Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Friday, 27 October 2017

Tulsi Devi Ko Namaskar ( तुलसी देवी को नमस्कार ।)




या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी
    रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता
     न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ।।

जो दर्शन पथ में आने पर सारे पाप-समुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श किये जाने परशरीर को पवित्रबनाती है, प्रणाम किये जाने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचे जाने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित किये जाने पर भगवान् श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान् के चरणों में चढ़ाये जाने पर मोक्षरूपी फल प्रदान करती है, उस तुलसीदेवी को नमस्कार है। (  (   (पद्मपुराण )

Saturday, 7 October 2017

Bhajman Ram charan sukhdai

भजमन राम चरण सुखदायी,भजमन राम चरण सुखदायी।

जेहि चरणन से निकसि सुरसरि,शंकर जटा समायी
जटा शंकरी नाम परयो है , त्रिभुवन  तारण  आयी ।
भजमन राम चरण सुखदायी ।

जेहि चरणन की चरण पादुका , भरत लियो लव लाई
सोई चरण केवट धोय लीने  , तब हरि नाव चढ़ाई ।
भजमन राम चरण सुखदायी।

जेहि चरणन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदायी
सोई चरण गौतम ऋषि नारी, परसि परम पद पाई।
भजमन राम चरण सुखदायी।

दंडक वन प्रभु पावन कीन्हें, ऋषियन त्रास मिटाई
सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी, कनक मृगा संग धाई।
भजमन राम चरण सुखदायी।

शिवसनकादिक अरु ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई
तुलसीदास मरूत सुत की प्रभु , निज मुख करत बड़ाई।
भजमन राम चरण सुखदायी,भजमन राम चरण सुखदायी।


Wednesday, 24 May 2017

दुर्गा सप्तशती के सिद्ध मन्त्र ( संस्कृत में ।)

           



१-  या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
     नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।( शक्ति दायी मंत्र )

२-  शरणागत दीनार्थ परित्राण परायणे।
   सर्वस्यार्ति हरे देवी नारायणी नमोस्तुते।। ( आपत्ति उद्धारक मंत्र )

   ३-  सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते ।
    भयेभ्यःस्त्राहि नो देवि दुर्र्गे देवि नमोस्तुते ।। ( भय विनाशक मंत्र )

 ४-  करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी ।

शुभानि भद्राण्यभिहृन्तु चापद: ।। ( विपत्तिनाशक तथा शुभदायक मंत्र )

५- ओम् जयन्ती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते ।। ( महामारी नाशक  मंत्र )

 ६-    देहि सौभाग्यमारोग्यम् देहि में परमं सुखम् ।

      रूपम् देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जाहि ।।(  सौभाग्य तथा आरोग्य कारक मंत्र। ) 

७- पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृतानुसारिणीम् ।

तारिणीम दुर्ग संसार-सागरस्य कुलोद्भवाम् ।। ( सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति के लिये )

 ८- ओम् कात्यायनि महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। 

नन्दगोप सुते  देवि  पतिं में  कुरू ते  नम: ।। ( इच्छित पति प्राप्ति के लिये )

 ९ - सृष्टि - स्थिति विनाशानो शक्ति भूते सनातनी ।

 गुणाश्रये-गुणमये  नारायणि  नमोस्तुते    ।। ( शक्ति प्राप्ति के लिये )

१०- देवकीसुत गोविन्द: वासुदेव जगत्पते ।

देहि में तनयं कृष्ण: त्वामहं शरणं गत: ।। ( पुत्र प्राप्ति के लिये )







Thursday, 13 April 2017

Ma Durga Ke Pratham Swaroop 'Shailputri Mata ' Ki Puja

नवरात्र के प्रथम दिन घट स्थापन के बाद माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप 'माता शैलपुत्री' की पूजा करने का विधान है।शैल का अर्थ है हिमालय और हिमालय के यहाँ जन्म लेने के कारन इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है।पार्वती के रूप में इन्हें भगवान शंकर की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है।इनका वाहन वृषभ ( बैल ) होने के कारण इन्हें वृषभारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है।इनके दाएँ हाथ में त्रिशूल है और बाएँ हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है।
          शास्त्रों में इनसे जुड़ी एक कहानी का उल्लेख है कि प्राचीन काल में जब सतीजी के पिता प्रजापति दक्ष यज्ञ कर रहे थे तो इन्होंने सभी देवताओं को इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया लेकिन अपने जमाता, भगवान भोले शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रण नहीं भेजा।सतीजी को अपने पिता के यज्ञ में जाने की तीब्र इच्छा थी।उनकी व्यग्रता देखकर महादेव ने कहा, सम्भवत: प्रजापति दक्ष हमसे रूष्ट हैं, इसलिये उन्होंने हमें आमंत्रित नहीं किया होगा।शंकरजी के इस वचन से सतीजी सन्तुष्ट नहीं हुई,और जाने की जिद करने लगीं।उनकी वेचैनी देखकर महादेव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दिया।
                  सतीजी जब अपने पिता के घर पहुँची तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया तथा पुत्री को देखकर प्रसन्न हुई।घर के अन्य सदस्य ने ना तो ठीक से उनसे बातचीत किया और ना ही उनका हाल समाचार पूछा,बल्कि महादेव के उपर व्यंगात्मक छीटाकशी भी की।पिता दक्ष ने भी महादेव के  प्रति व्यंगात्मक कुछ बाते कहीं जो सतीजी को उचित नहीं लगा । अपने पति का तिरस्कार होता देख उन्होंने योगाग्नि से अपने आप को भस्म कर लिया।जब भगवान शंकर को सती के भस्म होने के विषय में पता चला तो वे अत्यधिक क्रोधित हो गये और उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करवा दिया।यही सतीजी अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाई।शैलपुत्री का विवाह भगवान शंकर से हुआऔर वो भगवान शंकर की पत्नी बन गईं।ऐसा कहा जाता है कि माँ दुर्गा के इस शैलपुत्री स्वरूप का पूजन करने से उपासक की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है और कन्याओं को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।इनकी पूजा में लाल फूल,सिन्दूर नारियल और घी के दीपक का प्योग होता है।माँ शैलपुत्री का पूजन और स्तवन निम्न मंत्र से किया जाता है।

