Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Sunday, 13 November 2016

ShriNandKumarashtakam ( श्रीनंदकुमाराष्टकम् )

      


सुंदर गोपालं उरवनमालं नयन विशालं दु:ख हरम् ,
वृंदावनचंद्रम् आनंदकन्दम् परमानंदम् धरणीधरम् ।
वल्लभ घनश्यामं पूर्णकामं अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं ब्रह्मपरम् ।।१ ।।

सुंदर वारिजवदनं निर्जित मदनं आनंद सदनं मुकुटधरम् ,
गुंजाकृतिहारं  विपिनविहारं  परमोदारं  चीरहरम्  ।
वलल्भ पटपीतं कृत उपवीतं कर नवनीतं विबुधवरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। २ ।।

शोभित सुखमूलं यमुनाकूलं निपट अतूलं सुखद वरम् ,
मुख मण्डित रेणुं चारित धेनुं वादित वेणुं मधुर सूरम् ।
वल्लभ मति विमलं शुभपद कमलं नखरुचि विमलं तिमिर हरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ३ ।।

शिर मुकुट सुदेशं  कुंचित केशं नटवर वेषं कामवरम् ,
मायाकृत मनुजं हलधर अनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ४ ।।

इन्दीवरभासं प्रकट सुरासं कुसुम विकासं वंशीधरम् ,
जित मन्मथ मानं रूप निधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभ मृदु हासं कुंज निवासं विविध विलासं ब्रह्मपरम् ।। ५ ।।

अति परम प्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्म करम् ,
मोहनमति धीरं कलिबलिवारं हत परवीरं तरल तरम् ।
वल्लभ व्रज रमणं वारिज वदनं जलधर शमनं शैलधरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्  ।। ६ ।।

जलधर द्युतिकायं ललितत्रिभंगं बहु कृतिरंगं रसिकवरम् ,
गोकुल  परिवारं  मदनाकारं  कुंज  विहारं  गूढ़नरम् ।
वल्लभ व्रजचंद्रम् सुभग सुछंदम् परमानंदम भ्रांतिहरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम ।। ७ ।।

वंदित युग चरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरं ,
कालिय शिर गमनं कृतफणि नमनं घातितयमनं मृदुल तरम् ।
वल्लभदु:खहरणं  निर्मलचरणं  अशरणशरणं  मुक्तिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्   ।। ८ ।।

।। इति श्रीमद् वल्लभाचार्य विरचितं नंदकुमाराष्टकं सम्पूर्णम्  ।।

Thursday, 3 November 2016

ShriDamodarashtkam ( श्रीदामोदराष्टकम् )



नमामीश्वरं  सच्चिदानंदरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्  ।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततो द्रुत्य गोप्या  ।।१ ।।

( जिनके कपोलों पर लटकते मकराकृत-कुंडल क्रीड़ा कर रहे हैं, जो गोकुल के चिन्मय धाम में परम शोभायमान हैं, जो दूध की हांडी फोड़ने के कारण माँ यशोदा से भयभीत होकर ऊखल के उपर से कूदकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे हैं और जिन्हें माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेग से दौड़कर पकड़ लिया है, ऐसे सच्चिदानंद- स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।)

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोज-युग्मेन सातंकनेत्रं ।
मुहु:श्वास कम्प - त्रिरेखांक - कण्ठ
स्थित ग्रैव - दामोदरं भक्तिबद्धम् ।। २  ।।

( जननी के हाथ में लाठी को देखकर मार खाने के भय से जो रोते-रोते बारंबार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मसल रहे हैं, जिनके दोनों नेत्र भय से अत्यन्त विह्वल हैं, रूदन के कारण बारंबार साँस लेने के कारण तीन रेखाओं से युक्त शंख रूपी जिनके कंठ में पड़ी मोतियों की माला काँप रही है, और जिनका उदर ( माँ यशोदा की वात्सल्य भक्ति द्वारा ) रस्सी से बँधा हुआ है, उन सच्चिदानन्द - स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ )

इतिदृक् स्वलीलाभिरानंद कुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् ।
तदीयेशितज्ञेषु  भक्तैर्जितत्वं
पुन:  प्रेमतस्तं  शतावृत्ति  वन्दे  ।। ३ ।।

( जो इस प्रकार की बाल्य- लीलाओं द्वारा गोकुलवासियों को आनन्द सरोवर में नित्यकाल सराबोर करते रहते हैं,और जो ऐश्वर्यपूर्ण ज्ञानी भक्तों के समक्ष यह उजागर करते हैं कि " मैं केवल ऐश्वर्यविहीन प्रेम और भक्ति द्वारा ही जीता जा सकता हूँ," उन दामोदर श्रीकृष्ण की मैं प्रेमपूर्वक बारम्बार वंदना करता हूँ।)

वरं देव ! मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेअहं वरेशादपीह  ।
इदं  ते  वपुर्नाथ  गोपाल  बालं
सदा मे मनस्याविरस्तां  किमन्यै: ।।४ ।।

( हे देव ! आप सब प्रकार से वर देने में पूर्ण सक्षम हैं, तो भी मैं आप से मोक्ष या मोक्ष की चरम सीमारूप वैकुण्ठ आदि लोक भी नहीं चाहता और न ही अन्य कोई ( नवधा भक्ति द्वारा प्राप्त किये जाने वाले ) वरदान चाहता हूँ। हे नाथ ! मैं तो केवल एक ही वर चाहता हूँ कि आपका यह बालगोपाल रूप मेरे हृदय में सदा - सदा के लिये विराजमान रहे।मुझे अन्य दूसरे वरदानों से कोई प्रयोजन नहीं है।)



इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलै: स्निग्ध- रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं  बिम्बरक्ताधरं मे 
मनस्याविरस्तामलं लक्षलाभै: ।।५ ।।

( हे देव ! कुछ - कुछ लालिमा लिये हुये कोमल तथा घुँघराले बालों से घिरा आपका मुखकमल माँ यशोदा द्वारा बारम्बार चुम्बित है और आपके होंठ बिम्ब फल के समान लाल हैं। आपका यह मधुर रूप नित्यकाल तक मेरे हृदय में प्रकट होता रहे।मुझे लाखों प्रकार के अन्य लाभों की आवश्यकता नहीं है।)

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो 
प्रसीद प्रभो दु:ख जलाब्धि- मग्नम् ।
कृपादृष्टि- वृष्टियातिदीनं बतानु
गृहाणेश   मामज्ञमेध्यक्षि दृश्य: ।।६ ।।

( हे परमदेव ! हे दामोदर ! हे अनन्त ! हे विष्णो ! हे प्रभो ! हे भगवन !  मुझपर प्रसन्न होवें । मैं दु:खों के समुद्र में डूबा जा रहा हूँ।अतएव आप अपनी कृपादृष्टि रूपी अमृतवर्षा कर मुझ दीन - हीन शरणागत पर अनुग्रह कीजिये एवं मेरे नेत्रों के समक्ष साक्षात् दर्शन दीजिये।) 

कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वयामोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च ।
तथा  प्रेमभक्तिं  स्वकां  मे  प्रयच्छ 
न  मोक्षे  गृहो मेअस्ति  दामोदरेह ।। ७ ।।

( हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने दामोदर रूप से ऊखल में बँधे रहकर भी नलकूबर और मणिग्रीव नामक कुबेर के दोनों पुत्रों को नारदमुनि के शाप से मुक्त करके अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये।यही मेरा एकमात्र आग्रह है।किसी अन्य प्रकार के मोक्ष की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।)

नमस्तेअस्तु दाम्ने स्फुरद्धीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ  विश्वस्य  धाम्ने  ।
नमो राधिकायै त्वदीय - प्रियायै
नमोअनंत  लीलाय देवाय तुभ्यम् ।। ८ ।।

( हे दामोदर ! आपके उदर को बाँधने वाली महान् रस्सी को प्रणाम है, निखिल ब्रह्मतेज के आश्रय और सम्पूर्ण विश्व के आधारस्वरूप आपके उदर को नमस्कार है।आपकी प्रियतमा श्री राधारानी के चरणों में मेरा बारम्बार प्रणाम है और हे अनन्त लीलाविलास करने वाले भगवन् ! मैं आपको भी सैकड़ों प्रणाम अर्पित करता हूँ।








Wednesday, 12 October 2016

व्रज भूमि के गिरिराज पर्वत ( गोवर्धन ) की कथा।

गोवर्धन पर्वत अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को ही मानते हैं।यह पर्वत अपने पत्र ,पुष्प ,फल ,और जल को श्रीकृष्ण का ही मानकर उन्हें सदा समर्पित करता है।जब प्रभु तथा उनके सखाओं को भूख लगती है,तो नाना प्रकार के फल उन्हें अर्पित करता है,और प्यास लगने पर अपने मधुर जल से उन्हें तृप्त करता है।प्रभु को सजाने के लिये तरह-तरह के पुष्प गले के हार के लिये अर्पित करता है।

            पौराणिक कथानुसार गिरिराज द्रोणपर्वत का पुत्र है।एक बार ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणपर्वत से उनके पुत्र गोवर्धन को अपने साथ अन्यत्र ले जाने के लिये विनय किया।तब गोवर्धनपर्वत ने शर्त रखी कि यदि मार्ग में थकान या किसी कारण वश कहीं भी भूमि पर उन्हें रखा गया तो गोवर्धन वहीं अटल हो जायेंगे।

