Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Sunday, 13 November 2016

ShriNandKumarashtakam ( श्रीनंदकुमाराष्टकम् )

      


सुंदर गोपालं उरवनमालं नयन विशालं दु:ख हरम् ,
वृंदावनचंद्रम् आनंदकन्दम् परमानंदम् धरणीधरम् ।
वल्लभ घनश्यामं पूर्णकामं अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं ब्रह्मपरम् ।।१ ।।

सुंदर वारिजवदनं निर्जित मदनं आनंद सदनं मुकुटधरम् ,
गुंजाकृतिहारं  विपिनविहारं  परमोदारं  चीरहरम्  ।
वलल्भ पटपीतं कृत उपवीतं कर नवनीतं विबुधवरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। २ ।।

शोभित सुखमूलं यमुनाकूलं निपट अतूलं सुखद वरम् ,
मुख मण्डित रेणुं चारित धेनुं वादित वेणुं मधुर सूरम् ।
वल्लभ मति विमलं शुभपद कमलं नखरुचि विमलं तिमिर हरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ३ ।।

शिर मुकुट सुदेशं  कुंचित केशं नटवर वेषं कामवरम् ,
मायाकृत मनुजं हलधर अनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व विचारं  ब्रह्मपरम्  ।। ४ ।।

इन्दीवरभासं प्रकट सुरासं कुसुम विकासं वंशीधरम् ,
जित मन्मथ मानं रूप निधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभ मृदु हासं कुंज निवासं विविध विलासं ब्रह्मपरम् ।। ५ ।।

अति परम प्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्म करम् ,
मोहनमति धीरं कलिबलिवारं हत परवीरं तरल तरम् ।
वल्लभ व्रज रमणं वारिज वदनं जलधर शमनं शैलधरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्  ।। ६ ।।

जलधर द्युतिकायं ललितत्रिभंगं बहु कृतिरंगं रसिकवरम् ,
गोकुल  परिवारं  मदनाकारं  कुंज  विहारं  गूढ़नरम् ।
वल्लभ व्रजचंद्रम् सुभग सुछंदम् परमानंदम भ्रांतिहरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं  ब्रह्मपरम ।। ७ ।।

वंदित युग चरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरं ,
कालिय शिर गमनं कृतफणि नमनं घातितयमनं मृदुल तरम् ।
वल्लभदु:खहरणं  निर्मलचरणं  अशरणशरणं  मुक्तिकरम् ,
भजनंदकुमारं  सर्वसुखसारं  तत्व  विचारं ब्रह्मपरम्   ।। ८ ।।

।। इति श्रीमद् वल्लभाचार्य विरचितं नंदकुमाराष्टकं सम्पूर्णम्  ।।

Thursday, 3 November 2016

ShriDamodarashtkam ( श्रीदामोदराष्टकम् )



नमामीश्वरं  सच्चिदानंदरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्  ।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततो द्रुत्य गोप्या  ।।१ ।।

( जिनके कपोलों पर लटकते मकराकृत-कुंडल क्रीड़ा कर रहे हैं, जो गोकुल के चिन्मय धाम में परम शोभायमान हैं, जो दूध की हांडी फोड़ने के कारण माँ यशोदा से भयभीत होकर ऊखल के उपर से कूदकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे हैं और जिन्हें माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेग से दौड़कर पकड़ लिया है, ऐसे सच्चिदानंद- स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।)

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोज-युग्मेन सातंकनेत्रं ।
मुहु:श्वास कम्प - त्रिरेखांक - कण्ठ
स्थित ग्रैव - दामोदरं भक्तिबद्धम् ।। २  ।।

( जननी के हाथ में लाठी को देखकर मार खाने के भय से जो रोते-रोते बारंबार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मसल रहे हैं, जिनके दोनों नेत्र भय से अत्यन्त विह्वल हैं, रूदन के कारण बारंबार साँस लेने के कारण तीन रेखाओं से युक्त शंख रूपी जिनके कंठ में पड़ी मोतियों की माला काँप रही है, और जिनका उदर ( माँ यशोदा की वात्सल्य भक्ति द्वारा ) रस्सी से बँधा हुआ है, उन सच्चिदानन्द - स्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ )

