को चराने के लिये वन में प्रवेश किया, हे जिह्वे ! तू उन्हीं मुरारी के गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' --- इन नामामृत का निरन्तर पान कर। ) 

प्राणेश   विश्वम्भर   कैटभारे
वैकुण्ठ    नारायण    चक्रपाणे ।
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर     माधवेति।।

( हे जिह्वे ! तू ' प्राणेश ! विश्वम्भर ! कैटभारे ! वैकुण्ठ ! नारायण ! चक्रपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !--- इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह ।)

हरे   मुरारे     मधुसूदनाद्य
श्रीराम      सीतावर    रावणारे ।
जिह्वे           पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति ।।

( ' हे हरे ! हे मुरारे ! हे मधुसूदन ! हे पुराणपुरुषोत्तम ! हे रावणारे ! हे सीतापते श्रीराम ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! --- इन नामामृत का हे जिह्वे ! तू निरन्तर पान करती रह ।)' 

श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष
गोगोपगोपीसुखदानदक्ष। 
जिह्वे    पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर  माधवेति।।

( हे जिह्वे ! ' श्रीयदुकुलनाथ ! गिरिधर ! कमलनयन ! गो, गोप और गोपियों को सुख देने में कुशल श्रीगोविन्द ! दामोदर ! माधव ! ' इन नामामृत का निरन्तर पान करती रह ।) 

धरा- भरोत्तारण - गोप - वेश
विहारलीला - कृतबन्धुशेष   ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति  ।।

( जिन्होंने पृथ्वी का भार उतारने के लिये सुन्दर ग्वाला का रूप धारण किया है और आनन्दमयी लीला करने के निमित्त ही शेषजी (बलराम ) को अपना भाई बनाया है , ऐसे उन नटवर नागर के गोविन्द' ! दामोदर ! माधव ! ' - इस नामामृत का तू निरन्तर पान करती रह ।) 

बकी - बकाघासुर - धेनुकारे
केशी -  तृणावर्तविघातदक्ष  ।
जिह्वे       पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द   दामोदर   माधवेति ।।

( जो  पूतना , बकासुर ,अघासुर , और धेनुकासुर , आदि राक्षसों के शत्रु हैं और केशी तथा तृणावर्त  को पछाड़ने वाले हैं , हे जिह्वे!उन असुरारि मुरारि के 'गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' -- इन नामामृत का तू निरन्तर पान करती रह ।) 

श्रीजानकीजीवन      रामचन्द्र
निशाचरारे          भरताग्रजेश।
 जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द       दामोदर     माधवेति ।।

( ' हे जानकीजीवन भगवान राम ! हे दैत्यदलन भरताग्रज ! हे ईश ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ' - इन नामामृत का हे जिह्वे ! तू निरन्तर पान करती रह।)

नारायणानन्त    हरे   नृसिंह
प्रह्लादबाधाहर    हे    कृपालो।
जिह्वे         पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति।।

(' हे प्रह्लाद की बाधा हरने वाले दयामय नृसिंह ! नारायण ! अनन्त ! हरे  ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का हे जिह्वे ! तू हमेशा पान करती रह।' )

लीला - मनुष्याकृति - रामरूप
प्रताप - दासी - कृत - सर्वभूप ।
जिह्वे            पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द    दामोदर      माधवेति ।।

(' हे जिह्वे ! जिन्होंने लीला ही से मनुष्यों की सी आकृति बनाकर रामरूप प्रकट किया है और अपने प्रबल पराक्रम से सभी भूपों को दास बना लिया है , तू उन नीलाम्बुज श्यामसुन्दर श्रीराम के ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! - इस नामामृत का ही निरन्तर पान करती रह ।' ) 

श्रीकृष्ण    गोविन्द   हरे   मुरारे
हे नाथ   नारायण     वासुदेव   ।
जिह्वे           पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति ।।

( ' हे जिह्वे ! तू ' श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारे ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का निरन्तर पान करती रह।' )

वक्तुंसमर्थोअपि न वक्ति कश्चि दहो
जाननां         व्यसनाभिमुख्यम्   ।
जिह्वे          पिबस्वामृतमेतदेव
गोविन्द     दामोदर    माधवेति  ।।

(' अहो ! मनुष्यों की विषयलोलुपता कैसी आश्चर्यजनक है ! कोई - कोई तो बोलने में समर्थ होने पर भी भगवान नाम का उच्चारण  नहीं करते , किन्तु हे जिह्वे ! मैं तुमसे कहता हूँ , तू ' गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामों का प्रेमपूर्वक निरन्तर पान करती रह।')






Saturday, 26 December 2015

Maiya Mohi Daoo Bahut Khijayau.(मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायौ।) सूरदासजी के पद ।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि रिस के मारैं , खेलन हौं नहिं जात ।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता , को है तेरौ तात  ।।
गोरे नंद  जसोदा  गोरी , तू कत स्यामल गात  ।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत , हँसत , सबै मुसुकात।।
तू मोही कौं मारन सीखी , दाउहि कबहुँ न खीझै ।
मोहन मुख रिस की ये बातैं , जसुमति सुनि-सुनि रीझै।।
सुनहु कान्ह , बलभद्र चबाई , जनमत ही कौ धूत ।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं , हौं माता तू पूत ।।

