Swayam me anekon kamiyan hone ke bavjood mai apne aap se itna pyaar kar sakta hun

to fir doosron me thodi bahut kamiyon ko dekhkar unse ghrina kaisi kar sakta hun-

anmol vachan, Swami Vivekanand Ji


Thursday, 23 February 2017

शिवताण्डव- स्तोत्रम्


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
   गलेवलम्ब्य  लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्  ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
        चकार चण्डताण्डवं तनोतु  न:  शिव:  शिवम्  ।।१ ।।

( जिन्होंने जटारूप अटवी ( वन ) से निकलती हुई गंगाजी के गिरते हुये प्रवाहों से पवित्र किये गये गले में शर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारणकर , डमरू के डम- डम शब्दों से मण्डित प्रचण्ड ताण्डव किया , वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें। ) 

जटाकटाहससम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- 
  विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
       किशोरचन्द्रशेखरे  रति: प्रतिक्षणं मम् ।।२ ।।

( जिनका मस्तक जटारूपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंग , लताओं से सुशोभित हो रहा है , ललाटाग्नि धक् -धक् जल रही है , सिर पर बाल चन्द्रमा बिराजमान हैं , उन ( भगवान् शिव ) में मेरा निरन्तर अनुराग हो।)

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
         स्फुरद्धिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षघोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
             कचिद्यिगम्बरे मनो विनोद मेतु वस्तुनि ।।३ ।।

( गिरिराजकिशोरी पार्वती के विलासकालोपयोगी शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनन्दित हो रहा है , जिनकी निरन्तर कृपादृष्टि से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है ऐसे किसी दिगम्बर तत्व में मेरा मन विनोद करे।) 

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
         कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
              मनो विनोदमद्भुतं विभर्तु भूतभर्तरि ।। ४ ।।

( जिनके जटाजूटवर्ती भुजंगमों के फणों की मणियों का फैलता हुआ पिंगल प्रभापुन्ज दिशारूपिणी अंगनाओं के मुख पर कुंकुम राग का अनुलेप कर रहा है , मतवाले हाथी के हिलते हुये चमड़े का उत्तरीय वस्त्र ( चादर ) धारण करने से स्निग्धवर्ण हुये उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
               प्रसूनधूलिघोरणीविधूसराड़्घ्रिपीठभू: ।
भुजंगराजमालया  निबद्धजाट  जूटक:
              श्रियैचिराय  जायतां  चकोरबन्धुशेखर: ।।५ ।।

जिनकी चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देवताओं के ( प्रणाम करते समय ) मस्तकवर्ती कुसुमों की धूलि से धुसरित हो रही है , नागराज ( शेष नाग ) के हार से बँधी हुई जटावाले भगवान चन्द्रशेखर मेरे लेये चिरस्थायिनी सम्पत्ति के साधक हों ।

ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा-
       निपीतपंचसायकं  नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया  विराजमानशेखरम्
          महाकपालि सम्पदे  शिरो  जटालमस्तु न: ।।६ ।।

जिसने ललाट- वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के स्फुलिंगों के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था , वह ( श्रीमहादेवजी का ) उन्नत विशाल ललाटवाला जटिल मस्तक हमारी सम्पत्ति का साधक हो।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जवल- 
           द्धनंजयाहुतीकृतप्रचण्डपंचसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- 
              प्रकल्पनैकशिल्पिनि  त्रिलोचने  रतिर्मंम ।। ७ ।।

जिन्होंने अपने विकराल भालपट्ट पर धक् - धक् जलती हुई अग्नि में प्रचण्ड कामदेव को हवन कर दिया था , गिरिराजकिशोरी के स्तनों पर पत्रभंग - रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान् त्रिलोचन में मेरी धारणा लगी रहे ।

नवीनमेघमण्डलीनिरूद्धदुर्धंरस्फुर-
        त्कुहूनिशीथिनीतम:प्रबन्धबद्धकन्धर: ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु    कृत्तिसिन्धुर:
           कलानिधानबन्धुर:श्रियंजगद्धुरन्धर: ।। ८ ।।

जिनके कण्ठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुये दुरूह अन्धकार के समान श्यामता अंकित है, जो गजचर्म लपेटे हुये हैं , वे संसारभार को धारण करने वाले चन्द्रमा से मनोहर कान्तिवाले भगवान् गंगाधर मेरी सम्पत्ति का विस्तार करें ।