इतिदृक् स्वलीलाभिरानंद कुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् ।
तदीयेशितज्ञेषु  भक्तैर्जितत्वं
पुन:  प्रेमतस्तं  शतावृत्ति  वन्दे  ।। ३ ।।

( जो इस प्रकार की बाल्य- लीलाओं द्वारा गोकुलवासियों को आनन्द सरोवर में नित्यकाल सराबोर करते रहते हैं,और जो ऐश्वर्यपूर्ण ज्ञानी भक्तों के समक्ष यह उजागर करते हैं कि " मैं केवल ऐश्वर्यविहीन प्रेम और भक्ति द्वारा ही जीता जा सकता हूँ," उन दामोदर श्रीकृष्ण की मैं प्रेमपूर्वक बारम्बार वंदना करता हूँ।)

वरं देव ! मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेअहं वरेशादपीह  ।
इदं  ते  वपुर्नाथ  गोपाल  बालं
सदा मे मनस्याविरस्तां  किमन्यै: ।।४ ।।

( हे देव ! आप सब प्रकार से वर देने में पूर्ण सक्षम हैं, तो भी मैं आप से मोक्ष या मोक्ष की चरम सीमारूप वैकुण्ठ आदि लोक भी नहीं चाहता और न ही अन्य कोई ( नवधा भक्ति द्वारा प्राप्त किये जाने वाले ) वरदान चाहता हूँ। हे नाथ ! मैं तो केवल एक ही वर चाहता हूँ कि आपका यह बालगोपाल रूप मेरे हृदय में सदा - सदा के लिये विराजमान रहे।मुझे अन्य दूसरे वरदानों से कोई प्रयोजन नहीं है।)



इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलै: स्निग्ध- रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं  बिम्बरक्ताधरं मे 
मनस्याविरस्तामलं लक्षलाभै: ।।५ ।।

( हे देव ! कुछ - कुछ लालिमा लिये हुये कोमल तथा घुँघराले बालों से घिरा आपका मुखकमल माँ यशोदा द्वारा बारम्बार चुम्बित है और आपके होंठ बिम्ब फल के समान लाल हैं। आपका यह मधुर रूप नित्यकाल तक मेरे हृदय में प्रकट होता रहे।मुझे लाखों प्रकार के अन्य लाभों की आवश्यकता नहीं है।)

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो 
प्रसीद प्रभो दु:ख जलाब्धि- मग्नम् ।
कृपादृष्टि- वृष्टियातिदीनं बतानु
गृहाणेश   मामज्ञमेध्यक्षि दृश्य: ।।६ ।।

( हे परमदेव ! हे दामोदर ! हे अनन्त ! हे विष्णो ! हे प्रभो ! हे भगवन !  मुझपर प्रसन्न होवें । मैं दु:खों के समुद्र में डूबा जा रहा हूँ।अतएव आप अपनी कृपादृष्टि रूपी अमृतवर्षा कर मुझ दीन - हीन शरणागत पर अनुग्रह कीजिये एवं मेरे नेत्रों के समक्ष साक्षात् दर्शन दीजिये।) 

कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वयामोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च ।
तथा  प्रेमभक्तिं  स्वकां  मे  प्रयच्छ 
न  मोक्षे  गृहो मेअस्ति  दामोदरेह ।। ७ ।।

( हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने दामोदर रूप से ऊखल में बँधे रहकर भी नलकूबर और मणिग्रीव नामक कुबेर के दोनों पुत्रों को नारदमुनि के शाप से मुक्त करके अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये।यही मेरा एकमात्र आग्रह है।किसी अन्य प्रकार के मोक्ष की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।)

नमस्तेअस्तु दाम्ने स्फुरद्धीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ  विश्वस्य  धाम्ने  ।
नमो राधिकायै त्वदीय - प्रियायै
नमोअनंत  लीलाय देवाय तुभ्यम् ।। ८ ।।

( हे दामोदर ! आपके उदर को बाँधने वाली महान् रस्सी को प्रणाम है, निखिल ब्रह्मतेज के आश्रय और सम्पूर्ण विश्व के आधारस्वरूप आपके उदर को नमस्कार है।आपकी प्रियतमा श्री राधारानी के चरणों में मेरा बारम्बार प्रणाम है और हे अनन्त लीलाविलास करने वाले भगवन् ! मैं आपको भी सैकड़ों प्रणाम अर्पित करता हूँ।