                         ' वन्दे वांछितलाभाय , चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
                           वृषारूढ़ां शूलधरां,   शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ।।'
   अर्थात् मैं मनोवांछित लाभ के लिये अपने मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाली , वृष पर सवार रहने वाली , शूलधारिणी और यशस्विनी माँ शैलपुत्री की वंदना करता हूँ।

Tuesday, 11 April 2017

Mai Ram Nam Gun Gaun मैं राम नाम गुण गाऊँ

मैं   राम  नाम  गुण  गाऊँ ,भगवन राम नाम गुण गाऊँ ।
तेरा  सहारा   लेकर  भगवन  भवसागर  तर   जाऊँ  ।।

विपदा  के  मारों  का  तू  है , जनम - जनम  का  साथी ,
तेरे  ही  नाम  से  रौशन  दुनिया  की  अँधियारी  वाती  ।
मन  मन्दिर  में  निशदिन  भगवन  प्रेम  की  जोत  जलाऊँ ।
मैं  राम  नाम  गुण  गाऊँ------------ ।

कहते  हैं  कण - कण में  प्रभुजी  तेरा  रूप  समाया  ,
फिर भी मैं भगवन देख  न  पाऊँ , क्या  ये  तेरी  माया ।
मुझको  दान  करो  वह अँखियाँ , जिनसे  मैं  दर्शन पाऊँ 
मैं  राम  नाम  गुण  गाऊँ ------------।

Sunday, 2 April 2017

माँ दुर्गा का सातवां रूप ' माँ कालरात्रि'

नवरात्र के सातवें दिन दुर्गाजी के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा होती है।इनका वर्ण अंधकार रात्रि की तरह काला है ।बाल बिखरे हुये हैं और गले में माला बिजली की तरह देदीप्यमान है।इन्हें तमाम आसुरि शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है।इनके तीन नेत्र और चार हाथ हैं ।इनके एक हाथ में खड़ग है तो दूसरे हाथ में लौह अस्त्र है, तीसरे हाथ मेंअभयमुद्रा है और चौथे हाथ में वरमुद्रा है।इनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा है।कालरात्रि नाम के अनुरूप ,एैसी मान्यता है कि माँ अपने भक्तों की रक्षा काल से भी करती हैं अर्थात उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती।इन्हें सभी सिद्धियों की देवी भी कहा जाता है।इसलिये तंत्र-मंत्र की उपासना करने वाले इसदिन इनकी विशेष रूप से पूजा करते हैं।इनके नाम के उच्चारण मात्र से ही सभी भूत,प्रेत,राक्षस,दानव और सभी पैशाचिक शक्तियाँ भाग जाती हैं।इनकी पूजा में गुड़ के भोग का विशेष महत्व है।माँ कालरात्रि की पूजा,अर्चना निम्न मंत्र से किया जाता है------ 

               एकवेणी जपाकर्ण, पूरा नग्ना खरास्थिता ।
                लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी, तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
               वामपादोल्लसल्लोह, लताकंटकभूषणा ।
                वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा , कालरात्रिभयंकरी ।।

 अर्थात एक वेणी ( बालों की चोटी ) वाली, जपाकुसुम ( अड़हुल ) के फूल की तरह लाल कर्ण वाली, उपासक की कामनाओं को पूर्ण करने वाली,गर्दभ पर सवारी करने वाली,लंबे होठों वाली, कर्णिका के फूलों की भांति कानों से युक्त,तैलीय त्वचा वाली, अपने बांये पैर में चमकने वाली लौह लता धारण करने वाली,कांटों की तरह आभूषण पहनने वाली, बड़े ध्वज वाली और भयंकर लगने वाली कालरात्रि माँ हमारी रक्षा करें।

Saturday, 1 April 2017

Ma Durga ka Chhatha Roop 'Ma Katyayani'माँ दुर्गा का छठा रूप ' माँ कात्यायनी'

नवरात्र के छठे दिन दुर्गाजी के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी की पूजा और अर्चना की जाती है।ऐसा विश्वास है कि इनकी उपासना करने से अर्थ , धर्म , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।माँ ने कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन के यहाँ पुत्री रूप में जन्म लिया,इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा।इनका रंग स्वर्ण की भांति अत्यन्त चमकीला है और इनकी चार भुजायें हैं।
               इनकी दाईं ओर के ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में।बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में खड़ग अर्थात तलवार है और नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है।इनका वाहन भी सिंह है।
     शास्त्रों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि महर्षि कात्यायन ने सर्वगुण संपन्न पुत्री पाने के उद्देश्य से भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की और इन्हें पुत्री के रूप में कात्यायनी की प्राप्ति हुई।क्योंकि ये ब्रजभूमि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं, संभवत: इसलिए ब्रज प्रदेश की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिये यमुना तट पर इन्हीं माँ कात्यायनी की पूजा की थी।
     इनके पूजन में शहद का विशेष महत्व बताया गया है।इसलिय इन्हें मधु का भोग लगाया जाता है।इनके उपासक को किसी प्रकार का कोई भय नहीं रहता है और वह सब तरह के पापों से मुक्त हो जाता है।इन्हें शोध की देवी कहा जाता है।उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों को इनकी पूजा अवश्य करनी चाहिये।इनकी पूजा अर्चना तथा स्तवन निम्न मन्त्र से किया जाता है।