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा-
         वलम्बिकण्ठकन्दलीरूचिप्रबद्धकन्धरम्  ।
 स्मरच्छिदं  पुरच्छिदं  भवच्छिदं  मखच्छिदं  
           गजच्छिदान्धकच्छिदं   तमन्तकच्छिदं  भजे ।। ९ ।।

जिनका कण्ठदेश खिले हुये नीलकमल समूह की श्यामप्रभा का अनुकरण करने वाली हरिणी की सी छवि वाले चिन्ह से सुशोभित है तथा जो कामदेव , त्रिपुर , भव ( संसार ) , दक्ष-यज्ञ , हाथी , अन्धकासुर और यमराज का भी उच्छेदन करने वाले हैं , उन्हें मैं भजता हूँ।

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमंजरी-
                   रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
 स्मरान्तकं  पुरान्तकं  भवान्तकं  मखान्तकं
                   गजान्तकान्धकान्तकं  तमन्तकान्तकं  भजे ।।१० ।।

जो अभिमानरहित पार्वती के कलारूप कदम्बमंजरी के मकरन्द स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी को पान करने वाले मधूप हैं तथा कामदेव , त्रिपुर , भव , दक्ष-यज्ञ , हाथी , अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करने वाले हैं , उन्हें मैं भजता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
               द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्विमिद्विमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
               ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डव:  शिव: ।। ११ ।।

जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुये भुजंग के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमश: धधकती हुई फैल रही है , धिम-धिम बजते हुये मृदंग के गम्भीर मंगल घोष के क्रमानुसार जिनका प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उन भगवान् शंकर की जय हो ।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजो-
                     र्गंरिष्ठरत्नलोष्ठयो:  सुहृद्विपक्षपक्षयो:  ।
तृणारविन्दुचक्षुषो:  प्रजामहीमहेन्द्रयो: 
                          समप्रवृत्तिक:  कदासदाशिवं  भजाम्यहम् ।।१२ ।।

पत्थर और सुन्दर बिछौनों में , सांप और मुक्ता की माला में , बहुमूल्य रत्न तथा मिट्टी के ढेले में , मित्र या शत्रु पक्ष में , तृण अथवा कमललोचना तरूणी में , प्रजा और पृथ्वी के महाराज में समानभाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ।

कदानिलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे  बसन्
                 विमुक्तदुर्मति:  सदा  शिर:स्थमंजलिं  वहन् ।
विलोललोललोचनो   ललामभाललग्नक:
                   शिवेति  मन्त्रमुच्चरन्  कदा  सुखी  भवाम्यहम्  ।।१३ ।।

सुन्दर ललाटवाले भगवान् चन्द्रशेखर में दत्तचित्त हो अपने कुविचारों को त्यागकर गंगाजी के तटवर्ती निकुंज के भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबाई हुई हिह्वल आँखों से  'शिव ' मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा ।

इमं  हि  नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं  स्तवं 
                पठन्स्मरन्ब्रु  वन्नरो  बिशुद्धिमेति  सन्ततम् ।
हरे  गुरौसुभक्तिमाशु  यातिनान्यथा  गतिं
                  विमोहनं  हि  देहनां  सुशंकरस्य  चिन्तनम् ।।१४ ।।

जो मनुष्य इस प्रकार से उक्त उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ , स्मरण और वर्णन करता रहता है , वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही सुरगुरू श्रीशंकरजी की अच्छी भक्ति प्राप्त कर लेता है।वह विरूद्धगति को नहीं प्राप्त होता , क्योंकि श्रीशिवजी का अच्छी प्रकार चिंतन प्राणिवर्ग के मोह का नाश करने वाला है ।

पूजावसानसमये     दशवक्त्रगीतं
                        य:  शम्भुपूजनपरं  पठति  प्रदोषे  ।
तस्य  स्थिरां  रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
                  लक्ष्मी  सदैव  सुमुखी  प्रददाति  शम्भु: ।।१५ ।।

सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर रावण के गाये हुये इस शम्भुपूजन सम्बन्धी स्तोत्र का जो पाठ करता है , शंकरजी उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़े से युक्त सदा स्थिर रहनेवाली अनुकूल सम्पत्ति देते हैं।