(श्यामसुन्दर कहते हैं------ )' मैया! दाऊ दादा ने मुझे बहुत चिढ़ायाहै। मुझसे कहते हैं---तू मोल लिया हुआ है, यशोदा मैया ने भला, तुझे कब जन्म दिया।' क्या करूँ, इसी क्रोध के मारे मैं खेलने नहीं जाता।वे बार-बार कहते हैं --तेरी माता कौन है? तेरे पिता कौन हैं? नन्दबाबा तो गोरे हैं, यशोदा मैया भी गोरी हैं, तू साँवले अंगवाला कैसे है?'चुटकी देकर ग्वाल-बाल मुझे नचाते हैं,फिर सब हँसते और मुस्कुराते हैं। मैया से कहते हैं-तूने तो मुझे ही मारना सीखा है, दाऊ दादा को कभी नहीं डाँटती।' सूरदासजी कहते हैं----मोहन के मुख से क्रोध भरी बातें बार-बार सुनकर यशोदाजी मन ही मन प्रसन्न हो रही हैं। वे कहती हैं--' कन्हाई ' ! सुनो, बलराम तो चुगलखोर है, वह जन्म से ही धूर्त है, श्यामसुन्दर मुझे गोधन ( गायों ) की शपथ, मैं तुम्हारी माता हूँ और तुम मेरे पुत्र हो।'

Tuesday, 22 December 2015

ShriKrishna aur RukminiJi Ka Vivah.



कुण्डिनपुर के राजा भीष्मक अपनी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्री कृष्ण से करना चाहते थे, परन्तु उनका बड़ा पुत्र रुक्मी श्रीकृष्ण का विरोधी था। वह शिशुपाल से अपनी बहिन रुक्मिणी का विवाह करना चाहता था।रुक्मिणीजी  मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकि थी।रुक्मी के हठ के कारण राजा भीष्मक ने शिशुपाल से ही अपनी कन्या का विवाह निश्चित करके शिशुपाल के यहाँ निमन्त्रण भेज दिया।रुक्मिणीजी को लगा अब शिशुपाल से उनकी शादी निश्चित हो जायेगी,तो उन्होंने पत्र लिखकर संदेश एक ब्राह्मण के द्धारा भेजा। रुक्मिणी का पत्र पाकर श्रीकृष्ण उन्का हरण करने रथ में कुण्डिनपुर जा पहुँचे।पीछे से बलरामजी भी बड़ी सेना साथ लेकर कुण्डिनपुर पहुँच गये।शिशुपाल भी अपनी बारात लेकर वहाँ पहुँच गया।विवाह से एक दिन पहले रुक्मिणीजी अपनी सखियों के साथ गौरी-पूजन के लिए मंदिर अाई और श्रीकृष्ण ने वहीं से रुक्मिणीजी का हरण कर लिया और द्वारका अपने रथ में बैठा कर ले आए।शिशुपाल के सहायक राजाओं तथा रुक्मी के सेनाओं ने कृष्ण तथा बलरामजी के सेनाओं के साथ युद्ध किया, लेकिन बलरामजी के द्वारा हारकर सभी को वापस कुण्डिनपुर लौटना पड़ा।द्वारका पहुँचकर श्रीकृष्णजी ने रुक्मिणीजी के साथ विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया।

Tuesday, 15 December 2015

Shri Ram Katha (Short version )





 मंगल  भवन  अमंगल   हारी ।
द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी ।।

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाड़्ग  सीतासमारोपितवामभागम् ।
  पाणौ  महासायकचारूचापं नमामि   रामं  रघुवंशनाथम् ।।

रामायण प्रभु श्रीराम की कथा है, जिन्हें श्रवण करने से या पाठ करने से पाप ताप संताप (त्रयताप ) का नाश होता है।रामायण को राम रूप भी कहा गया है।रामायण में सात काण्ड हैं। ये सात काण्ड सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजी की भक्ति को प्राप्त करने के मार्ग हैं।जिस पर श्रीहरि की अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्ग पर पैर रखता है।

बाल काण्ड-----रामायण का प्रथम अध्याय बालकाण्ड है ।प्रभु श्रीराम के चरण समान हैं।जहाँ प्रभु के चरण पड़ते हैं, वहाँ जय जयकार होती है।बालक के समान निश्छल, निष्कपट तथा अभिमान रहित जिसका मन है अर्थात जिसका मन सरल है, वही प्रभु को पा सकता है।प्रभु ने रामायण में स्वयं कहा है-----निर्मल मन जन सो मोहे पावा। मोहे कपट छल छिद्र न भावा ।।
     

अयोध्याकाण्ड----- श्रीराम का अवतार अयोध्या में हुआ।अयोध्या का अर्थ है न  युद्धा भवति अर्थात जहाँ युद्ध न हो।जैसे राम सबसे प्रेम करते हैं, यदि हम भी इसी तरह सबसे प्रेम करें तो प्रभु श्रीराम जैसे अयोध्या में प्रकट हुए वैसे ही हमारे अंदर भी प्रकट होंगे।अपना सर्वस्व प्रभु के चरणों में अर्पित कर हमें प्रेमपूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए।