                   चन्द्रहासोज्जवलकरा , शार्दूलवरवाहना ।
                    कात्यायनी शुभं दद्यात् , देवी दानवघातनी।।
अर्थात् चन्द्रहास की भाँति देदीप्यमान , शार्दूल अर्थात शेर पर सवार और दानवों का विनाश करने वाली माँ कात्यायनी हम सबके लिये शुभदायी हों।
              

Friday, 31 March 2017

'SkandMata'Ma Durga Ka Pancham Roop



नवरात्र के पाँचवे दिन दुर्गाजी के पाँचवे स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है।स्कंद शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय (षडानन,अर्थात छह मुख वाले) का एक नाम है।स्कंद की माँ होने के कारण ही इनका नाम स्कंदमाता पड़ा।

               माना जाता है कि माँ दुर्गा का यह रूप अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करता है और उन्हें मोक्ष का मार्ग दिखाता है।माँ के इस रूप की चार भुजायें हैं।इन्होंने अपनी दाएँ तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद अर्थात् कार्तिकेयजी को पकड़ा हुआ है।इसी तरफ वाली निचली भुजा में कमल का पुष्प है।बाई ओर की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा है और नीचे दूसरे हाथ में श्वेत कमल का फूल है।सिंह इनका वाहन है।यह सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं।इसलिये इनके चारो ओर सूर्य सदृश अलौकिक तेजोमय मंडल सा दिखाई देता है।इन्हें कमल के आसन पर स्थित होने के कारण पद्मासना भी कहा जाता है।इनकी पूजा करने से भगवान कार्तिकेय, जो इनके पुत्र रूप मे इनकी गोद में विराजमान हैं, की भी पूजा स्वभाविक रूप से हो जाती है।मन की एकाग्रता के लिये भी देवी की कृपा विशेष रूप से फलदायी है।इनकी अराधना निम्न मंत्र से करनी चाहिये।

               सिंहासनगता  नित्यं,
                पद्माश्रितकरद्वया। 
               शुभदास्तु सदा देवी ,
                स्कंदमाता  यशस्विनी ।।

         अर्थात सिंह पर सवार रहने वाली और अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करने वाली यशस्विनी स्कंदमाता हमारे लिये शुभदायी हों।

Sunday, 26 March 2017

Vaishno Mata Ki Aarti


                            
                                   
            
 
भोर भई दिन चढ़ गया मेरी अम्बे , हो रही जय-जयकार 
मंदिर बिच आरती जय माँ, हे दरबारावाली आरती जय माँ ।

काहे की मैया तेरी आरती बनावाँ ,काहे दीपावाँ बीच बाती 
मंदिर बिच आरती जय माँ , सुहे चोलियाँवाली आरती जय माँ।

सर्व सोने दी तेरी आरती बनावाँ , अगर कपूर पावाँ बाती 
मंदिर बिच आरती जय माँ,जय माँ पिण्डीवाली आरती जय माँ।

कौन सुहागन दीवा वालिया मेरी मैया , कौन जागेगा सारी रात 
मंदिर बिच आरती जय माँ , सच्चियाँ जोतावाली आरती जय माँ।

सर्वसुहागन दीवा वालिया मेरी मैया, ज्योत जागेगी सारी रात
मंदिर बिच आरती जय माँ, जय माँ पहाड़ावाली आरती जय माँ ।

जुग-जुग जीवे तेरा जम्मुए द राजा , जिस तेरा भवन बनाया 
मंदिर बिच आरती जय माँ, जय माँ भवनावाली आरती जय माँ।

सिमर चरण तेरा ध्यानु यश गावे, चरणा ते जावाँ बलिहार 
मंदिर बिच आरती जय माँ ,जय माँ जोतावाली आरती जय माँ।


Friday, 24 March 2017

Aisa Pyar Baha De Maiya

 
 या देवी सर्वभूतेषू दया रूपेण संस्थिता ,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।
     दुर्गा दुर्गति दूर कर , मंगल कर सब काज ।
    मन मंदिर उज्जवल करो , कृपा कर के आज ।।

ऐसा प्यार बहा दे मैया , चरणों से लग जाऊँ मैं ।
सब अंधकार मिटा दे मैया , दर्श तेरा कर पाऊँ मैं ।ऐसा प्यार.....

जग में आकर जग को मैया , अब तक न पहचान सका ।
क्यों आया हूँ कहाँ है जाना , ये भी न मैं जान सका ।
तू है अगम अगोचर मैया , कहो कैसे लख पाऊँ मैं । ऐसा प्यार.....

कर कृपा जगदम्ब भवानी , मैं बालक नादान हूँ 
नहीं अराधन जप तप जानूँ , मैं अवगुण की खान हूँ ।
दे ऐसा बरदान हे मैया , सुमिरन तेरा गाऊँ मैं। ऐसा प्यार.....

मैं बालक तू मैया मेरी , निशदिन तेरी ओट है ।
तेरी कृपा ही में मेरी , भीतर जो भी खोट है ।
शरण लगा लो मुझको मैया , तुझपे बलि-बलि जाऊँ मैं ।ऐसा प्यार ...




Sunday, 19 March 2017

Ambike Jagdambike Ab Tera Hi Aadhar Hai




अंबिके जगदम्बिके अब तेरा ही आधार है ,
    जिसने ध्याया तुझको मैया , उसका बेड़ा पार है।
       नंगे पग तेरे दर पे मईया अकबर आया,
        सोने  का  छत्र  माँ  उसने  चढ़ाया ।
      पूजा किया माँ उसने तेरी ,तू शक्ति का अवतार है,
    जिसने ध्याया तुझको मैया , उसका बेड़ा पार है ।अंबिके..........

