Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Tuesday, 29 March 2016

अजवायन के गुण ।

अजवाइनको पीस कर त्वचा पर लगाने से त्वचा रोग दूर होता है।

२- फोड़ा फुन्सी में अजवाइन को पीस कर नींबू के साथ लगाने से भी आराम मिलता है।

३- पित्त रोग में अजवाइन गुड़ लेने से पित्त रोग ठीक हो जाता है।

४- यदि सर्दी लगी हो तो अदरक का रस शहद के साथ बराबर मात्रा में लेने से आराम मिलता है।

५-  जो ज्यादा अल्कोहल पीते हैं, तथा अब वो अल्कोहल वाला शराब छोड़ना चाहते हैं तो १/२ किलो ग्राम . अजवायन को ४ लीटर पानी में पकाकर जब दो लीटर बच जाये तो छानकर रख लें त़था प्रतिदिन भोजन के पहले १-१ कप पीयें।इससे लीवर ठीक रहेगा तथा शराब पीने की इच्छा भी कम होगी।

६-  २-३ ग्राम अजवायन को पाउडर करके छाछ के साथ लेने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते है।

७-  प्रसूता स्त्री के लिये १० ग्राम अजवायन को १ लीटर पानी में पकाकर १/४ शेष रहने पर छानकर सुबह - शाम पिलाने से प्रसूतिजन्य विकार नहीं होते।इससे बढ़ा हुआ शरीर भी अपनी स्थिति में वापस आ जाता है।

८-   १० ग्राम अजवायन को बारीक पीसकर उसमें १/२ नींबू का रस निचोड़ कर डालें, ५ ग्राम फिटकिरी पाउडर व छाछ को मिलाकर बालों में मलने से रूसी कम होता है तथा जुएँ भी मर जाती है।

Tuesday, 8 March 2016

ShreeRadhaRani Tatha Unki Asht Sakhiyan



श्रीराधारानी - चरण   बंदौं    बारंबार  ।
जिन के कृपा कटाच्छ तैं  रीझैं  नंदकुमार ।।

जिनके पद - रज - परस तें स्याम होयँ बेभान ।
बंदौं तिन पद - रज -कननि मधुर रसनि के खान।।

जिनके दरसन हेतु नित , बिकल रहत घनस्याम ।
 तिन  चरनन  मैं  बसै  मन  मेरौ आठौं  याम  ।।

जिन  पद  पंकज  पै  मधूप  मोहन  दृग  मँडरात।
तिन  की  नित झाँकी करन  मेरौ   मन ललचात ।।

' रा '  अक्षर  कौं  सुनत  हीं  मोहन  होत  बिभोर ।
बसैं   निरन्तर  नाम  सो ' राधा ' नित  मन  मोर ।।

     दो०--- बंदौं   श्रीराधाचरन  पावन  परम  उदार ।
               भय -बिषाद -अग्यान हर प्रेमभक्ति- दातार।।

श्री 'ललिता ' --- श्री ' ललिता ' लावण्य ललित सखि
      गोरोचन     आभा     युत   अंग   ।
      बिद्युदवर्णि      निकुंज - निवासिनि ,
     वसन      रुचिर  शिखिपिच्छ  सुरंग ।।
     इन्द्रजाल - निपुणा ,  नित    करती 
     परम    स्वादु     ताम्बूल    प्रदान   ।
     कुसुम - कला - कुशला , रचती कल
    कुसुम - निकेतन       कुसुम - वितान ।।

सखी ' विशाखा ----- सखी ' विशाखा विद्युत - वर्णा ,   
      रहती   बादल - वर्णा     कुँज 
    तारा - प्रभा     सुवसन  सुशोभित ,
    मन  नित  मग्न  श्याम - पद - कंज ।।
    कर्पूरादि      सुगन्ध - द्रव्य    युत
  लेपन    करती     सुन्दर     अंग ।
    बूटे - बेल     बनाती ,     रचती
   चित्र     विविध  रूचि  अँग - प्रत्यंग।।

' चित्रा ' --- अंग -  कांति    केसर  सी
      काँच  प्रभा  से  वसन  ललाम।
       कुंज - रंग  किंजल्क  कलित अति,
       शोभामय    सब    अंग   सुठाम   ।।
       विविध    विचित्र  वसन - आभूषण
       से    करती     सुन्दर     श्रृंगार   ।
       करती         सांकेतिक     अनेक
         देशों   की  भाषा  का  व्यवहार ।।