अरण्यकाण्ड ---------अरण्यकाण्ड में प्रभु श्रीराम ने अयोध्या के महल तथा वहाँ का वैभव का त्याग कर वन गमन किया।मन में सन्यास धारण किया। पिता की आज्ञा से उन्होंने चौदह वर्षों तक का वनवास स्वीकार किया।वन जाते समय उनके मुख पर कोई दु:ख नहीं था ।श्रीराम तो पिता के वचन का मान रख रहे थे। मन से सन्यासी प्रभु श्री राम के चरणों में हमें भी उनकी भक्ति के सिवा और कोई इच्छा नहीं होनी चाहिये। माया मोह स्वार्थ लोभ अहंकार को तजकर अपना सर्वस्व प्रभु को समर्पित कर उनकी शरण ग्रहण करना चाहिये।

वनवासी सीताराम को, लक्ष्मण सहित प्रणाम ।
जिनके सुमिरन भजन से , होत सफल सब काम ।।

किष्किन्धाकान्ड --------किष्किन्धाकाण्ड जहाँ प्रभु श्रीराम की मुलाकात हनुमान से हुई।हनुमान ने सुग्रीव को प्रभु से मिलाया तथा सुग्रीव का दु:ख मिटाया था।किष्किन्धाकाण्ड प्रभु का कंठ स्वरूप है।प्रभु जिसे अपना जानकर गले से लगा लेते हैं,उसके सारे दु:ख दूर कर, जन्म मरण के चक्र से भी मुक्त कर देते हैं।

हनुमान सुसंयम ब्रह्मचारी, प्रभु को निज पीठ पर बिठाया था ।
राम सुकंठ पास पहुँचाय उनको, सुग्रीव का दु:ख मिटाया था ।।

सुन्दरकाण्ड -------सुन्दरकाण्ड का रहस्य है , हनुमान जी के तरह सुन्दर और निर्मल हृदय बनें ,हनुमान जैसे हृदय में सीता रामजी को धारण करते हैं, हर पल हर क्षण सुमिरन करते रहते हैं , वैसे ही हमें भी प्रभु को अपने मन मंदिर मे बिठाकर उनका सुमिरन करते रहना चाहिये।सुन्दरकाण्ड मे हनुमानजी की लीलाओं का वर्णन है। राम चरित मानस का पाठ करने से प्रभु श्रीरामजी के साथ- साथ हनुमानजी भी प्रसन्न होते हैं।

सुन्दरकाण्ड रामायण का सबसे सुन्दर काण्ड।
पढ़े सुने जो सादर सदा , पाप ताप हो नाश ।।
सुन्दर श्री हनुमान के , सुन्दर ही सब खेल ।
पावन सीता राम का ,  करवाते हैं  मेल    ।।

लंकाकाण्ड --------लंकाकाण्ड में प्रभु श्रीराम ने रावण का वध कर समस्त संसार को सुखी किया । रावण अर्थात काम, क्रोध, मोह तथा अहंकार का नाश कर शांति स्थापित किया।रावण मोह रूपी अविद्या का नाम है जो हर मनुष्य के अंदर है।इसे समाप्त किये बिना सच्ची शांति नहीं मिल सकती है।

उत्तरकाण्ड-------प्रभु श्रीराम ने रावण का संहार कर राम राज्य स्थापित किया । जब मन से सारे विकार दूर हो जाते हैं तभी ज्ञान तथा भक्ति का प्रकाश उदित होता है और जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों एक स्वरूप होते हैं।

   दोहा-       राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
                  भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ।।

जो श्रीरामजी के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्ष पद चाहता हो , वह इस कथारूपी अमृत को  प्रेम पूर्वक अपने कान रूपी दोने से                             पिये ।जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्रीरामजी का यह चरित्र कहते हैं , सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजी के परम धाम को चले जाते हैं।

Dhanyawad Prabhu (Prayer)


धन्यवाद प्रभु तुमने हमको ,
अपना ये अंश स्वीकार किया।

आकार दिया, प्रकार दिया
मन वाणी और विचार दिया,
अपनी इस पावन सृष्टि में,
लाकर जीवन साकार किया।

धन्यवाद प्रभु तुमने हमको,
अपने जैसे पितु मात दिये 
कुटुम्ब दिया, भोजन भी दिया ,
ममता और प्रीत अपार दिया ,
जलवायु ,अग्नि ,साधन से 
पोषित करके निर्माण किया।

धन्यवाद प्रभु तुमने हमको,
सदगुरू का आशीर्वाद दिया,
सत्य दिया और ज्ञान दिया,
तुम तक आने का मार्ग दिया,
जिनकी करूणा की छाँव ने ,
हर भाँति से कल्याण किया ।
धन्यवाद प्रभु तुमने हमको,
अपना ये अंश स्वीकार किया।



(Kanupriya)