          ऋषि पुलस्त्य जब व्रजभूमि के ऊपर से गुजर रहे थे तो गिरिराज ने अपना वजन इतना बढ़ा लिया कि पुलस्त्य ऋषि को
गिरिराजपर्वत भूमि पर रखना पड़ा।वह भूमि व्रजभूमि ही थी, और गिरिराज श्रीकृष्ण की पावन स्थली वृन्दावनधाम में सदा-सदा के लिये विराजमान हो गया।ऋषि पुलस्त्य को इस बात पर बड़ा क्रोध आया,और उन्होने गिरिराज को शाप दे दिया कि तू दिन प्रतिदिन तिल-तिल घटता जायगा, और यह क्रम आज भी चल रहा है।

         वाराहपुराण के एक कथानुसार------त्रेता युग में जब प्रभु श्रीराम को समुद्र पर पुल का निर्माण हेतु बड़े-बड़े पाषाण-खण्ड एवं पर्वतों की आवश्यकता हुई, तब हनुमानजी बहुत सारे पाषाणखण्ड उठा कर लाये।उसी समय गिरिराज को भी उठाकर पवनपुत्र ला रहे थे, कि तभी घोषणा हुई कि सेतुबन्ध का कार्य पूर्ण हो चुका है।अब पाषाणखण्ड की कोई आवश्यकता नहीं है।विवश होकर हनुमानजी ने लौटकर पर्वतराज को अपने पूर्व स्थान पर ही स्थापित कर दिया।उस समय गिरिराज को महान क्षोभ हुआ कि मैं प्रभु श्रीराम के कोई काम न आ सका।तब प्रभु उसके अन्तस के क्षोभ का आभास पाते हुये आश्वस्त किया कि द्वापर युग में मेरे कृष्णावतार के समय तुम्हें मेरे चरणरजस्पर्श एवं लीलावलोकन का पूर्ण लाभ मिलेगा।तुम श्रीकृष्ण के परम प्रिय हरिदासवर्य बनोगे।इन्द्रकोप के समय श्रीकृष्ण अपने नख पर धारण कर समस्त ब्रजमंडल की रक्षा का माध्यम तुम्हें ही बनायेंगे।गिरिराज को हरिदासवर्य कहा गया है,अर्थात भगवद्भक्तों में परम श्रेष्ठ हैं।इस पर्वत पर श्रीकृष्ण गोचारण करते हुये अपने चरणों का उन्हें स्पर्ष कराते हैं ,धन्य हैं ये गिरिराज, और धन्य है इनकी कथा।भगवान श्रीकृष्ण ने तो स्वयं गिरिराज बनकर अन्नकूट का भोग स्वीकार किया।यह गिरिराज तो कृष्ण व्रजराज कहलाए।कृष्ण गोपाल तो यह गोवर्धन।गिरिराज के बिना ब्रज की कल्पना नहीं की जा सकती।

Saturday, 24 September 2016

Ki Jane Kaun Se Gun Par ,DayaNinidhi Reejh Jate Hai.( कि जाने कौन से गुण पर,दयानिधि रीझ जाते हैं।)


कि जाने कौन से गुण पर, दयानिधि रीझ जाते हैं।
यही सद् ग्रंथ कहते  हैं, यही हरि भक्त गाते हैं  ।
कि जाने कौन-------- ---------------------।

नहीं स्वीकार करते हैं, निमंत्रण नृप दुर्योधन का।
विदुर के घर पहुँचकर, भोग छिलकों का लगाते हैं।
कि जाने कौन से ------------------------------।

न आये मधुपुरी से गोपियों की, दु: ख कथा सुनकर।
द्रुपदजा की दशा पर,  द्वारका से दौड़े  आते हैं  ।
कि जाने कौन से------------------------------- 

न रोये बन गमन में , श्री पिता की वेदनाओं पर ।
उठा कर गीध को निज गोद में , आँसु बहाते हैं ।
कि जाने कौन से------------------------------ ।

कठिनता से चरण धोकर , मिले कुछ 'बिन्दु' विधि हर को
वो चरणोदक स्वयं केवट के , घर जाकर लुटाते हैं।
कि जाने कौन से------------------------------------- ।

Friday, 16 September 2016

Ma Aadi Shakti Ki Katha '( Devi Puran Se ) '



१८ महापुराणों में देवीपुराण की विशेष महिमा है।इसे 'महाभागवत' के नाम से भी कहा गया है।इस पुराण में ८१ अध्याय और प्राय: ४५०० श्लोक हैं।इस पुराण के आदि उपदेष्टा महादेव भगवान् सदाशिव हैं।उन्होंने इसे देवर्षि नारद को सुनाया था।उसी महादेव-नारद-संवाद को महर्षि वेदव्यासजी ने महर्षि जैमिनी को सुनाया।उसके बाद इस कथा को लोमहर्षण श्रीसूतजी ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों को सुनाया।इस पुराण के उद्भव के विषय में पुराण में एक रोचक कथा प्राप्त होता है , जो इस प्रकार है---
                      एक समय की बात है, नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों ने जब सूतजी से बड़े आग्रहपूर्वक इस पुराण की कथा सुनाने की प्रार्थना की, तब उन्होंने कहा-- ' जब भगवान् वेदव्यासजी ने अठारह महापुराणों की रचना कर ली, यहाँ तक कि श्रीमद्भागवत की भी रचना हो गयी और उनके हृदय में पूर्ण शान्ति नहीं प्राप्त हो सकी,तब वे देवी-मन्त्र का जप करते हुये हिमालय पर जाकर घोर तपस्या करने लगे।दीर्घकाल के तपस्या के पश्चात् देवी ने बिना प्रकट हुये ही आकाशवाणी की --- 'महर्षि ! आप ब्रह्मलोक जायँ, वहीं आपको मेरा दर्शन होगा और सारे रहस्यों का भी पता चल जायगा।' तब व्यासजी ब्रह्मलोक गये, वहाँ उन्होंने मूर्तिमान् चारों वेदों को प्रणाम कर ब्रह्माजी से ब्रह्म पद की जिज्ञासा की।तब चारों वेदों ने क्रम-क्रम से देवी भगवती को ही साक्षात् परम तत्व बतलाते हुये कहा---' आप अभी हमारे प्रयत्न से देवी का प्रत्यक्षरूप से दर्शन कर सकेंगे ' और फिर चारों वेदों ने मिलकर देवी की दिव्य स्तुति की।परिणामस्वरूप ज्योतिस्वरूपा,सनातनी जगदम्बा प्रकट हो गयीं।उनमें सहस्र सूर्यों की आभा, करोड़ों चन्द्रों की शीतल चन्द्रिका व्याप्त थी और वे सहस्रों भुजाओं में विविध आयुधों को धारण किये हुये दिव्य अलंकरणों से अलंकृत थी।देवी का प्रत्यक्ष दर्शन कर और उनका रहस्य जानकर व्यासजी तत्क्षण जीवनमुक्त हो गये।तत्पश्चात देवी ने उनकी मानसिक अभिलाषा जानकर उन्हें अपने पदतल में संलग्न सहस्रदलकमल का दर्शन कराया, जिसके सहस्रों पत्रों पर देवीपुराण (महाभागवतपुराण) दिव्याक्षरों में अंकित था -------

               ततो  भगवती  देवी  ज्ञात्वा  तस्याभिवांछितम् । स्वपादतलसंलग्नं  पंकजं  समदर्शयत् ।।
               मुनिस्तस्य    सहस्रेषु    दलेषु    परमाक्षरम्   । महाभागवतं  नाम   पुराणं  समलोकयत् ।।
              
                                                                                  ( देवीपुराण  ( महाभागवतपुराण )   १।४८- ४९ )

देवी की कृपा से वही पुराण व्यासजी के हृदय में प्रकाशित हो गया और उन्होंने फिर इस देवीपुराण की रचना की।इस पुराण में मुख्य रूप से देवी के महात्म्य एवं उनके विभिन्न चरित्रों की प्रधानता है, इसी कारण इसे देवीपुराण कहा गया है।इस पुराण में मूल प्रकृति भगवती आद्याशक्ति के गंगा , पार्वती , सावित्री , लक्ष्मी , सरस्वती तथा तुलसी आदि रूपों में विवर्तित होने के रोचक आख्यान विस्तार से आये हैं।मूल प्रकृति के ही दक्षप्रजापति के यहाँ देवी सती के रूप में अवतरित होने की कथा विस्तार से इसमें प्राप्त होती है।इस पुराण में दक्षप्रजापति - यज्ञवर्णन, छाया सती का यज्ञ अग्नि में प्रवेश, सती के अंगों से ५१ ( इक्यावन ) शक्तिपीठों का आविर्भाव, विशेष रूप से कामाख्यायोनिपीठ का वर्णन, मूल प्रकृति द्वारा हिमालय को उपदिष्ट देवीगीता, भगवान् शिवप्रोक्त ललितासहस्रनाम, राजर्षि भगीरथप्रोक्त गंगासहस्रनाम, भगवान् शंकर तथा पार्वती का विवाह, कार्तिकेय के आविर्भाव की कथा, तारकासुरवध एवं गणेशजी का आविर्भाव आदि कथानक वर्णित है।इस पुराण में आये हुये श्रीरामोपाख्यान में रामायण की कथा का सार निरूपित है। साथ ही श्रीकृष्ण चरित्र तथा महाभारत की कथा भी विस्तार से इसमें विवेचित है।देवराज इन्द्र द्वारा देवी की उपासना, गंगा के नदी रूप में परिवर्तित होने की कथा, वामनावतार की कथा तथा विस्तार से गंगा महात्म्य का वर्णन है।यह गंगा महिमा लगभग दस अध्यायों में है।साथ ही तुलसी, आमलक, बिल्व तथा रूद्राक्ष की महिमा का भी विस्तार से निरूपन हुआ है।अन्त में शिवशक्त्यात्मक पार्थिव अन्य लिंगों की पूजा विधि, उपासना, अराधना एवं महिमा वर्णित है।