              ( इति श्री रावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् )





Wednesday, 15 February 2017

वेदसारशिवस्तोत्रम्


    

पशुनां  पतिं  पापनाशं  परेशं
          गजेन्द्रस्य  कृत्तिं  वसानं  वरेण्यम्  ।
जटाजूटमध्ये     स्फुरदगांगवारिं 
                    महादेवमेकं  स्मरामि  स्मरामि ।।

  पशुओं ( समस्त प्राणिमात्र )   के पति ( रक्षक ) , त्रिविध-ताप -पाप को नष्ट करनेवाले, परमेश्वर स्वरूप एवं कजचर्म धारक , सर्वश्रेष्ठ तथा अपने जटा-जूट में गंगा को लहराने वाले, कामदेव के विनाशक , ऐसे एकमात्र शिव का मैं स्मरण करता हूँ ।।१ ।।

महेशं   सुरेशं   सुरारातिनाशं
          विभुं    विश्वनाथं   विभूत्यंगभूषम्  ।
विरूपाक्ष - मिन्द्वर्क - वह्निं  त्रिनेत्रं 
               सदानंदमीडे   प्रभुं   पंचवक्त्रम् ।।२ ।।

महेश, देवताओं के स्वामी ( सुरेश ) तथा समस्त देवताओं के कष्ट विनाशक, व्यापक , समस्त चराचर के स्वामी भगवान विश्वनाथ अपने समस्त अंगों में विभूति धारण किये हुये , विरूपाक्ष , चन्द्र - सूर्य - वह्निरूप, त्रिनेत्रधारी , सदानंद मग्न , पंचमुख वाले प्रभु शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

गिरीशं   गणेशं   गले   नीलवर्णं
          गवेन्द्राधिरूढं     गुणातीतरूपम  ।
भवं    भास्वरं  भस्मना   भूषिताड़्गं
            भवानीकलत्रं   भजे   पंचवक्त्रम्  ।।३ ।।

आप कैलाश पर्वत के स्वामी , प्रमथादि गुणों के ईश ,  नीलकंठ स्वरूप , वृषभ ( नन्दी ) पर आरूढ़ , अगणित स्वरूप धारण करने वाले , संसार के आदिकारण भूत , अत्यन्त तेजस्वी , भस्मधारण से विभूषित विग्रह वाले , पार्वती जिनकी अर्धांगिनी हैं , ऐसे पाँच मुखवाले महादेवजी को मैं भजता हूँ।

 शिवाकान्त   शम्भो   शशांकार्धमौले
                  महेशान  शूलिन्  जटाजूटधारिन्  ।
त्वमेको  जगद् - व्यापको  विश्वरूप
                   प्रसीद  प्रसीद   प्रभो   पूर्णरूप ।।४ ।।

हे पार्वतीनाथ ! शम्भो ! हे चन्द्रशेखर ! हे त्रिशूलधारक ! जटाजूटधारिन ! हे विश्वरूप ! समस्त चराचर संसार में आप एकमात्र व्यापक हैं , ऐसे हैं पूर्णरूप प्रभु शिवशंकर , आप मुझपर प्रसन्न होइए ।

  परात्मानमेकं   जगद् - बीजमाद्यं
                  निरीहं     निराकारमोंकारवेद्यम् ।
   यतो     जायते    पाल्यते     येन    विश्वम् 
               तमीशं  भजे  लीयते  यत्र   विश्वम्  ।।५ ।।

आप परमात्मा स्वरूप , अद्वितीय , जगत्  केआदि कारण , इच्छा - रहित , निराकार तथा प्रणव ( ओंकार ) द्वारा ही वेद्य हैं , आप ही जगत् के उत्पादक , पालक एवं लय करने वाले हैं , ऐसे महादेवजी को मैं भजता हूँ ।

  न  भूमिर्न  चापो  न  वह्निर्न  वायु -
                र्न    चाकाशमास्ते  न  तन्द्रा  न  निन्द्रा  ।
  न  ग्रीष्मो  न  शीतं  न  देशो  न  वेषो
                 न   यस्याअस्ति   मूर्तिस्त्रिमूर्तिं  तमीडे ।।६ ।।

