Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Tuesday, 19 January 2016

Narad ji ki purv janam ki katha

 


नारदजी पूर्वजन्म में एक दासीपुत्र थे।उनकी माता भक्तों की जब सेवा करती थी, नारदजी भी उनके काम में सहायता करते थे।कभी- कभी माता की अनुपस्थिति में वे स्वयं भक्तों की सेवा करते रहते थे।नारदजी स्वयं कहते हैं ---

  उच्छिष्टलेपाननुमोदितो  द्विजै:
  सकृत्स्म  भुंजे  तदपास्तकिल्बिष: ।
   एवं  प्रवृत्तस्य   विशुद्धचेतस-
   स्तद्धर्म   एवात्मरुचि:  प्रजायते  ।।

श्रीमद्भागवतके इस श्लोक में ( १ . ५ . २५ ) नारदजी अपने शिष्य व्यासदेव से अपने पूर्वजन्म का वर्णन करते हैं ।वे कहते हैं कि पूर्वजन्म में बाल्यकाल में वे चातुर्मास में शुद्धभक्तों ( भागवतों ) ) की सेवा किया करते थे जिससे उन्हें उनकी संगति प्राप्त हुई।कभी-कभी वे ऋषि अपनी थालियों में उच्छिष्ट भोजन छोड़ देते और यह बालक थालियाँ धोते समय उच्छिष्ट भोजन को चखना चाहता था , अत: उसने उन ऋषियों से अनुमति माँगी और जब उन्होंने अनुमति दे दी तो बालक नारद उस उच्छिष्ट भोजन को खा लिया करते थे । फलस्वरूप वह बालक अपने समस्त पापकर्मों से मुक्त हो गये। ज्यों- ज्यों वह उच्छिष्ट खाता रहा त्यों - त्यों वह ऋषियों के समान शुद्ध- हृदय बनता गया। चूँकि वे महाभागवत भगवान् की भक्ति का आस्वाद श्रवण तथा कीर्तन द्वारा करते थे अत: नारदजी ने भी क्रमश: वैसी रुचि विकसित कर लिया। नारदजी आगे कहते हैं -----

               तत्रान्वहं    कृष्णकथा:  प्रगायताम्
                          अनुग्रहेणाशृणवं   मनोहरा: ।
               ता:   श्रद्धया  मेअनुपदं  विशृण्वत:
                 प्रियश्रवस्यंग   ममाभवद्  रुचि:  ।।

    ऋषियों की संगति करने से नारदजी में भी भगवान् की महिमा के श्रवण तथा कीर्तन की रुचि उत्पन्न हुई और उन्होंने भक्ति की तीब्र इच्छा विकसित की।अत: जैसा कि वेदान्तसूत्र में कहा गया है---- प्रकाशश्च  कर्मण्यभ्यासात्---- जो भगवद् भक्ति के कार्यों में केवल लगा रहता है उसे स्वत: सारी अनुभूति हो जाती है और वह सब समझने लगता है।इसी का नाम प्रत्यक्ष अनुभूति है।और यही  धर्म का परम लक्ष्य भक्ति की प्राप्ति है।
          
               

Thursday, 14 January 2016

Bhagwat Bhagwan Ki Hai Aarti ( भागवत् भगवान की है आरती )।



भागवत्  भगवान की है आरती ,
पापियों को पाप से है तारती ।---२ 

ये अमर ग्रंथ , ये मुक्ति पंथ ,
ये   पंचम  वेद   निराला ।
नव ज्योति जगाने वाला ,
हरि ज्ञान यही ,बरदान यही ,
जग के मंगल की आरती ,
पापियों को पाप से है तारती ।
भागवत् भगवान की है आरती ,
पापियों को पाप से है तारती।

ये शांतिगीत, पावन पुनीत,
पापों को मिटानेवाला ।
हरि दर्श  दिखाने वाला ,
है सुख करनी ,ये दु:खहरनी,
ये मधूसुदन की आरती।
पापियों को पाप से है तारती। 
भागवत् भगवान की है आरती,
पापियों को पाप से है तारती।

ये मधुर बोल, जग पंथ खोल,
सन्मार्ग दिखाने वाला ।
बिगड़ी को बनाने वाला,
श्रीराम यही, घनश्याम यही,
प्रभु के महिमा की आरती ।
पापियों को पाप से है तारती।
भगवत् भगवान की है आरती,
पापियों को पाप से है तारती।

Monday, 11 January 2016

Papa paiyaan, chalein kanhaiya...!!