Sunday, 28 August 2016

Jaimal Ki Pad Sevan Bhakti. ( जयमल की पाद सेवन भक्ति ।)

एक जयमल नाम के प्रभु चरणों के अनुरागी भक्त थे।वे अपने घर के ऊपर के कमरे में प्रभु की चरण सेवा किया करते थे।प्रभु उनकी अटूट प्रेम भक्ति से प्रसन्न होकर रात्रि के समय रोज दर्शन देने लगे।भक्त जयमल भी बड़े प्रेम से प्रभु की चरण सेवा करने लगे और अपनी पत्नी के पास जाना भूल गये।पत्नी सोंच में पड़ गई कि उनके पति आजकल कहाँ जाने लग गये हैं? दूसरे दिन उनकी पत्नी ने सोंचा आज मैं देखती हूँ ये कहाँ जाते हैं और यही सोंचकर उसने अपने पति का रात में पीछा किया तो देखती है पतिदेव साक्षात प्रभु की सेवा करने में मग्न हैं। प्रभु के दर्शन पाकर वो स्वयं भी मंत्रमुग्ध हो गई और प्रभु के चरणों में गिर गई। प्रभु दोनों को भक्ति का आशीर्वाद देकर अन्तर्धान हो गये।
   

Wednesday, 10 August 2016

Haritalika Teej Vrat Katha .(हरितालिका तीज व्रत कथा । )



हरितालिका ( तीज ) व्रत हिन्दी के भाद्रपद की शुक्लपक्ष तृतीया के दिन होता है।
कथा ----- सूतजी बोले --- जिन श्री पार्वती जी के घुँघराले केश मन्दार की माला से अलंकृत हैं और मुंडों की माला से जिन शिवजी की जटा अलंकृत है, जो ( पार्वती जी ) सुन्दर एवं नए वस्त्रों को धारण करने वाली हैं और जो ( शिवजी ) दिगम्बर हैं ऐसी श्री पार्वती जी तथा शिवजी को मैं प्रणाम करता हूँ।
कैलाश पर्वत के सुन्दर विशाल चोटी पर बैठी हुई श्री पार्वती जी ने भगवान शंकर से कहा ---- हे महेश्वर! हमें कोई गुप्त व्रत या पूजन बताइये जो सभी धर्मों में सरल हो , जिसमें अधिक परिश्रम भी नहीं करना पड़े और फल भी अधिक मिले।हे परमेश्वर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हों तो इसका विधान बताइये।तथा यह भी बताने की कृपा करें कि किस तप, व्रत दान से ,आदि , मध्य और अन्त रहित आप जैसे महा प्रभु हमको प्राप्त हुए हैं।
शंकर जी बोले------ हे देवि! सुनो मैं तुमको एक उत्तम व्रत जो मेरा सर्वस्य और छिपाने योग्य है तुम्हें बतलाता हूँ। जैसे नक्षत्रों में चन्द्रमा,ग्रहों में सूर्य,वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में विष्णु भगवान, नदियों में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों मे सामवेद और इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ हैं।सब पुराण और स्मृतियों में जिस तरह कहा गया है,मैं तुम्हे वह व्रत बतलाता हूँ ,तुम उसे एकाग्र मन से श्रवण करो।जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसन प्राप्त किया है, वह मैं तुमको बतलाऊँगा।क्योंकि तुम मेरी अर्धांगिनी हो।भादो का महीना हो, शुक्ल-पक्ष की तृतीया तिथि हो, हस्त नक्षत्र हो, उसी दिन इस व्रत के अनुष्ठान से मनुष्यों के सभी पाप भस्मीभूत हो जाते हैं।
हे देवि! जिस महान व्रत को तुमने हिमालय पर्वत पर किया था, वह सब पूरा वृतान्त मैं तुमसे कहूँगा।श्री पार्वती जी बोली , हे नाथ! मैंने क्यों यह सर्वोत्तम व्रत किया था, यह सब आपसे सुनना चाहती हूँ।शिवजी बोले --- हिमालय नामक एक उत्तम महान पर्वत है।उसके आस-पास तरह-तरह की भूमियाँ हैं।तरह-तरह के वृक्ष लगे हुये हैं।अनेकों प्रकार के पक्षी और पशु उस पर निवास करते हैं।वहाँ गन्धर्वों के साथ बहुत से देवता, सिद्ध, चारण और पक्षीगण सर्वदा प्रसन्न मन से विचरते हैं।वहाँ पहुँचकर गन्धर्व गाते हैं, अप्सरायें नाचती हैं ।उस पर्वतराज के कितने ही शिखर स्फटिक, रत्न और वैदूर्यमणि आदि खानों से भरे हुये हैं।उस पर्वत की चोटियाँ इतनी ऊँची हैं मानों आकाश को छू रही हों।उसकी सभी चोटियाँ सर्वदा बर्फ से ढकी रहती हैं और गंगा की जल ध्वनि भी सदा सुनाई देती रहती है।हे पार्वती! तुमने वहीं बाल्यावस्था में बारह वर्ष पर्यन्त कठोर तप किया और उसके बाद कुछ वर्ष केवल पत्ते खाकर रहीं।माघ महीने में जल में खड़ी हो तप किया और वैशाख में अग्नि का, तथा सावन में तुम भूखी-प्यासी रहकर तप करती रही।
तुम्हारे पिता तुम्हें इस प्रकार के कष्टों में देखकर बड़े दुखी हुये।वे चिन्ता में पड़ गये कि मैं अपनी कन्या का विवाह किसके साथ करूँ।उसी समय श्रेष्ठ मुनि नारद जी वहाँ आ पहुँचे।नारद जी को सम्मान के साथ आसन देकर आपके पिता पर्वत राज ने उनसे कहा , मुनिवर आप यहाँ आये, यह मेंरा सौभाग्य है।नारद जी बोले -- हे पर्वत राज! मुझे स्वयं विष्णु भगवान ने आपके पास भेजा है।नारद जी ने कहा-- आपकी कन्या, सामान्य कन्या नहीं है,इसलिये इसका विवाह किसी योग्य वर के साथ ही होना चाहिये।संसार में ब्रह्मा, इन्द्र, और शिव इत्यादिक देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ माने जाते हैं ।अत:मेरी सम्मति में उन से ही अपनी कन्या का विवाह करना उत्तम है।पर्वतराज हिमालय बोले देवाधिदेव--- भगवान विष्णु स्वयं मेरी कन्या का हाथ माँग रहे हैं और आप यह सन्देशा लेकर आये हैं , तो मैं अपनी कन्या का विवाह भगवान विष्णु के साथ ही करूँगा।यह सुनकर नारदजी वहाँ से अन्तर्धान होकर ,पीताम्बर, शंख, चक्र और गदाधारी भगवान विष्णु के पास पहुँचे।नारदजी ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से कहा ------- हे देव! मैंने आपका विवाह निश्चित कर दिया है।
            उधर हिमालयराज ने अपनी पुत्री पार्वती के पास जाकर कहा कि पुत्री! मैंने तुम्हारा विवाह भगवान विष्णु के साथ निश्चित किया है।तब पिता की बात सुनकर अत्यन्त दु:खी हो पृथ्वी पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।तुम्हारी सखियों ने यह सब देखकर तुमसे चुपचाप पूछा, हे देवि! तुम्हें क्या दु: ख है हमसे कहो,हमलोग यथाशक्ति उसका निवारण करने की कोशिष करेंगे।पार्वतीजी ने कहा--- हे सखी! मुझे प्रसन्न करना चाहती हो तो मेरी जो कुछ अभिलाषा है उसे प्रेमपूर्वक सुनो।मैं एकमात्र शिवजी को ही अपने पति रूप में वरण करना चाहती हूँ,इसमें कुछ भी संशय नहीं है।परन्तु मेरे पिताजी मेरा विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते हैं यदि एेसा हुआ तो मैं अपना शरीर त्याग दूँगी।
पार्वतीजी की बात सुनकर सखियों ने कहा,पार्वती! तुम घबराओ नहीं, हमदोनो तुम्हें यहाँ से निकालकर ऐसे वन में पहुँच जायेंगे,जहाँ तुम्हारे पिताजी हमें ढूँढ ही नहीं पायेंगे।शिवजी कहते हैं-- देवि! ऐसी सलाह कर तुम अपनी सखियों के साथ वैसे घनघोर वन में जा पहुँची।इधर तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर घर-घर तुम्हारी खोज करवाने लगे।दूतों द्वारा भी खोज करवाने लगे कि कौन देवता-दानव या किन्नर मेरी पुत्री को हर ले गया है।तुम्हारे पिता सोंचने लगे,कि अब मैं भगवान विष्णु को क्या उत्तर दूँगा , ऐसा सोंचते-सोंचते वे अचेत हो गये।पर्वतराज को मूर्छित देखकर सब लोग हाहाकार करते दौड़ पड़े, और चिन्ता का कारण पूछने लगे।गिरिराज ने कहा आप सब लोग मेरे दु:ख का कारण सुनो! मेरी पुत्री को न जाने कौन हर ले गया है अथवा काले सर्प ने डस लिया है, या ब्याघ्र ने खा लिया है।पता नहीं मेरी कन्या कहाँ चली गई।ऐसा कहकर वे पुन: दु:ख से वेचैन होने लगे।इधर अपनी सखी के साथ तुम भी उस भयानक वन में चलते-चलते एक ऐसे जगह पर जा पहुँची जहाँ एक सुन्दर नदी बह रही थी और उसके तट पर एक बड़ी गुफा थी। तुमने उसी गुफा में आश्रय लिया,और मेरी एक बालू की प्रतिमा बनाकर अपनी सखी के साथ निराहार रहकर मेरी अराधना करने लगीं।उस दिन भाद्र शुक्ल पक्ष की हस्तयुक्त तृतीया थी तब तुमने मेरा विधिवत् पूजन किया और रात भर जागकर भजन कीर्तन के साथ मुझे प्रसन्न करने में बिताया।
        उस व्रतराज के प्रभाव से मेरा आसन डगमगा उठा।तब तत्काल मैं उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ तुम अपनी सखियों के साथ पूजा में मग्न थी।वहाँ पहुँकर मैंने तुमसे कहा कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, वर माँगो।तब तुमने कहा--- यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये कि मैं आपकी अर्धांगिनी बन सकूँ।मेरे 'तथास्तु 'कह कर  कैलास पर्वत पर वापस आने पर तुमने मेरी मूर्ति का नदी में विसर्जन किया और सखी के साथ उस महाव्रत का पारण किया।तुम्हारे पिता भी तब तक तुम्हें ढूँढते हुये उस वन में आ पहुँचे।तुम्हें देखते ही उन्होंने तुम्हें अपने गले से लगा लिया और पूछने लगे ,पुत्री तुम सिंह,व्याघ्र आदि खतरनाक जंगली जानवरों से भरे वन में क्यों आ पहुँची।तुमने उत्तर दिया ,पिताजी! आप मेरा विवाह विष्णुजी के साथ करना चाहते थे परन्तु मैंने पहले ही शिवजी को पति रूप में वरण कर लिया है।तब पर्वतराज ने तुम्हें सान्त्वना दिया कि पुत्री तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तुम्हारा विवाह कहीं और नहीं करूँगा।तुम्हें अपने साथ घर ले आये और तुम्हारा विवाह मेरे साथ कर दिया।इसी से तुमने मेरा अर्धासन पाया है।
    अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि इस ब्रत का नाम हरितालिका क्यों पड़ा।तुम्हारी सखियाँ पिता के घर से तुम्हारा हरण कर ले गई थी, इसी से इस ब्रत का नाम हरितालिका पड़ा।पार्वतीजी बोलीं--- हे प्रभो! कृपा करके इस ब्रत की विधि तथा इसके करने से क्या फल मिलता है यह भी बताने का कष्ट करें।शिवजी बोले--- हे देवि! यह ब्रत सौभाग्यवर्धक है।जो स्त्री अपने सौभाग्य की रक्षा करना चाहती है, उसेइस ब्रत को करना चाहिये।इस ब्रत में शिवजी तथा पार्वतीजी की प्रतिमा बनाकर स्थापित करे तथा पुष्प धूप मिष्ठान तथा फल आदि से विधिवत पूजन करें , नारियल पान सुपारी श्रद्धापूर्वक अर्पित करें तथा पार्वतीजीके श्रृंगार की सभी आवश्यक वस्तुयें ( चुन्नी चूड़ी सिंदूर विन्दी आदि) चढ़ाएँ।
    शिवजी तथा पार्वतीजी को श्रद्धा से दोनों हाथ जोड़कर नमन करें।फिर शिवजी तथा माता पार्वती की आरती करें।दूसरे दिन सूर्योदय से पहले पूजन कर अपना ब्रत समापन करना चाहिये।शिवजी तथा पार्वतीजी की प्रतिमा को नदी में विसर्जन कर ब्राह्मण को अन्न तथा द्रव्य दान देकर पारण करना चाहिये।
"जय भोलेनाथ जय माँ जगदम्बे।"