पान  सुपारी  ध्वजा  नारियल लेकर भेंट चढ़ाऊँ ,
हाथ जोड़कर विनती करूँ माँ , तुझको ही मनाऊँ ।
 दर पे आये भक्तों ने बोली जय-जयकार है , 
जिसने ध्याया तुझको मैया उसका बेड़ा पार है।अंबिके.............

                 दर पे खड़े सवाली भर दे ,मेरी झोली खाली ,
                  तेरा वचन न जाये खाली , जय हो मैया शेरां वाली ,
                   कर दे कृपा मेहरां वाली , माता तू बड़ी दयाल है, 
                    जिसने ध्याया तुझको मैया , उसका बेड़ा पार है ।अंबिके..........

 धर्म भवन जागरण में मैया , तुमको आना है,
 सब  भक्तों  ने  मईया  तेरा  दर्शन पाना  है ।
  जल्दी से अब आजा मईया , तेरा इन्तजार है , 
 जिसने ध्याया तुझको मैया , उसका बेड़ा पार है ।अंबिके..................

Tuesday, 7 March 2017

संत कृपा से भव पार।




    




समर्थ गुरु रामदास बाबा एक सच्चे संत तथा हनुमानजी के भक्त भी थे।इनके बारे में कहा जाता है कि बाबाजी को हनुमानजी के दर्शन हुआ करते थे।एक बार बाबाजी ने हनुमानजी से कहा महाराज! आप एकदिन सब लोगों को दर्शन दें ।हनुमानजी ने कहा कि ' तुम लोगों को इकट्ठा करो तथा शुद्ध हरिकथा करना , मैं वहीं सभी लोगों को मैं दर्शन दे दूँगा।' बाबाजी बोले ऐसा ही होगा।

          संत तथा राजगुरू होने के कारण बाबाजी का ऐसा प्रभाव था कि जहाँ भी जाते , वहीं हजारों की संख्या मे लोग इकट्ठे हो जाते।बाबाजी ने कहा आज रात शहर के बाहर अमुक मैदान में हरिकथा होगी।यह समाचार सुनते ही हरिकथा की तैयारी जोर-शोर से शुरू हो गई।दरियाँ तथा प्रकाश की व्यवस्था की गई।सब गाने -बजाने बाले आकर बैठ गये।लोगों की भीड़ जमा हो गई।समय पर बाबाजी कीर्तन प्रारम्भ कर दिये।बीच-बीच में भगवान की कथा भी बाबाजी कर देते फिर कीर्तन करने लगते । ऐसा करते करते , कीर्तन में बाबाजी इस कदर मस्त हो गये कि हरिकथा करना ही भूल गये।लोगों को आशा थी कि बाबाजी अब कथा सुनायेंगे , पर वे तो कीर्तन करते चले गये।लोगों के भीतर असली भाव तो था नहीं , अत: उन्होंने सोंचा कि कीर्तन तो हम घर पर स्वयं कर लेंगे ,यहाँ कबतक बैठे रहें! ऐसा सोंचकर वे धीरे-धीरे उठकर जाने लगे।थोड़ी देर मे सभी लोग उठकर चले गये।धीरे-धीरे गाने बजाने वाले भी चले गये।बाबाजी अपनी आँखे बन्द कर कीर्तन करने मे मस्त थे।प्रकाश की ब्यवस्था करने वाले भी चले गये।अब दरीवालों को परेशानी थी, कि बाबाजी दरी पर ही मस्ती से नाच रहे हैं,उन्हें हटाकर दरी कैसे समेटे? फिर उन्होंने दिमाग लगाया,जब बाबाजी नाचते-नाचते दूसरी तरफ जाते तो दरीवाले इधर की तरफ का दरी समेट लेते और जब बाबाजी नाचते-नाचते इधर आते तो दरी उधर की समेट लेते।इस तरह दरीवाले भी दरियाँ लेकर चले गये।जब सभी चले गये,तब हनुमानजी प्रकट हो गये।

बाबाजी ने हनुमानजी से कहा कि महाराज ! आप सबको दर्शन दें।हनुमानजी ने कहा ,यहाँ है ही कौन ? यहाँ तो मुझे सिर्फ आपही दिख रहे हैं।बाबाजी उदास हो गये ।इस प्रकार भावपूर्ण भगवन्नाम का संकीर्तन करना ही शुद्ध हरिकथा है।और शुद्ध हरिकथा से भगवान् साक्षात प्रकट हो जाते हैं।यदि मन में भगवान् के प्रति सच्ची भावना होती तो बाबाजी की कृपा से सभी को हनुमानजी का साक्षात् दर्शन हो जाता ।

                          जय श्रीराम , जय हनुमान ।

Thursday, 23 February 2017

शिवताण्डव- स्तोत्रम्


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
   गलेवलम्ब्य  लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्  ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
        चकार चण्डताण्डवं तनोतु  न:  शिव:  शिवम्  ।।१ ।।

( जिन्होंने जटारूप अटवी ( वन ) से निकलती हुई गंगाजी के गिरते हुये प्रवाहों से पवित्र किये गये गले में शर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारणकर , डमरू के डम- डम शब्दों से मण्डित प्रचण्ड ताण्डव किया , वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें। ) 

जटाकटाहससम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- 
  विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
       किशोरचन्द्रशेखरे  रति: प्रतिक्षणं मम् ।।२ ।।

( जिनका मस्तक जटारूपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंग , लताओं से सुशोभित हो रहा है , ललाटाग्नि धक् -धक् जल रही है , सिर पर बाल चन्द्रमा बिराजमान हैं , उन ( भगवान् शिव ) में मेरा निरन्तर अनुराग हो।)

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
         स्फुरद्धिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षघोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
             कचिद्यिगम्बरे मनो विनोद मेतु वस्तुनि ।।३ ।।

( गिरिराजकिशोरी पार्वती के विलासकालोपयोगी शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनन्दित हो रहा है , जिनकी निरन्तर कृपादृष्टि से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है ऐसे किसी दिगम्बर तत्व में मेरा मन विनोद करे।) 