नंद भवन के आँगन में श्यामसुन्दर ,अपने छोटे- छोटे चरणों से चलना सीख रहे हैं।मैया यशोदा कान्हा की अँगुली पकड़कर साथ - साथ घूम रही हैं।कान्हा के चलने से ,उनके छोटे छोटे पैंजनी के रुनझुन बजने की आवाज यशोदा मैया को हर्षित कर रही है।मोहन के कानों के कुंडल तथा भौंहों तक सुन्दर घुँघराले बालों की लटें लटकती हुई अत्यन्त शोभा दे रही है।पृथ्वी पर ठुमक - ठुमक कर कन्हा अपना चरण रखते हैं कि कहीं गिर न जायें।कभी गिरते हैं तो तुरंत उठ खड़े हो जाते हैं।अब उन्हें चलना अच्छा लगने लगा है।घर से आँगन तक चलना अब कान्हा के लिए सुगम हो गया है, किन्तु देहली लाँघा नहीं जाताहै,  लाँघने में बड़ा परिश्रम होता है, बार - बार गिर पड़ते हैं।देहली लाँघते नहीं बन बनता।

कान्हा जब देहली पार करते समय बार बार गिरते हैं ,तो उनकी इस क्रीड़ा से देवताओं तथा मुनियों के मन में भी संदेह उत्पन्न होने लगता है कि यह कैसी लीला है प्रभु की ? जो करोड़ों ब्रह्मांण्डों का एक क्षण में निर्माण कर देते हैं और फिर उनको नष्ट करने में भी देर नहीं लगाते, उन्हें आँगन की देहली , माँ यशोदा हाथ पकड़ कर धीरे - धीरे पार कराती हैं।बलरामजी यह देखकर मन ही मन कहते हैं -- ' वामन अवतार में पूरी पृथ्वी तीन पग में नापने वाले प्रभु से , घर की देहली पार करना कठिन हो रहा है।सूरदासजी कहते हैं यह दृष्य देख - देख कर देवतागण तथा मुनि भी अपनी विचार शक्ति खोकर मुग्ध हो जाते हैं।

Saturday, 9 January 2016

Use Of Turmeric ( हल्दी के गुण )

हल्दी के आयुर्वेद में अनेक गुण बताये गये हैं।धार्मिक कार्यों में हल्दी को मंगलकारी बताया गया हैं कोई भी शुभ कार्य हल्दी के बिना सम्पन्न नहीं होता। इसके अतिरिक्त हल्दी सौंदर्यवर्धक रक्तशोधक तथा एंटिसेप्टिक होती है।आयुर्वेद में कफ, वात, सूजन, कृमि , पित्त और अपचन घाव खुजली रक्तशोधक, तथा त्वचा के रोग में भी हल्दी उपयोगी साबित होता है।

सर्दी, खाँसी में ---गरम--दूध में ( एक ग्लास ) चुटकी भर हल्दी डालकर गरम - गरम ( पीने लायक ) पीने से सर्दी तथा खाँसी में आराम मिलता है।साबुत हल्दी के छोटे टुकड़े को सेककर सोते समय मुँह में रखकर चूसते रहने से जुकाम, कफ तथा खाँसी में लाभ होता है।

पेट के कृमि में ---२ से ४ वर्ष के बच्चे को यदि पेट में कीड़े की शिकायत हो तो आधा ग्राम हल्दी समान मात्रा में गुड़ के साथ गोली बनाकर  तीन - चार दिनों तक रात में सोने से पहले खिलाएँ।

चोट एवं सूजन ----- चोट लगने पर उस पर हल्दी का लेप किया जाता है, यदि सूजन भी हो तो हल्दी के साथ खाने का चूना मिलाकर हल्का गरम कर सूजन पर लेप करने से दो तीन बार में ही सूजन तथा चोट ठीक हो जाता है।

गला बैठना ------ एक ग्लास गर्म दूध में एक छोटा चम्मच हल्दी डालकर पीने से ( दो से तीन बार ) आवाज खुल जाता है।

मसूढ़ों की सूजन में ----- मसूढ़ों में सूजन तथा दर्द होने पर एक चम्मच सरसों के तेल में आधा चम्मच सेंधा नमक तथा चुटकी भर  पिसी हुई हल्दी लेकर उँगलियों से दाँतों की मालिस करने से 7-8 दिनों में ही लाभ मिलता है।

चोट- मोच आदि में ------ मांसपेशियों की आंतरिक मरम्मत के लिये एक ग्लास गाय का दूध में दो चुटकी शुद्ध हल्दी पिसी हुई डालकर नियमित एक सप्ताह तक पीने से चोट में आराम मिल जाता है।

हड्डियों के लिये------ दूध और हल्दी उबाल कर लेने से हड्डियों में मजबूती आती है ,क्योंकि यह कैल्सियम पूर्ति का भी स्रोत है।