  

Saturday, 6 August 2016

Bhakt aur bhagwan ke beech madhur Vinod

श्रीकृष्ण भगवान का एक बहुत ही प्यारा भक्त था, जिसका नाम अहमदशाह था।अहमद को भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते रहते थे।उन्हें प्रभु की अहैतुकी कृपा प्राप्त होती रहती थी।भगवान अपने भक्त के साथ कभी-कभी मधुर विनोद भी किया करते थे।एक दिन अहमदशाह अपनी लम्बी टोपी पहन कर भगवान के ध्यान में बैठे थे ।भगवान को उनकी टोपी देखकर हँसी सूझी।वे उनके पास प्रकट होकर बोले---- "अहमद ! मेरे हाथ अपनी टोपी बेचोगे क्या ?" अहमद श्रीकृष्ण की बात सुनकर प्रेम से भर गये, पर उन्हें भी विनोद सूझा।अहमद ने कहा ---"चलो हटो , दाम ( कीमत )देने के लिये तो कुछ है नहीं और अाये हैं टोपी खरीदने!" अब प्रभु को इस विनोद में आनंद आने लगा था उन्होंने कहा "नहीं जी , मेरे पास बहुत कुछ है !" अहमद ने कहा "बहुत कुछ क्या है, लोक - परलोक की समस्त सम्पत्ति ही तो आपके पास है, पर यह सब लेकर मैं क्या करूँगा ?"
                भगवान ने कहा---- "देखो अहमद! यदि तुम मेरी इस प्रकार उपेक्षा करोगे तो मैं संसार में तुम्हारा मूल्य घटा दूँगा।तुम्हें लोग इसलिये पूछते हैं, तुम्हारा आदर करते हैं कि तुम मेरे भक्त हो और मैं भक्त के हृदय में निवास करता हूँ। किन्तु अब मैं सभी से कह दूँगा कि अहमद मेरी हँसी उड़ाता है , इसलिये तुमलोग उसका आदर मत करना।फिर संसार का कोई व्यक्ति तुम्हें आदर नहीं करेगा।" अब तो अहमद भी बड़े तपाक से बोले ---- "अच्छा जी ! मुझे दुनिया का डर दिखा रहे हो ! यदि आप मेरा मूल्य घटा दोगे तो मैं भी आपका मूल्य घटा दूँगा।मैं सबसे कह दूँगा कि भगवान् बहुत सस्ते मिल सकते हैं , वे सर्वत्र रहते हैं , सबके हृदय मे निवास करते हैं।जो कोई उन्हें अपने हृदय में झाँककर देखना चाहेगा , उसे वो वहीं मिल सकते हैं ,कही जाने की जरूरत नहीं है।फिर लोगों में आपका सम्मान भी कम हो जायेगा।"
                             भगवान हँसे और अहमद से बोले "तुम जीते और मैं अपने भक्त से हारकर भी खुश हूँ।" यह कह कर प्रभु अन्तर्धान हो गये।अहमद पुन: प्रभु के ध्यान में लग गये।

Monday, 20 June 2016

Shree Krishna Stuti (श्री कृष्ण स्तुति ) ।



              
 

श्री कृष्णचन्द्र कृपालु भजु मन, नन्द नन्दन यदुवरम् ।
                  आनन्दमय सुखराशि ब्रजपति, भक्तजन संकटहरम् ।
सिर मुकुट कुण्डल तिलक उर, बनमाल कौस्तुभ सुन्दरम् ।
                     आजानु भुज पट पीत धर, कर लकुटि मुख मुरली धरम् ।
बृष भानुजा सह राजहिं प्रिय , सुमन सुभव सिंहासनम् ।
                       ललितादि सखिजन सेवहिं, लिए छत्र चामर व्यंजनम् ।
पूतना-तृण-शंकट-अधबक , केशि-व्योम-विमर्दनम् ।
                        रजक-गज-चाणूर-मुष्टिक , दुष्ट कंस निकन्दनम् ।
गो-गोप गोपीजन सुखद , कालीय विषधर गंजनम् ।
                         भव-भय हरण अशरणशरण , ब्रह्मादि मुनि-मन रंजनम् ।
श्याम-श्यामा करत केलि , कालिन्दी तट नट नागरम् ।
                           सोइ रूप मम हिय बसहुँ नित , आनन्दघन सुख सागरम् ।
इति वदति सन्त सुजान श्री सनकादि मुनिजन सेवितम् ।
                           भव-मोतिहर मन दीनबन्धो , जयति जय सर्वेश्वरम् ।

Tuesday, 31 May 2016

ShreeKrishnashtakam ( श्रीकृष्णाष्टकम् )




भजे  व्रजैकमण्डनं   समस्तपापखण्डनं 
 स्वभक्तचित्तरंजनं  सदैव  नन्दनन्दनम् ।
सुपिच्छगुच्छमस्तकं  सुनादवेणुहस्तकं
ह्वानंगरंगसागरं   नमामि    कृष्णनागरम्  ।। १  ।।

मनोजगर्वमोचनं      विशाललोललोचनं
विधूतगोपशोचनं   नमामि  पद्मलोचनम् ।
करारविन्दभूधरं        स्मितावलोकसुन्दरं 
महेन्द्रमानदारणं   नमामि   कृष्णवारणम्  ।।२ ।।

कदम्बसूनूकुण्डलं    सुचारुगण्डमण्डलं
व्रजांगनैकवल्लभं  नमामि  कृष्ण दुर्लभम् ।
यशोदया  समोदया सगोपया  सनन्दया 
युतं  सुखैकदायकं नमामि  गोपनायकम्  ।।३ ।।

सदैव  पादपंकजं   मदीयमानसे   निजं
दधानमुत्तमालकं  नमामि  नन्दबालकम् ।
समस्तदोषशोषणं    समस्तलोकपोषणं
समस्तगोपमानसं नमामि  कृष्णलालसम् ।।४ ।।

भुवो   भरावतारकं   भवाब्धिकर्णधारकं
यशोमतीकिशोरकं  नमामि  दुग्धचोरकम्।
दृगन्तकान्तभंगिनं       सदासुबालसंगिनं
दिने  दिने  नवं  नवं  नमामि  नन्दसंभवम् ।।५ ।।