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
         कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
              मनो विनोदमद्भुतं विभर्तु भूतभर्तरि ।। ४ ।।

( जिनके जटाजूटवर्ती भुजंगमों के फणों की मणियों का फैलता हुआ पिंगल प्रभापुन्ज दिशारूपिणी अंगनाओं के मुख पर कुंकुम राग का अनुलेप कर रहा है , मतवाले हाथी के हिलते हुये चमड़े का उत्तरीय वस्त्र ( चादर ) धारण करने से स्निग्धवर्ण हुये उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
               प्रसूनधूलिघोरणीविधूसराड़्घ्रिपीठभू: ।
भुजंगराजमालया  निबद्धजाट  जूटक:
              श्रियैचिराय  जायतां  चकोरबन्धुशेखर: ।।५ ।।

जिनकी चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देवताओं के ( प्रणाम करते समय ) मस्तकवर्ती कुसुमों की धूलि से धुसरित हो रही है , नागराज ( शेष नाग ) के हार से बँधी हुई जटावाले भगवान चन्द्रशेखर मेरे लेये चिरस्थायिनी सम्पत्ति के साधक हों ।

ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा-
       निपीतपंचसायकं  नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया  विराजमानशेखरम्
          महाकपालि सम्पदे  शिरो  जटालमस्तु न: ।।६ ।।

जिसने ललाट- वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के स्फुलिंगों के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था , वह ( श्रीमहादेवजी का ) उन्नत विशाल ललाटवाला जटिल मस्तक हमारी सम्पत्ति का साधक हो।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जवल- 
           द्धनंजयाहुतीकृतप्रचण्डपंचसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- 
              प्रकल्पनैकशिल्पिनि  त्रिलोचने  रतिर्मंम ।। ७ ।।

जिन्होंने अपने विकराल भालपट्ट पर धक् - धक् जलती हुई अग्नि में प्रचण्ड कामदेव को हवन कर दिया था , गिरिराजकिशोरी के स्तनों पर पत्रभंग - रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान् त्रिलोचन में मेरी धारणा लगी रहे ।

नवीनमेघमण्डलीनिरूद्धदुर्धंरस्फुर-
        त्कुहूनिशीथिनीतम:प्रबन्धबद्धकन्धर: ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु    कृत्तिसिन्धुर:
           कलानिधानबन्धुर:श्रियंजगद्धुरन्धर: ।। ८ ।।

जिनके कण्ठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुये दुरूह अन्धकार के समान श्यामता अंकित है, जो गजचर्म लपेटे हुये हैं , वे संसारभार को धारण करने वाले चन्द्रमा से मनोहर कान्तिवाले भगवान् गंगाधर मेरी सम्पत्ति का विस्तार करें ।

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा-
         वलम्बिकण्ठकन्दलीरूचिप्रबद्धकन्धरम्  ।
 स्मरच्छिदं  पुरच्छिदं  भवच्छिदं  मखच्छिदं  
           गजच्छिदान्धकच्छिदं   तमन्तकच्छिदं  भजे ।। ९ ।।

जिनका कण्ठदेश खिले हुये नीलकमल समूह की श्यामप्रभा का अनुकरण करने वाली हरिणी की सी छवि वाले चिन्ह से सुशोभित है तथा जो कामदेव , त्रिपुर , भव ( संसार ) , दक्ष-यज्ञ , हाथी , अन्धकासुर और यमराज का भी उच्छेदन करने वाले हैं , उन्हें मैं भजता हूँ।

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमंजरी-
                   रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
 स्मरान्तकं  पुरान्तकं  भवान्तकं  मखान्तकं
                   गजान्तकान्धकान्तकं  तमन्तकान्तकं  भजे ।।१० ।।

जो अभिमानरहित पार्वती के कलारूप कदम्बमंजरी के मकरन्द स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी को पान करने वाले मधूप हैं तथा कामदेव , त्रिपुर , भव , दक्ष-यज्ञ , हाथी , अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करने वाले हैं , उन्हें मैं भजता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
               द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्विमिद्विमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
               ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डव:  शिव: ।। ११ ।।

जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुये भुजंग के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमश: धधकती हुई फैल रही है , धिम-धिम बजते हुये मृदंग के गम्भीर मंगल घोष के क्रमानुसार जिनका प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उन भगवान् शंकर की जय हो ।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजो-
                     र्गंरिष्ठरत्नलोष्ठयो:  सुहृद्विपक्षपक्षयो:  ।
तृणारविन्दुचक्षुषो:  प्रजामहीमहेन्द्रयो: 
                          समप्रवृत्तिक:  कदासदाशिवं  भजाम्यहम् ।।१२ ।।

पत्थर और सुन्दर बिछौनों में , सांप और मुक्ता की माला में , बहुमूल्य रत्न तथा मिट्टी के ढेले में , मित्र या शत्रु पक्ष में , तृण अथवा कमललोचना तरूणी में , प्रजा और पृथ्वी के महाराज में समानभाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ।

कदानिलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे  बसन्
                 विमुक्तदुर्मति:  सदा  शिर:स्थमंजलिं  वहन् ।
विलोललोललोचनो   ललामभाललग्नक:
                   शिवेति  मन्त्रमुच्चरन्  कदा  सुखी  भवाम्यहम्  ।।१३ ।।

सुन्दर ललाटवाले भगवान् चन्द्रशेखर में दत्तचित्त हो अपने कुविचारों को त्यागकर गंगाजी के तटवर्ती निकुंज के भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबाई हुई हिह्वल आँखों से  'शिव ' मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा ।