सखी ' इन्दुलेखा ' ----- सखी ' इन्दुलेखा ' शुचि करती
शुभ - वर्ण  शुभ  कुंज  निवास ।
अंग  कांति  हरताल  सदृश रँग 
दाड़िम  कुसुम  वसन  सुखरास ।।

करती  नृत्य  विचित्र  भंगिमा
संयुत  नित  नूतन  अभिराम ।
गायन  विद्या  निपुणा , व्रज की
ख्यात    गोपसुन्दरी   ललाम  ।।

 'चंपकलता '------ कांति   चम्पा सी, 
कुंज   तपे  सोने   के    रँग ।
नीलकण्ठ   पक्षी  के  रँग  के,
रुचिर   वसन  धारे  शुचि  अँग।।
चावभरे   चित   चँवर   डुलाती
अविरत   निज   कर - कमल  उदार ।
द्युत - पंडिता ,  विविध   कलाओं
से     करती   सुन्दर    श्रृंगार    ।।

सखी ' रंगदेवी '------- सखी रंगदेवी बसती अति
रुचिर    निकुंज ,  वर्ण  जो  श्याम  ।
कांति   कमल  केसर  सी  शोभित ,
जवा   कुसुम - रँग   वसन   ललाम  ।।
नित्य   लगाती   रुचि   कर - चरणों 
में     यावक     अतिशय   अभिराम ।
अास्था    अति   त्यौहार   व्रतों   में ,
कला - कुशल    शुचि    शोभाधाम  ।।

सखी ' तुंगविद्या ' ------- सखी  तुंगविद्या  अति  शोभित
कान्ति   चन्द्र ,  कुंकुम  सी  देह ।
वसन   सुशोभित  पीत  वर्ण  वर ,
अरुन  निकुंज ,  भरी   नव   नेह  ।।
गीत -वाद्य   से   सेवा   करती
अतिशय     सरस    सदा  अविराम ।
नीति - नाट्य - गन्धर्व  - शास्त्र --
निपुणा    रस    आचार्या    अभिराम ।।

सखी ' सुदेवी '----- सखी ' सुदेवी ' स्वर्ण- वर्ण - सी, 
वसन   सुशोभित  मूँगा  रंग ।
कुंज   हरिद्रा -  रंग   मनोहर
करती     सकल   वासना - भंग ।।
जल  निर्मल  पावन  सुरभित  से 
करती    जो    सेवा    अभिराम ।
ललित   लाड़ली की  जो  करती
बेणी -  रचना    परम     ललाम  ।।

अष्ट   सखी  करतीं  सदा , सेवा  परम  अनन्य ।
राधा - माधव - युगल की , कर  निज जीवन धन्य।।
इनके  चरण  सरोज  में  ,   बारम्बार     प्रणाम। 
करूणा  कर  दें  श्रीयुगल - पद - रज - रति  अभिराम ।।
                     



Wednesday, 2 March 2016

SreeRadhaJee Ki Aarti.



आरती    श्रीबृषभानु  लली    की ।
सत - चित - आनंद-  कंद - कली     की ।। टेक ।।

भयभंजिनि     भव - सागर - तारिनि ,
पाप - ताप - कलि - कल्मष - हारिनि , 
  दिब्यधाम - गोलोक -  बिहारिनि ,
जनपालिनि     जगजननि    भलीकी  ।। १ ।।

अखिल  बिस्व  आनंद - बिधायिनि , 
 मंगलमयी            सुमंगलदायिनि ,
  नंदनंदन - पद - प्रेम    प्रदायिनि ,
अमिय - राग - रस - रंग - रलीकी ।।२ ।।

नित्यानंदमयी     अाह्लादिनि ,
आनंदघन - आनंद - प्रसाधिनि ,
रसमयी ,   रसमय - मन - उन्मादिनि ,
सरस   कमलिनि  कृष्ण - अलीकी ।। ३ ।।

नित्य  निकुंजेस्वरी  रासेस्वरि ,
परम   प्रेमरूपा    परमेस्वरी , 
गोपिगणाश्रयि       गोपिजनेस्वरि ,
बिमल - बिचित्र - भाव - अवलीकी ।। ४ ।।

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