गुणाकरं   सुखाकरं   कृपाकरं   कृपावरं
सुरद्विषन्निकन्दनं   नमामि   गोपनन्दनम् ।
नवीनगोपनागरं        नवीनकेलिलम्पटं
नमामि  मेघसुन्दरं    तडित्प्रभालमत्पटम् ।।६ ।।

समस्तगोपनन्दनं       हृदम्बुजैकमोहनं
नमामि   कुंजमध्यगं   प्रसन्नभानुशोभनम् ।
निकामकामदायकं     दृगन्तचारूसायकं
रसालवेणुगायकं   नमामि  कुंजनायकम् ।।७ ।।

विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञतल्पशायिनं
नमामि  कुंजकानने  प्रवृद्धवह्निपायिनम्।
यदा तदा यथा तथा तथैव  कृष्णसत्कथा
मया सदैव गीयतां तथा कृपा विघीयताम् ।
प्रमाणिकाष्टकद्वयं     जपत्यधीत्य   य: 
पुमान्भवेत्स  नन्दनन्दने  भवे  भवे  सुभक्तिमान् ।।८ ।।



Wednesday, 18 May 2016

दादी या नानी माँ के घरेलू प्राथमिक उपचार

(इलायची का उपयोग)  १-   मुँह में छाले हो तो इलायची को पीसकर उसमें शहद मिलाकर लगाने से छाले ठीक होते हैं।

२-   २-३  ग्राम इलायची को पीसकर मिश्री मिलाकर लेने से पेशाब कम अाना या जलन होने की समस्या में शीघ्र लाभ होता है।

३-     हिचकी नहीं रुक रही हो तो २ इलायची व ३ लौंग को पानी में चाय की तरह थोड़ी देर उबाल कर पिलाने से लाभ होता है।यदि एक बार में ठीक नहीं हुआ तो यह प्रयोग दिन में ३-४ बार कर सकते हैं।

(काली मिर्च )-----१-  यदि खाँसी के कारण सो नहीं पा रहे हैं तो १-२ काली मिर्च मुँह में रखकर चूसते रहने से खाँसी में आराम हो जायेगा तथा नींद भी आ जायेगी।

२-      थोड़ा अदरक व ३-४ काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से खाँसी में तुरन्त आराम होता है।

३--    शीतपित्त होने पर ४-५ कालीमिर्च पीसकर उसमें १ चम्मच गर्म घी और शक्कर मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

४--   खाँसी व उसके साथ कमजोरी भी हो तो २० ग्राम कालीमिर्च, १०० ग्राम बादाम , १५० ग्राम मिश्री मिलाकर कूटकर पाउडर बनाकर किसी साफ शीशी में भरकर रख लें, सुबह - शाम गर्म दूध के साथ अथवा गर्म पानी से लेने से पुरानी खाँसी भी ठीक हो जाती है।इससे कमजोरी में भी लाभ होता है।


(मेथी का उपयोग-)-------

१-     एक चम्मच मेथी को एक कप पानी में भिगो दें। प्रात: उस पानी को पीकर मेथी को भी चबाकर खायें।मधुमेह में इससे लाभ होगा व इससे होने वाली कमजोरी, वातरोगों व हृदयरोग में भी फायदा होगा।

२---- मेथी , हल्दी  तथा सौंठ को बराबर मात्रा में लेकर पाउडर करके रखें। १-१ चम्मच सुबह -शाम गर्म पानी या गर्म दूध के साथ लेनें से जोड़ों के दर्द या सभी तरह के वात रोग या सूजन में लाभ होता है।

३---     पुराने अर्थराइटिस के रोगियों को लम्बे समय तक मेथी का प्रयोग करने से चमत्कारी लाभ होता है।

४---  आर्थराइटिस व मधुमेह के रोगियों को मेथी को अंकुरित करके भी प्रतिदिन सेवन करने से लाभ मिलता है।

५---  सर्दी तथा कफ में मेथी एवं अदरक का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होता है।


(अदरक का प्रयोग-)----- 

१--  भोजन के आरंभ में ३-४ छोटे टुकड़े अदरक लेने से भूख बढ़ती है तथा भोजन के पश्चात लेने से भोजन पचता है।

२--- २ चम्मच अदरक के रस में थोड़ा शहद मिलाकर लेने से सर्दी जुकाम एवं खाँसी में फायदा मिलता है।

३-----  यदि ठंढ से दाँत में दर्द हो तो एक टुकड़ा अदरक को दाँत में दबाकर रखने से तुरन्त लाभ मिलेगा।

४------  अदरक को भूनकर चूसने से खाँसी में लाभ होता है।

५-------   २-३ ग्राम सौंठ पाउडर में१/२ या १ ग्राम दालचीनी मिलाकर दूध या पानी के साथ लेने से पाचन ठीक रहता है तथा हृदय को ताकत मिलता है।

६------   अदरक के रस में नींबू का रस मिलाकर पीने से मन्दाग्नि दूर होकर भूख लगती है।

७-------  २ ग्लास पानी में ५ ग्राम अदरक कूटकर उबालकर उसमें नींबू का रस तथा थोड़ा शहद डालकर सुबह खाली पेट गुनगुना पीने से मोटापा कम होता है।

Tuesday, 17 May 2016

Jhanki Karne ko Aaj , Mai ShreeJee Ke Dwar Chali.


सपने को साकार बनाया, करके कृपा मुझे पास बुलाया ,
मुझ अनाथ को श्रीनाथ ने ,  देकर  प्रेम सनाथ बनाया ,
अपने पतिदेव के साथ चली ,   मेरी नैया पार लगी ।
झाँकी करने को आज मैं ,  श्रीजी के द्वार चली ।
बहुत दिनों के बाद ,       मेंरी    तकदीर  खुली  ,
झाँकी करने को आज ,  मैं श्रीजी के द्वार चली ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण-------------------।

मोर चन्द्रिका शीश पे सोहे , श्याम छवि सब का मन मोहे ,
मुझे हाथ से पास बुलावे ,  कटी हाथ में कमल धरावे ,
मेरी नाथ  नगरिया,  प्रभु की बगिया,  महके गली - गली,
झाँकी करने को आज , मैं   श्रीजी के   द्वार चली ।
बहुत दिनों के बाद-------------------- ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण --------------।


जाकर सन्मुख बैठ धरूँगी , निरख - निरख छवि दरश करूँगी ,
सेवा करके श्रीनाथ की    ,  जीवन अपना सफल करूँगी ,
माला भी मैं गूथूँगी  ,   चुन -  चुन कर  कली - कली ।
झाँकी करने को आज मैं ,  श्रीजी के द्वार चली ।
बहुत दिनों के बाद ----------------- ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण -------------।





Saturday, 14 May 2016

एलोवेरा के गुण

१-   घृतकुमारी ( एलोवेरा ) के गुदे को निकालकर ,टुकड़े बनाकर पकाकर खाने से सन्धिवात, वायु विकार , पेट व यकृत् के विकार का नाश होता है।

२-   कटे हुए या जले हुए स्थान पर उसी समय एलोवेरा जेल या रस लगाने से फफोला नहीं पड़ता, रक्त बहना रुक जाता है तथा जख्म जल्दी ठीक हो जाता है।

३-   ४ - ६ चम्मच एलोवेरा रस प्रतिदिन पीने से समस्त पेट के रोग व शरीरगत कमजोरी में लाभ होता है।

४-      एलोवेरा जेल को चेहरे पर लगाने से चेहरे की कान्ति बढ़ती है।झाइयाँ , कील , मुहासों में भी लाभ होता है।

५-     हाथ - पैरों की रूक्षता में एलोवेरा जेल लगाने से तुरन्त लाभ होता है।

Tuesday, 29 March 2016

अजवायन के गुण ।

अजवाइनको पीस कर त्वचा पर लगाने से त्वचा रोग दूर होता है।

२- फोड़ा फुन्सी में अजवाइन को पीस कर नींबू के साथ लगाने से भी आराम मिलता है।

३- पित्त रोग में अजवाइन गुड़ लेने से पित्त रोग ठीक हो जाता है।

४- यदि सर्दी लगी हो तो अदरक का रस शहद के साथ बराबर मात्रा में लेने से आराम मिलता है।

५-  जो ज्यादा अल्कोहल पीते हैं, तथा अब वो अल्कोहल वाला शराब छोड़ना चाहते हैं तो १/२ किलो ग्राम . अजवायन को ४ लीटर पानी में पकाकर जब दो लीटर बच जाये तो छानकर रख लें त़था प्रतिदिन भोजन के पहले १-१ कप पीयें।इससे लीवर ठीक रहेगा तथा शराब पीने की इच्छा भी कम होगी।

६-  २-३ ग्राम अजवायन को पाउडर करके छाछ के साथ लेने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते है।

७-  प्रसूता स्त्री के लिये १० ग्राम अजवायन को १ लीटर पानी में पकाकर १/४ शेष रहने पर छानकर सुबह - शाम पिलाने से प्रसूतिजन्य विकार नहीं होते।इससे बढ़ा हुआ शरीर भी अपनी स्थिति में वापस आ जाता है।

८-   १० ग्राम अजवायन को बारीक पीसकर उसमें १/२ नींबू का रस निचोड़ कर डालें, ५ ग्राम फिटकिरी पाउडर व छाछ को मिलाकर बालों में मलने से रूसी कम होता है तथा जुएँ भी मर जाती है।

Tuesday, 8 March 2016

ShreeRadhaRani Tatha Unki Asht Sakhiyan



श्रीराधारानी - चरण   बंदौं    बारंबार  ।
जिन के कृपा कटाच्छ तैं  रीझैं  नंदकुमार ।।

जिनके पद - रज - परस तें स्याम होयँ बेभान ।
बंदौं तिन पद - रज -कननि मधुर रसनि के खान।।