इमं  हि  नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं  स्तवं 
                पठन्स्मरन्ब्रु  वन्नरो  बिशुद्धिमेति  सन्ततम् ।
हरे  गुरौसुभक्तिमाशु  यातिनान्यथा  गतिं
                  विमोहनं  हि  देहनां  सुशंकरस्य  चिन्तनम् ।।१४ ।।

जो मनुष्य इस प्रकार से उक्त उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ , स्मरण और वर्णन करता रहता है , वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही सुरगुरू श्रीशंकरजी की अच्छी भक्ति प्राप्त कर लेता है।वह विरूद्धगति को नहीं प्राप्त होता , क्योंकि श्रीशिवजी का अच्छी प्रकार चिंतन प्राणिवर्ग के मोह का नाश करने वाला है ।

पूजावसानसमये     दशवक्त्रगीतं
                        य:  शम्भुपूजनपरं  पठति  प्रदोषे  ।
तस्य  स्थिरां  रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
                  लक्ष्मी  सदैव  सुमुखी  प्रददाति  शम्भु: ।।१५ ।।

सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर रावण के गाये हुये इस शम्भुपूजन सम्बन्धी स्तोत्र का जो पाठ करता है , शंकरजी उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़े से युक्त सदा स्थिर रहनेवाली अनुकूल सम्पत्ति देते हैं।

              ( इति श्री रावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् )





Wednesday, 15 February 2017

वेदसारशिवस्तोत्रम्


    

पशुनां  पतिं  पापनाशं  परेशं
          गजेन्द्रस्य  कृत्तिं  वसानं  वरेण्यम्  ।
जटाजूटमध्ये     स्फुरदगांगवारिं 
                    महादेवमेकं  स्मरामि  स्मरामि ।।

  पशुओं ( समस्त प्राणिमात्र )   के पति ( रक्षक ) , त्रिविध-ताप -पाप को नष्ट करनेवाले, परमेश्वर स्वरूप एवं कजचर्म धारक , सर्वश्रेष्ठ तथा अपने जटा-जूट में गंगा को लहराने वाले, कामदेव के विनाशक , ऐसे एकमात्र शिव का मैं स्मरण करता हूँ ।।१ ।।

महेशं   सुरेशं   सुरारातिनाशं
          विभुं    विश्वनाथं   विभूत्यंगभूषम्  ।
विरूपाक्ष - मिन्द्वर्क - वह्निं  त्रिनेत्रं 
               सदानंदमीडे   प्रभुं   पंचवक्त्रम् ।।२ ।।

महेश, देवताओं के स्वामी ( सुरेश ) तथा समस्त देवताओं के कष्ट विनाशक, व्यापक , समस्त चराचर के स्वामी भगवान विश्वनाथ अपने समस्त अंगों में विभूति धारण किये हुये , विरूपाक्ष , चन्द्र - सूर्य - वह्निरूप, त्रिनेत्रधारी , सदानंद मग्न , पंचमुख वाले प्रभु शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

गिरीशं   गणेशं   गले   नीलवर्णं
          गवेन्द्राधिरूढं     गुणातीतरूपम  ।
भवं    भास्वरं  भस्मना   भूषिताड़्गं
            भवानीकलत्रं   भजे   पंचवक्त्रम्  ।।३ ।।

आप कैलाश पर्वत के स्वामी , प्रमथादि गुणों के ईश ,  नीलकंठ स्वरूप , वृषभ ( नन्दी ) पर आरूढ़ , अगणित स्वरूप धारण करने वाले , संसार के आदिकारण भूत , अत्यन्त तेजस्वी , भस्मधारण से विभूषित विग्रह वाले , पार्वती जिनकी अर्धांगिनी हैं , ऐसे पाँच मुखवाले महादेवजी को मैं भजता हूँ।

 शिवाकान्त   शम्भो   शशांकार्धमौले
                  महेशान  शूलिन्  जटाजूटधारिन्  ।
त्वमेको  जगद् - व्यापको  विश्वरूप
                   प्रसीद  प्रसीद   प्रभो   पूर्णरूप ।।४ ।।

हे पार्वतीनाथ ! शम्भो ! हे चन्द्रशेखर ! हे त्रिशूलधारक ! जटाजूटधारिन ! हे विश्वरूप ! समस्त चराचर संसार में आप एकमात्र व्यापक हैं , ऐसे हैं पूर्णरूप प्रभु शिवशंकर , आप मुझपर प्रसन्न होइए ।

  परात्मानमेकं   जगद् - बीजमाद्यं
                  निरीहं     निराकारमोंकारवेद्यम् ।
   यतो     जायते    पाल्यते     येन    विश्वम् 
               तमीशं  भजे  लीयते  यत्र   विश्वम्  ।।५ ।।

आप परमात्मा स्वरूप , अद्वितीय , जगत्  केआदि कारण , इच्छा - रहित , निराकार तथा प्रणव ( ओंकार ) द्वारा ही वेद्य हैं , आप ही जगत् के उत्पादक , पालक एवं लय करने वाले हैं , ऐसे महादेवजी को मैं भजता हूँ ।

  न  भूमिर्न  चापो  न  वह्निर्न  वायु -
                र्न    चाकाशमास्ते  न  तन्द्रा  न  निन्द्रा  ।
  न  ग्रीष्मो  न  शीतं  न  देशो  न  वेषो
                 न   यस्याअस्ति   मूर्तिस्त्रिमूर्तिं  तमीडे ।।६ ।।

जो न पृथ्वी , जल , अग्नि  वायु  है  तथा जो न  आकाश एवं तन्द्रा और निद्रा है , उसी प्रकार जो न ग्रीष्म न शीत है और जिनका न कोई देश है , ऐसे मूर्ति रहित त्रिमूर्ति ( सत्व , रज, तम ) रूप शिव का मैं  स्तुति  करता हूँ ।