जो न पृथ्वी , जल , अग्नि  वायु  है  तथा जो न  आकाश एवं तन्द्रा और निद्रा है , उसी प्रकार जो न ग्रीष्म न शीत है और जिनका न कोई देश है , ऐसे मूर्ति रहित त्रिमूर्ति ( सत्व , रज, तम ) रूप शिव का मैं  स्तुति  करता हूँ ।

अजं  शाश्वतं  कारणं  कारणानां
शिवं  केवलं  भासकं  भासकानाम्  ।
तुरीयं            तम:पारमाद्यन्तहीनं 
प्रपद्ये    परं    पावनं    द्वैतहीनम्  ।।७ ।।

आप अजन्मा , नित्य तथा कारण के भी कारण रूप हैं आप ही कल्याण स्वरूप , अद्वितीय हैं , आप ही प्रकाश को भी प्रकाश करने वाले हैं , आप अवस्था त्रय से रहित तुरीयावस्था में ही सर्वदा स्थित हैं एवं आप अज्ञान से भी परे , अनादि एवं अनन्त हैं , ऐसे परम पावन , द्वैत रहित , (अद्वैत रूप ) आपकी शरण में रहकर मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

नमस्ते  नमस्ते  विभो  विश्वमूर्ते !
          नमस्ते  नमस्ते  चिदानन्दमूर्ते ! ।
नमस्ते  नमस्ते  तपोयोगगम्य
           नमस्ते  नमस्ते  श्रुतिज्ञानगम्य ।।८ ।।

हे विश्वमूर्ति ! हे विभु ! आपको नमस्कार है । हे चिदानन्द मूर्तिरूप शिव ! आपको मेरा नमस्कार है , हे तप एवं योगगम्य प्रभो ! आपको नमस्कार है तथा हे वेदविद् भगवान् ! आपको मेरा नमस्कार है ।

प्रभो  शूलपाणे  विभो  विश्वनाथ !
        महादेव  शम्भो  महेश  त्रिनेत्र ।
 शिवाकान्त   शान्त   स्मरारे   पुरारे !
                 त्वदन्यो  वरेण्यो  न  मान्यो  न  गण्य: ।।९ ।।

हे प्रभो !  शूलपाणि !  विभु !  विश्वनाथ !  महादेव ! शम्भु ! हे महेश ! हे त्र्यम्बक ! हे शिवा ( पार्वती ) वल्लभ ! हे शान्तरूप ! हे कामादि तथा त्रिपुरारी ! आपके अतिरिक्त न तो कोई भी देवगणों में श्रेष्ठ है न मान्य है एवं गणनीय भी कोई नहीं है ।

शम्भो महेश करूणामय शूलपाणे !
         गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ! ।
काशीपते करूणया जगदेतकेक-
           स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोअसि ।। १० ।।

हे शम्भो ! हे महेश ! हे करूणा - वरूणालय ! हे शूलपाणि , हे गौरीपति , पशुपति , हे संसार के पाश विध्वंसक ! हे काशीपति ! आप ही एकमात्र इस जगत् के उत्पत्ति , स्थिति एवं लयकारक हो तथा आप ही एकमात्र इस जगत् के स्वामी हो।

त्वत्तो  जगद्  भवति देव  भव  स्मरारे !
          त्वय्येव  तिष्ठति  जगन्मृड  विश्वनाथ ! ।
त्वय्येव  गच्छति  लयं  भजदेतदीश !
            लिंगात्मकं  हर  चराचरविश्वरूपिन् ! ।।११ ।।

हे देव ! हे शंकर ! हे कन्दर्प- दर्पविदारक ! हे ईश ! हे विश्वनाथ ! हे हर ! यह लिंग स्वरूप सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न होता है तथा आप में ही स्थित है और आप में ही लीन होता है ।

          ( इस प्रकार श्रीशंकराचार्य रचित वेदसारशिवस्तोत्र समाप्त ।)

Sunday, 12 February 2017

यशोदाजी के मायके से जब पंडित आये?