जिनके दरसन हेतु नित , बिकल रहत घनस्याम ।
 तिन  चरनन  मैं  बसै  मन  मेरौ आठौं  याम  ।।

जिन  पद  पंकज  पै  मधूप  मोहन  दृग  मँडरात।
तिन  की  नित झाँकी करन  मेरौ   मन ललचात ।।

' रा '  अक्षर  कौं  सुनत  हीं  मोहन  होत  बिभोर ।
बसैं   निरन्तर  नाम  सो ' राधा ' नित  मन  मोर ।।

     दो०--- बंदौं   श्रीराधाचरन  पावन  परम  उदार ।
               भय -बिषाद -अग्यान हर प्रेमभक्ति- दातार।।

श्री 'ललिता ' --- श्री ' ललिता ' लावण्य ललित सखि
      गोरोचन     आभा     युत   अंग   ।
      बिद्युदवर्णि      निकुंज - निवासिनि ,
     वसन      रुचिर  शिखिपिच्छ  सुरंग ।।
     इन्द्रजाल - निपुणा ,  नित    करती 
     परम    स्वादु     ताम्बूल    प्रदान   ।
     कुसुम - कला - कुशला , रचती कल
    कुसुम - निकेतन       कुसुम - वितान ।।

सखी ' विशाखा ----- सखी ' विशाखा विद्युत - वर्णा ,   
      रहती   बादल - वर्णा     कुँज 
    तारा - प्रभा     सुवसन  सुशोभित ,
    मन  नित  मग्न  श्याम - पद - कंज ।।
    कर्पूरादि      सुगन्ध - द्रव्य    युत
  लेपन    करती     सुन्दर     अंग ।
    बूटे - बेल     बनाती ,     रचती
   चित्र     विविध  रूचि  अँग - प्रत्यंग।।

' चित्रा ' --- अंग -  कांति    केसर  सी
      काँच  प्रभा  से  वसन  ललाम।
       कुंज - रंग  किंजल्क  कलित अति,
       शोभामय    सब    अंग   सुठाम   ।।
       विविध    विचित्र  वसन - आभूषण
       से    करती     सुन्दर     श्रृंगार   ।
       करती         सांकेतिक     अनेक
         देशों   की  भाषा  का  व्यवहार ।।

सखी ' इन्दुलेखा ' ----- सखी ' इन्दुलेखा ' शुचि करती
शुभ - वर्ण  शुभ  कुंज  निवास ।
अंग  कांति  हरताल  सदृश रँग 
दाड़िम  कुसुम  वसन  सुखरास ।।

करती  नृत्य  विचित्र  भंगिमा
संयुत  नित  नूतन  अभिराम ।
गायन  विद्या  निपुणा , व्रज की
ख्यात    गोपसुन्दरी   ललाम  ।।

 'चंपकलता '------ कांति   चम्पा सी, 
कुंज   तपे  सोने   के    रँग ।
नीलकण्ठ   पक्षी  के  रँग  के,
रुचिर   वसन  धारे  शुचि  अँग।।
चावभरे   चित   चँवर   डुलाती
अविरत   निज   कर - कमल  उदार ।
द्युत - पंडिता ,  विविध   कलाओं
से     करती   सुन्दर    श्रृंगार    ।।

सखी ' रंगदेवी '------- सखी रंगदेवी बसती अति
रुचिर    निकुंज ,  वर्ण  जो  श्याम  ।
कांति   कमल  केसर  सी  शोभित ,
जवा   कुसुम - रँग   वसन   ललाम  ।।
नित्य   लगाती   रुचि   कर - चरणों 
में     यावक     अतिशय   अभिराम ।
अास्था    अति   त्यौहार   व्रतों   में ,
कला - कुशल    शुचि    शोभाधाम  ।।

सखी ' तुंगविद्या ' ------- सखी  तुंगविद्या  अति  शोभित
कान्ति   चन्द्र ,  कुंकुम  सी  देह ।
वसन   सुशोभित  पीत  वर्ण  वर ,
अरुन  निकुंज ,  भरी   नव   नेह  ।।
गीत -वाद्य   से   सेवा   करती
अतिशय     सरस    सदा  अविराम ।
नीति - नाट्य - गन्धर्व  - शास्त्र --
निपुणा    रस    आचार्या    अभिराम ।।

सखी ' सुदेवी '----- सखी ' सुदेवी ' स्वर्ण- वर्ण - सी, 
वसन   सुशोभित  मूँगा  रंग ।
कुंज   हरिद्रा -  रंग   मनोहर
करती     सकल   वासना - भंग ।।
जल  निर्मल  पावन  सुरभित  से 
करती    जो    सेवा    अभिराम ।
ललित   लाड़ली की  जो  करती
बेणी -  रचना    परम     ललाम  ।।

अष्ट   सखी  करतीं  सदा , सेवा  परम  अनन्य ।
राधा - माधव - युगल की , कर  निज जीवन धन्य।।
इनके  चरण  सरोज  में  ,   बारम्बार     प्रणाम। 
करूणा  कर  दें  श्रीयुगल - पद - रज - रति  अभिराम ।।
                     



Wednesday, 2 March 2016

SreeRadhaJee Ki Aarti.



आरती    श्रीबृषभानु  लली    की ।
सत - चित - आनंद-  कंद - कली     की ।। टेक ।।

भयभंजिनि     भव - सागर - तारिनि ,
पाप - ताप - कलि - कल्मष - हारिनि , 
  दिब्यधाम - गोलोक -  बिहारिनि ,
जनपालिनि     जगजननि    भलीकी  ।। १ ।।

अखिल  बिस्व  आनंद - बिधायिनि , 
 मंगलमयी            सुमंगलदायिनि ,
  नंदनंदन - पद - प्रेम    प्रदायिनि ,
अमिय - राग - रस - रंग - रलीकी ।।२ ।।

नित्यानंदमयी     अाह्लादिनि ,
आनंदघन - आनंद - प्रसाधिनि ,
रसमयी ,   रसमय - मन - उन्मादिनि ,
सरस   कमलिनि  कृष्ण - अलीकी ।। ३ ।।

नित्य  निकुंजेस्वरी  रासेस्वरि ,
परम   प्रेमरूपा    परमेस्वरी , 
गोपिगणाश्रयि       गोपिजनेस्वरि ,
बिमल - बिचित्र - भाव - अवलीकी ।। ४ ।।

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Wednesday, 17 February 2016

Short Story Of Maharshi Valmeekijee. ( महर्षि वाल्मीकिजी की संक्षिप्त कथा ।)

एक समय की बात है , महर्षि वाल्मीकि वन में विचरण कर रहे थे । वन की शोभा अत्यन्त रमणीय थी ।वन में तरह - तरह के जीव - जन्तु तथा पक्षियों का बसेरा था।महर्षि जहाँ खड़े थे , उनके पास ही दो सुन्दर पक्षी स्नेहपूर्ण भाव से एक दूसरे के साथ रमण कर रहे थे।दोनों आपस में बहुत ही खुश लग रहे थे।उसी समय एक व्याध वहाँ आया और दोनों मे से एक को निर्दयतापूर्वक बाण से मार गिराया।यह देख महर्षि को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने वहीं बह रही सरिता का पवित्र जल हाथ में लेकर उस ब्याध को शाप दिया - ओ निरपराध पक्षी की हत्या करने बाले , तुझे कभी शाश्वत शान्ति नहीं मिलेगी, क्योंकि तूने इन पक्षियों में से एक को मारकर , जो काम से मोहित हो रहा था,दूसरे को एकाकी कर दिया।
                       यह वाक्य छन्दोबद्ध श्लोक के रूप में अचानक महर्षि के मुख से निकला, मुनि के शिष्य जो आस- पास थे प्रसन्न होकर कहने लगे , मुनिश्रेष्ठ यह छन्द तो बहुत सुन्दर श्लोक बन गया है।उसी समय ब्रह्माजी वहाँ प्रगट हुए और वाल्मीकिजी से कहने लगे,महर्षि ! आप धन्य हैं सरस्वतीजी आपके मुख में विराजमान होकर श्लोक रूप में प्रकट हुई हैं।इसलिये अब आप मधुर अक्षरों में सुन्दर रामायण की रचना कीजिये।मुख से निकलने वाली वही वाणी धन्य है जो श्रीरामनाम से युक्त हो।अत: आप अयोध्या के राजा दशरथजी के पुत्र श्रीरामचन्द्रजी के लोक प्रसिद्ध चरित्र को लेकर काव्य रचना कीजिये, जिससे आगे चलकर पग - पग पर पापियों के पाप का निवारण होगा।इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये।
                          एक दिन वाल्मीकिजी नदी तट पर ध्यान में थे कि श्रीराम उनके हृदय में प्रकट हुये।नील पद्मदल के समान श्याम विग्रह वाले कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन पाकर मुनि बड़े प्रसन्न हुये।मुनि को उनका भूत,वर्तमान तथा भविष्य तीनों काल के चरित्र का साक्षातकार हुआ।उसके बाद वाल्मीकिजी ने प्रभु श्रीराम की आज्ञासे रामायण की रचना सुन्दर छन्दों में किया।रामायण में ६: काण्ड हैं--- बालकाण्ड , आरण्यककाण्ड , किष्किन्धाकाण्ड , सुन्दरकाण्ड , युद्धकाण्ड , तथा उत्तरकाण्ड ।
 बालकाण्ड---- बालकाण्ड में राजा दशरथ के चार पुत्र , जो उन्होंने पुत्रेष्ठि यज्ञ करके प्राप्त किये थे । भगवान विष्णु अपने अंशो सहित उनके चारों पुत्रों के रूप में राजा दशरथ के घर पधारे थे।चारों भाईयों के गुरूकुल शिक्षा , उनके गुरू वशिष्ठ के आश्रम में होने के पश्चात, गुरू विश्वामित्र के यज्ञ में जाना , वहाँ से मिथिला में जाकर धनुष भंग कर राजा जनक की पुत्री सीता संग विवाह करना, अयोध्या में युवराज पद पर अभिषेक होने की तैयारी , और तत्पश्चात माता कैकेयी के कहने से प्रभुश्रीराम का अपने अनुज तथा पत्नी सीता के साथ वन जाना , गंगा पार करके चित्रकूट पर्वत पर सीता और लक्ष्मण के साथ निवास करना अादि प्रसंगों का उल्लेख है।उनके छोटे भाई भरत को जब ये ज्ञात होता है कि प्रभु श्रीराम उनकी कारण वन चले गये हैं तो वे उन्हें मनाने चित्रकूट पर्वत पर जाते हैं, और जब वे रामजी को नहीं लौटा सके तो स्वयं भी अयोध्या का राजभवन छोड़ कर नंदिग्राम में कुटिया बनाकर वास करते हैं।
      आरण्यकाण्ड ------अरण्यकाण्ड में प्रभु श्रीराम अपने भाई लक्षमण तथा पत्नी सीता के साथ वन में निवास करते हैं , तथा ऋषि मुनियों के दर्शन करते हैं ।पंचवटी में रहते हुये सूर्पनखा का लक्षमण द्वारा नाक काटना, खर और दूषण का विनाश , मारीच जो माया से सोने का हिरण बनकर आया था, उसका भी बध करना , रावण के द्वारा सीताजी का हरण, श्रीराम का विरहाकुल होकर सीता की खोज में वन - वन भटकना तथा मानव की तरह ही लीला करना ,कबन्ध से मुलाकात, शबरी की कुटिया में जाकर उन्हें दर्शन देना , पम्पासरोवर पर जाना और फिर हनुमानजी से मिलना ये सभी कथायें अारण्यकण्ड में आते हैं।