अजं  शाश्वतं  कारणं  कारणानां
शिवं  केवलं  भासकं  भासकानाम्  ।
तुरीयं            तम:पारमाद्यन्तहीनं 
प्रपद्ये    परं    पावनं    द्वैतहीनम्  ।।७ ।।

आप अजन्मा , नित्य तथा कारण के भी कारण रूप हैं आप ही कल्याण स्वरूप , अद्वितीय हैं , आप ही प्रकाश को भी प्रकाश करने वाले हैं , आप अवस्था त्रय से रहित तुरीयावस्था में ही सर्वदा स्थित हैं एवं आप अज्ञान से भी परे , अनादि एवं अनन्त हैं , ऐसे परम पावन , द्वैत रहित , (अद्वैत रूप ) आपकी शरण में रहकर मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

नमस्ते  नमस्ते  विभो  विश्वमूर्ते !
          नमस्ते  नमस्ते  चिदानन्दमूर्ते ! ।
नमस्ते  नमस्ते  तपोयोगगम्य
           नमस्ते  नमस्ते  श्रुतिज्ञानगम्य ।।८ ।।

हे विश्वमूर्ति ! हे विभु ! आपको नमस्कार है । हे चिदानन्द मूर्तिरूप शिव ! आपको मेरा नमस्कार है , हे तप एवं योगगम्य प्रभो ! आपको नमस्कार है तथा हे वेदविद् भगवान् ! आपको मेरा नमस्कार है ।

प्रभो  शूलपाणे  विभो  विश्वनाथ !
        महादेव  शम्भो  महेश  त्रिनेत्र ।
 शिवाकान्त   शान्त   स्मरारे   पुरारे !
                 त्वदन्यो  वरेण्यो  न  मान्यो  न  गण्य: ।।९ ।।

हे प्रभो !  शूलपाणि !  विभु !  विश्वनाथ !  महादेव ! शम्भु ! हे महेश ! हे त्र्यम्बक ! हे शिवा ( पार्वती ) वल्लभ ! हे शान्तरूप ! हे कामादि तथा त्रिपुरारी ! आपके अतिरिक्त न तो कोई भी देवगणों में श्रेष्ठ है न मान्य है एवं गणनीय भी कोई नहीं है ।

शम्भो महेश करूणामय शूलपाणे !
         गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ! ।
काशीपते करूणया जगदेतकेक-
           स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोअसि ।। १० ।।

हे शम्भो ! हे महेश ! हे करूणा - वरूणालय ! हे शूलपाणि , हे गौरीपति , पशुपति , हे संसार के पाश विध्वंसक ! हे काशीपति ! आप ही एकमात्र इस जगत् के उत्पत्ति , स्थिति एवं लयकारक हो तथा आप ही एकमात्र इस जगत् के स्वामी हो।

त्वत्तो  जगद्  भवति देव  भव  स्मरारे !
          त्वय्येव  तिष्ठति  जगन्मृड  विश्वनाथ ! ।
त्वय्येव  गच्छति  लयं  भजदेतदीश !
            लिंगात्मकं  हर  चराचरविश्वरूपिन् ! ।।११ ।।

हे देव ! हे शंकर ! हे कन्दर्प- दर्पविदारक ! हे ईश ! हे विश्वनाथ ! हे हर ! यह लिंग स्वरूप सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न होता है तथा आप में ही स्थित है और आप में ही लीन होता है ।

          ( इस प्रकार श्रीशंकराचार्य रचित वेदसारशिवस्तोत्र समाप्त ।)

Sunday, 12 February 2017

यशोदाजी के मायके से जब पंडित आये?

श्रीयशोदाजी के मायके से एक ब्राह्मण गोकुल आये।नंदरायजी के घर बालक का जन्म हुआ है,यह सुनकर आशीर्वाद देने आये थे।मायके से आये ब्राह्मण को देखकर यशोदाजी को बड़ा अानंद हुआ।पंडितजी के चरण धोकर , आदर सहित उनको घर में बिठायाऔर उनके भोजन के लिये योग्य स्थान गोबर से लिपवा दिया।पंडितजी से बोली ,देव आपकी जो इच्छा हो भोजन बना लें।यह सुनकर विप्र का मन अत्यन्त हर्षित हुआ।विप्र ने कहा बहुत अवस्था बीत जाने पर विधाता अनुकूल हुए, यशोदाजी! तुम धन्य हो जो ऐसा सुन्दर बालक का जन्म तुम्हारे घर हुआ।

    यशोदाजी गाय दुहवाकर दूध ले आईं ,ब्राह्मण ने बड़ी प्रसन्नता से घी मिश्री मिलाकर खीर बनायी।खीर परोसकर वो भगवान हरी को भोग लगाने के लिये ध्यान करने लगे।जैसे ही आँखे खोली तो विप्र देव ने देखा कन्हाई खीर का भोग लगा रहे हैं।वे बोले यशोदाजी! आकर अपने पुत्र की करतूत तो देखो, इसने सारा भोजन जूठा कर दिया।ब्रजरानी दोनो हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी ,विप्रदेव बालक को क्षमा करें और कृपया फिर से भोजन बना लें।व्रजरानी दुबारा दूध घी मिश्री तथा चावल ले आयीं और कन्हाई को घर के भीतर ले गयीं ताकि वो कोई गलती न करें।विप्र अब पुन: खीर बनाकर अपने अराध्य को अर्पित कर ध्यान करने लगे, कन्हाई फिर वहाँ आकर खीर का भोग लगाने लगे।विप्रदेव परेशान हो गये।मैया मोहन को गुस्से से कहती हैं -  कान्हा लड़कपन क्यों करते हो?तुमने ब्राह्मण को बार-बार खिजाया( तंग) है। इस तरह बिप्रदेव जब-जब भोग लगाते हैं , कन्हाई आकर तभी जूठा कर देते हैं।अब माता परेशान होकर कहने लगी ' कन्हाई मैंने बड़ी उमंग से ब्राह्मणदेव को न्योता दिया था और तू उन्हें चिढ़ाता है?जब वो अपने ठाकुरजी को भोग लगाते हैं, तब तू यों ही भागकर चला जाता है और भोग जूठा कर देता है' । यह सुनकर कन्हाई बोले---- मैया तू मुझे क्यों दोष देती है,विप्रदेव स्वयं ही विधि विधान से मेरा ध्यान कर हाथ जोड़कर मुझे भोग लगाने के लिये बुलाते हैं,हरी आओ , भोग स्वीकार करो।मैं कैसे न जाऊँ।

           ब्राह्मण की समझ में बात आ गयी ।अब वे ब्याकुल होकर कहने लगे , प्रभो ! अज्ञानवश मैंने जो अपराध किया है , मुझे क्षमा करें।यह गोकुल धन्य है ,श्रीनन्दजी और यशोदाजी धन्य हैं , जिनके यहाँ साक्षात् श्रीहरि ने अवतार लिया है।मेरे समस्त पुन्यों एवं उत्तम कर्मों का फल आज मुझे मिल गया , जो दीनबन्धु प्रभु ने मुझे साक्षात दर्शन दिया।सूरदासजी कहते हैं कि विप्रदेव बार बार हे अन्तर्यामी ! हे दयासागर !मुझपर कृपा कीजिये, भवसे पार कीजिये ,और यशोदाजी के आँगन मे लोटने लगे।


Friday, 3 February 2017

Krishnashtakam

वसुदेव-सुतं देवं कंस-चाणूर-मर्दनम्

देवकी-परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

vasudeva-sutam devam kamsa-chAnUra-mardanam

devakI-paramAnandam krishnam vande jagadgurum

अतसीपुष्पसङ्काशं हार-नूपुर-शोभितम्

रत्न-कङ्कण-केयूरम कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

atasIpshpasankAsham hAra-nUpura-shobhitam

ratna-kankaNa-keyuram krishnam vande jagadgurum

कुटिलालक-संयुक्तं पूर्णचंद्र-निभाननम्

विलसत्-कुण्ड्लधरं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

kutilAlaka-samyuktam pUrNachandra-nibhAnanam

vilasat-kundaladharam krishnam vande jagadgurum

मंदारगन्ध-संयुक्तं चारुहासं चतुर्भुजं

बर्हि-पिच्छावचूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

mandAragandha-samyuktam chAruhAsam chaturbhujam

barhi-picchAvachUdAngam krishnam vande jagadgurum

उत्फुल्लपद्म-पत्राक्षं नीलजीमूत-सन्निभम्

याद्वानां शिरोरत्नं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

utphullapadma-patrAksham nIlajImoota-sannibham

yAdavAnAm shiroratnam krishnam vande jagadgurum

रुक्मिणीकेली -संयुक्तं पीताम्बर-सुशोभितम्

अवाप्त-तुलासीगंधम कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

rukminIkeli-samyuktam peetAmbara-sushobhitam

avapta-tulasIgandham krishnam vande jagadgurum

गोपिकानां कुचद्वन्द्व-कुन्कुमाङ्कित-वक्षसम्

श्रीनिकेतं महेष्वासं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

gopikAnAm kuchacvadvandva kumkumAnkita vakshasam

shrIniketam maheshvAsam krishnam vande jagadgurum

श्रीवात्साङकं महोरस्कं वनमाला-विराजितम्

शङ्कचक्र-धरं देवं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

shrIvatsAnkam mahoraskam vanamAlA virAjitam

shankachakra-dharam devam krishnam vande jagadgurum

कृष्णाष्टकं-इदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत्

कोटिजन्म-कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ||

krishnAshtakam-idam puNyam prAtarutthAya yah paTet

kotijanma-krutam pApam smaraNena vinashyati

Tuesday, 10 January 2017

कान्हा ने जब गोपियों की शिकायत की यशोदा मैया से।

मैया जब मैं घर से चलूँ , बुलावें ग्वालिन सादर मोय ।
अचक हाथ को झालो देके,  मीठी बोले देवर कहके ।
निधरक हो जायँ साँकर देके , झपट उतारे  काछनी ,
मुरली लेयँ  छिनाय  ।  मैं बालक ये धींगरी ,
इनसे  कहा   बसाय । खुद  नाचे  अरू मोयँ  नचावें ।
क्या - क्या बताऊँ तोको मोरी मैया ।मैया जब ...... ।। १ ।।

एक दिना एक चतुर बहुरिया, ले गई मेरी पकड़ अँगुरिया ।
छोटी सी उसकी राम कुठरिया, गोरस की मटकी तभी ,
धरी  पास  तत्काल । माखन दूँगी  घनों सो ,चैंटी बीनो लाल।
मैंने बाकी चैंटी बीनी । वह गई निधरक सोय ।।मैया जब ... ।।२ ।।

एक दिना की सुन मोरी मैया, मैं बैठो हो कदम की छैंया ।
ढिग बैठो बलदाऊ भैया ,एक आई जल भरन को ,
फिसल गयो वाको पाँव ।मेरे गोहन पड़ गई और बोली , 
धक्का दीनों श्याम , दे दे गुलचा गाल लाल किये ।
मैं ठाड़ो रह्यो रोय ,मोरी मैया।मैया जब ........ ।। ३ ।।

तेरे मुँह पर करें बड़ाई , पाछे  वो तेरी करें बुराई ।
ऐसी ब्रज की ढीठ लुगाई , इनकी तु पतियाती ।
और मुझे झूठा बनाती , इनको समझती शाह।
चोर नाम मेंरो धरो , होन न देंगी मेरो ब्याह  ।
मेरे साथ ये ऐसों करती , जैसो करें न कोय । मैया जब ..   ।। ४ ।।