         किष्किन्धाकाण्ड ------ किष्किन्धाकाण्ड में सुग्रीव से मिलना, बालि का अद्भुत बध तथा सुग्रीव का लक्षमण द्वारा राज्यभिषेक तथा कर्तव्यपालन का संदेश देना सुग्रीव द्वारा सैन्यसंग्रह कर सीताजी की खोज में वानरों का भेजा जाना, सम्पाति से वानरों की भेंट , जामवंतजी द्वारा हनुमानजी को समुद्र लाँघने के लिये प्रेरित करना और फिर हनुमानजी का समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश करना ये सभी प्रसंग आता है।

सुन्दरकाण्ड------- सुन्दरकाण्ड जिसे रामायण का हृदय स्वरूप कहा गया है जहाँ प्रभु श्रीराम की अद्भुत कथा का वर्णन है।हनुमानजी का माता सीता की खोज लंका भवन में घूम-घूम कर प्रत्येक स्थान पर करना , विभीषन से मिलना, लंका में रहते हुये भी विभीषण का श्रीराम की भक्ति करना ,विभीषण की सहायता से सीताजी का अशोक वाटिका में दर्शन करना तथा रामजी का संदेश देना ,अशोक वाटिका का विध्वंस , लंका के राक्षसों द्वारा हनुमानजी का बंधन तथा उनके पूँछ में अाग लगाना, हनुमानजी के द्वारा लंका दाह और फिर सीतामाता का संदेश तथा चिन्ह स्वरूप चूड़ामणि लेकर वापस समुद्र लाँघकर आना वानरों से मिलना , प्रभु श्रीराम को सीताजी के द्वारा दी हुई चूड़ामणि अर्पण करना , रामजी की सेना का लंका के लिये प्रस्थान , समुद्र में पुल बाँधना , सेना में रावण के दूत , शुक और सारण का छल से प्रवेश , ये सभी प्रसंग सुन्दरकाण्ड में दिया गया है।

                    

Tuesday, 9 February 2016

Bhakt prahlad Ki Nyaypriya Katha. ( भक्त प्रह्लाद की न्यायप्रिय कथा ।)

प्रह्लाद पुत्र विरोचन , केशिनी नाम की एक अनुपम सुन्दरी कन्या के स्वयंवर में विवाह की इच्छा से पहुँचा।केशिनी सुधन्वा नाम के ब्राह्मण से विवाह करना चाहती थी।केशिनी ने विरोचन से पूछा -- विरोचन ! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य ? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं , तो मैं ब्राह्मण पुत्र सुधन्वा से ही विवाह करना पसंद करूँगी ।विरोचन ने कहा , हम प्रजापति की श्रेष्ठ संतानें हैं, अत: हम सबसे उत्तम हैं । हमारे सामने देवता भी कुछ नहीं हैं तो , ब्राह्मण श्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं।

           केशिनी ने कहा इसका निर्णय कौन करेगा? सुधन्वा ब्राह्मण जानता था कि ,दैत्य राज प्रह्लाद यहाँ के राजा हैं तथा धर्मनिष्ठ भी।अत: प्रह्लाद जी के पास जाने का प्रस्ताव सुधन्वा ने रखा।विरोचन को विश्वास था कि पिताजी तो निर्णय अपने पुत्र के पक्ष में ही देंगे।अत: विरोचन तथा सुधन्वा ने प्राणों की बाजी लगा लिया ।अब केशिनी सुधन्वा तथा विरोचन तीनों प्रह्लाद जी  की सभा में पहुँचे।

        प्रह्लाद ने अपने सेवकों से सुधन्वा ब्राह्मण के सत्कार के लिये जल तथा मधुपर्क मँगाया तथा बड़े ही भाव  से ब्राह्मण के चरण धुलवाकर आसन बैठने को दिया तथा पूछा कि आपने यहाँ आने का कष्ट कैसे किया? सुधन्वा ने कहा ! मैं तथा आपका पुत्र विरोचन प्राणों की बाजी लगाकर यहाँ अाये हैं , कि क्या ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन ?

                प्रह्लादजी यह सुनकर गंभीर हो गये।उन्होंने कहा , ब्रह्मण ! मेरे एक ही पुत्र है और इधर धर्म , मैं भला कैसे निर्णय दे सकता हूँ ? विरोचन ने कहा - राजन ! नीति जो कहती है , उसके आधार पर ही निर्णय कीजिये ।प्रह्लादजी ने अपने पुत्र से कहा-- विरोचन ! सुधन्वा के पिता  ऋृषि अंगिरा , मुझसे श्रेष्ठ हैं , इनकी माता , तुम्हारी माता से श्रेष्ठ हैं तथा सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है । अत: तुम सुधन्वा से हार गये हो।सुधन्वा आज से तुम्हारे प्राणों का मालिक है।

              सुधन्वा बोला-- प्रह्लाद !तुमने स्वार्थवश असत्य नहीं कहा है। तुमने धर्म को स्वीकार करते हुये न्याय किया है , इसलिये  तुम्हारा पुत्र मैं तुम्हें लौटा रहा हूँ लेकिन केशिनी के समक्ष इसे मेंरा पैर धोना पड़ेगा।विरोचन समझ गया , और स्वेक्षा से सुधन्वा ब्राह्मण के पैर धोकर आशीर्वाद लिया।

Tuesday, 2 February 2016

Gwalbal sang Dhenu Charawat Krishna.


श्यामसुन्दर अपने सखा से गैया चराते हुये कहते हैं, ' सखा सुबल, श्रीदामा, तुमलोग सुनो ! वृन्दावन मुझे बहुत अच्छा लगता है, इसी कारण मैं व्रज से यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ।कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि जितने वैकुण्ठ के सुख हैं,देवि लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ के उन सब सुखों को मैं भूल जाता हूँ।इस वृन्दावन में यहाँ यमुना किनारे गायों को चराना मुझे अत्यन्त प्रिय लगता है।कन्हैया अपने श्रीमुख से कहते हैं --' सखा तुमलोग मेरे मन को अति प्रिय लगते हो।गोपबालक यह सुनकर चकित हो जाते हैं ,कि श्रीहरि अपनी लीला का यह रहस्य उन्हें प्रत्यक्ष बतला रहे हैं।

                      गोपसखा हाथ जोड़कर कहते हैं---- 'श्यामसुन्दर ! तुम हमें कभी मत भूलना। जहाँ - जहाँ भी तुम अवतार धारण करो, वहाँ - वहाँ हमसे अपने चरण छुड़ा मत लेना ( हमें भी साथ रखना ) ।' श्रीकृष्णचन्द्र बोले---- ' व्रज से तुमलोगों को कहीं पृथक नहीं हटाऊँगा, क्योंकि यहीं , तुम्हारा साथ पाकर मैं भी व्रज में आता हूँ।व्रज के इस अवतार में जो आनंद प्राप्त हो रहा है, यह आनंद चौदहों लोकों में कहीं नहीं है।' यह मोहन ने बतलाया तथा कुछ बालक लौटकर घर जा रहे थे , उनसे कहकर दोपहर का भोजन मँगाया तथा सब साथ हिलमिल कर भोजन का आनन्द लेने लगे।

                 सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी कंधे पर काला कम्बल और हाथ में छड़ी लेकर वृन्दावन में गायें चराते हैं और 
 ' काली ' , ' गोरी ' , 'धौरी' , ' धूमरी ' , इस प्रकार नाम ले - लेकर उन्हें पुकारते हैं। जहाँ - तहाँ वन - वन में गोपबालक के साथ गायों को ढूँढते हैं ।समस्त लोकों का नाथ होने पर भी हाथ से अपना पीताम्बर उड़ाकर गायों को संकेत देकर बुला रहे हैं।

                        ' काँधे कान्ह कमरिया कारी , लकुट लिये कर घेरै हो  । 
                            बृन्दाबन में गाइ चरावै      , धौरी ,  धूमरी   टेरै     हो ।।
                         लै   लिवाइ ग्वालनि  बुलाइ कै ,  जहँ - तहँ बन - बन हेरै हो।
                         सूरदास प्रभु सकल लोकपति   ,   पीतांबर   कर  फेरै  हो  ।।'


Tuesday, 19 January 2016

Narad ji ki purv janam ki katha

 


नारदजी पूर्वजन्म में एक दासीपुत्र थे।उनकी माता भक्तों की जब सेवा करती थी, नारदजी भी उनके काम में सहायता करते थे।कभी- कभी माता की अनुपस्थिति में वे स्वयं भक्तों की सेवा करते रहते थे।नारदजी स्वयं कहते हैं ---

  उच्छिष्टलेपाननुमोदितो  द्विजै:
  सकृत्स्म  भुंजे  तदपास्तकिल्बिष: ।
   एवं  प्रवृत्तस्य   विशुद्धचेतस-
   स्तद्धर्म   एवात्मरुचि:  प्रजायते  ।।

श्रीमद्भागवतके इस श्लोक में ( १ . ५ . २५ ) नारदजी अपने शिष्य व्यासदेव से अपने पूर्वजन्म का वर्णन करते हैं ।वे कहते हैं कि पूर्वजन्म में बाल्यकाल में वे चातुर्मास में शुद्धभक्तों ( भागवतों ) ) की सेवा किया करते थे जिससे उन्हें उनकी संगति प्राप्त हुई।कभी-कभी वे ऋषि अपनी थालियों में उच्छिष्ट भोजन छोड़ देते और यह बालक थालियाँ धोते समय उच्छिष्ट भोजन को चखना चाहता था , अत: उसने उन ऋषियों से अनुमति माँगी और जब उन्होंने अनुमति दे दी तो बालक नारद उस उच्छिष्ट भोजन को खा लिया करते थे । फलस्वरूप वह बालक अपने समस्त पापकर्मों से मुक्त हो गये। ज्यों- ज्यों वह उच्छिष्ट खाता रहा त्यों - त्यों वह ऋषियों के समान शुद्ध- हृदय बनता गया। चूँकि वे महाभागवत भगवान् की भक्ति का आस्वाद श्रवण तथा कीर्तन द्वारा करते थे अत: नारदजी ने भी क्रमश: वैसी रुचि विकसित कर लिया। नारदजी आगे कहते हैं -----

               तत्रान्वहं    कृष्णकथा:  प्रगायताम्
                          अनुग्रहेणाशृणवं   मनोहरा: ।
               ता:   श्रद्धया  मेअनुपदं  विशृण्वत:
                 प्रियश्रवस्यंग   ममाभवद्  रुचि:  ।।

    ऋषियों की संगति करने से नारदजी में भी भगवान् की महिमा के श्रवण तथा कीर्तन की रुचि उत्पन्न हुई और उन्होंने भक्ति की तीब्र इच्छा विकसित की।अत: जैसा कि वेदान्तसूत्र में कहा गया है---- प्रकाशश्च  कर्मण्यभ्यासात्---- जो भगवद् भक्ति के कार्यों में केवल लगा रहता है उसे स्वत: सारी अनुभूति हो जाती है और वह सब समझने लगता है।इसी का नाम प्रत्यक्ष अनुभूति है।और यही  धर्म का परम लक्ष्य भक्ति की प्राप्ति है।
          
               

Thursday, 14 January 2016

Bhagwat Bhagwan Ki Hai Aarti ( भागवत् भगवान की है आरती )।



भागवत्  भगवान की है आरती ,
पापियों को पाप से है तारती ।---२ 

ये अमर ग्रंथ , ये मुक्ति पंथ ,
ये   पंचम  वेद   निराला ।
नव ज्योति जगाने वाला ,
हरि ज्ञान यही ,बरदान यही ,
जग के मंगल की आरती ,
पापियों को पाप से है तारती ।
भागवत् भगवान की है आरती ,
पापियों को पाप से है तारती।

ये शांतिगीत, पावन पुनीत,
पापों को मिटानेवाला ।
हरि दर्श  दिखाने वाला ,
है सुख करनी ,ये दु:खहरनी,
ये मधूसुदन की आरती।
पापियों को पाप से है तारती। 
भागवत् भगवान की है आरती,
पापियों को पाप से है तारती।

ये मधुर बोल, जग पंथ खोल,
सन्मार्ग दिखाने वाला ।
बिगड़ी को बनाने वाला,
श्रीराम यही, घनश्याम यही,
प्रभु के महिमा की आरती ।
पापियों को पाप से है तारती।
भगवत् भगवान की है आरती,
पापियों को पाप से है तारती।

Monday, 11 January 2016

Papa paiyaan, chalein kanhaiya...!!



नंद भवन के आँगन में श्यामसुन्दर ,अपने छोटे- छोटे चरणों से चलना सीख रहे हैं।मैया यशोदा कान्हा की अँगुली पकड़कर साथ - साथ घूम रही हैं।कान्हा के चलने से ,उनके छोटे छोटे पैंजनी के रुनझुन बजने की आवाज यशोदा मैया को हर्षित कर रही है।मोहन के कानों के कुंडल तथा भौंहों तक सुन्दर घुँघराले बालों की लटें लटकती हुई अत्यन्त शोभा दे रही है।पृथ्वी पर ठुमक - ठुमक कर कन्हा अपना चरण रखते हैं कि कहीं गिर न जायें।कभी गिरते हैं तो तुरंत उठ खड़े हो जाते हैं।अब उन्हें चलना अच्छा लगने लगा है।घर से आँगन तक चलना अब कान्हा के लिए सुगम हो गया है, किन्तु देहली लाँघा नहीं जाताहै,  लाँघने में बड़ा परिश्रम होता है, बार - बार गिर पड़ते हैं।देहली लाँघते नहीं बन बनता।

कान्हा जब देहली पार करते समय बार बार गिरते हैं ,तो उनकी इस क्रीड़ा से देवताओं तथा मुनियों के मन में भी संदेह उत्पन्न होने लगता है कि यह कैसी लीला है प्रभु की ? जो करोड़ों ब्रह्मांण्डों का एक क्षण में निर्माण कर देते हैं और फिर उनको नष्ट करने में भी देर नहीं लगाते, उन्हें आँगन की देहली , माँ यशोदा हाथ पकड़ कर धीरे - धीरे पार कराती हैं।बलरामजी यह देखकर मन ही मन कहते हैं -- ' वामन अवतार में पूरी पृथ्वी तीन पग में नापने वाले प्रभु से , घर की देहली पार करना कठिन हो रहा है।सूरदासजी कहते हैं यह दृष्य देख - देख कर देवतागण तथा मुनि भी अपनी विचार शक्ति खोकर मुग्ध हो जाते हैं।

Saturday, 9 January 2016

Use Of Turmeric ( हल्दी के गुण )

हल्दी के आयुर्वेद में अनेक गुण बताये गये हैं।धार्मिक कार्यों में हल्दी को मंगलकारी बताया गया हैं कोई भी शुभ कार्य हल्दी के बिना सम्पन्न नहीं होता। इसके अतिरिक्त हल्दी सौंदर्यवर्धक रक्तशोधक तथा एंटिसेप्टिक होती है।आयुर्वेद में कफ, वात, सूजन, कृमि , पित्त और अपचन घाव खुजली रक्तशोधक, तथा त्वचा के रोग में भी हल्दी उपयोगी साबित होता है।

सर्दी, खाँसी में ---गरम--दूध में ( एक ग्लास ) चुटकी भर हल्दी डालकर गरम - गरम ( पीने लायक ) पीने से सर्दी तथा खाँसी में आराम मिलता है।साबुत हल्दी के छोटे टुकड़े को सेककर सोते समय मुँह में रखकर चूसते रहने से जुकाम, कफ तथा खाँसी में लाभ होता है।

पेट के कृमि में ---२ से ४ वर्ष के बच्चे को यदि पेट में कीड़े की शिकायत हो तो आधा ग्राम हल्दी समान मात्रा में गुड़ के साथ गोली बनाकर  तीन - चार दिनों तक रात में सोने से पहले खिलाएँ।

चोट एवं सूजन ----- चोट लगने पर उस पर हल्दी का लेप किया जाता है, यदि सूजन भी हो तो हल्दी के साथ खाने का चूना मिलाकर हल्का गरम कर सूजन पर लेप करने से दो तीन बार में ही सूजन तथा चोट ठीक हो जाता है।

गला बैठना ------ एक ग्लास गर्म दूध में एक छोटा चम्मच हल्दी डालकर पीने से ( दो से तीन बार ) आवाज खुल जाता है।

मसूढ़ों की सूजन में ----- मसूढ़ों में सूजन तथा दर्द होने पर एक चम्मच सरसों के तेल में आधा चम्मच सेंधा नमक तथा चुटकी भर  पिसी हुई हल्दी लेकर उँगलियों से दाँतों की मालिस करने से 7-8 दिनों में ही लाभ मिलता है।

चोट- मोच आदि में ------ मांसपेशियों की आंतरिक मरम्मत के लिये एक ग्लास गाय का दूध में दो चुटकी शुद्ध हल्दी पिसी हुई डालकर नियमित एक सप्ताह तक पीने से चोट में आराम मिल जाता है।

हड्डियों के लिये------ दूध और हल्दी उबाल कर लेने से हड्डियों में मजबूती आती है ,क्योंकि यह कैल्सियम पूर्ति का भी स्रोत है।