श्रीयशोदाजी के मायके से एक ब्राह्मण गोकुल आये।नंदरायजी के घर बालक का जन्म हुआ है,यह सुनकर आशीर्वाद देने आये थे।मायके से आये ब्राह्मण को देखकर यशोदाजी को बड़ा अानंद हुआ।पंडितजी के चरण धोकर , आदर सहित उनको घर में बिठायाऔर उनके भोजन के लिये योग्य स्थान गोबर से लिपवा दिया।पंडितजी से बोली ,देव आपकी जो इच्छा हो भोजन बना लें।यह सुनकर विप्र का मन अत्यन्त हर्षित हुआ।विप्र ने कहा बहुत अवस्था बीत जाने पर विधाता अनुकूल हुए, यशोदाजी! तुम धन्य हो जो ऐसा सुन्दर बालक का जन्म तुम्हारे घर हुआ।

    यशोदाजी गाय दुहवाकर दूध ले आईं ,ब्राह्मण ने बड़ी प्रसन्नता से घी मिश्री मिलाकर खीर बनायी।खीर परोसकर वो भगवान हरी को भोग लगाने के लिये ध्यान करने लगे।जैसे ही आँखे खोली तो विप्र देव ने देखा कन्हाई खीर का भोग लगा रहे हैं।वे बोले यशोदाजी! आकर अपने पुत्र की करतूत तो देखो, इसने सारा भोजन जूठा कर दिया।ब्रजरानी दोनो हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी ,विप्रदेव बालक को क्षमा करें और कृपया फिर से भोजन बना लें।व्रजरानी दुबारा दूध घी मिश्री तथा चावल ले आयीं और कन्हाई को घर के भीतर ले गयीं ताकि वो कोई गलती न करें।विप्र अब पुन: खीर बनाकर अपने अराध्य को अर्पित कर ध्यान करने लगे, कन्हाई फिर वहाँ आकर खीर का भोग लगाने लगे।विप्रदेव परेशान हो गये।मैया मोहन को गुस्से से कहती हैं -  कान्हा लड़कपन क्यों करते हो?तुमने ब्राह्मण को बार-बार खिजाया( तंग) है। इस तरह बिप्रदेव जब-जब भोग लगाते हैं , कन्हाई आकर तभी जूठा कर देते हैं।अब माता परेशान होकर कहने लगी ' कन्हाई मैंने बड़ी उमंग से ब्राह्मणदेव को न्योता दिया था और तू उन्हें चिढ़ाता है?जब वो अपने ठाकुरजी को भोग लगाते हैं, तब तू यों ही भागकर चला जाता है और भोग जूठा कर देता है' । यह सुनकर कन्हाई बोले---- मैया तू मुझे क्यों दोष देती है,विप्रदेव स्वयं ही विधि विधान से मेरा ध्यान कर हाथ जोड़कर मुझे भोग लगाने के लिये बुलाते हैं,हरी आओ , भोग स्वीकार करो।मैं कैसे न जाऊँ।

           ब्राह्मण की समझ में बात आ गयी ।अब वे ब्याकुल होकर कहने लगे , प्रभो ! अज्ञानवश मैंने जो अपराध किया है , मुझे क्षमा करें।यह गोकुल धन्य है ,श्रीनन्दजी और यशोदाजी धन्य हैं , जिनके यहाँ साक्षात् श्रीहरि ने अवतार लिया है।मेरे समस्त पुन्यों एवं उत्तम कर्मों का फल आज मुझे मिल गया , जो दीनबन्धु प्रभु ने मुझे साक्षात दर्शन दिया।सूरदासजी कहते हैं कि विप्रदेव बार बार हे अन्तर्यामी ! हे दयासागर !मुझपर कृपा कीजिये, भवसे पार कीजिये ,और यशोदाजी के आँगन मे लोटने लगे।


Friday, 3 February 2017

Krishnashtakam

वसुदेव-सुतं देवं कंस-चाणूर-मर्दनम्

देवकी-परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

vasudeva-sutam devam kamsa-chAnUra-mardanam

devakI-paramAnandam krishnam vande jagadgurum

अतसीपुष्पसङ्काशं हार-नूपुर-शोभितम्

रत्न-कङ्कण-केयूरम कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

atasIpshpasankAsham hAra-nUpura-shobhitam

ratna-kankaNa-keyuram krishnam vande jagadgurum

कुटिलालक-संयुक्तं पूर्णचंद्र-निभाननम्

विलसत्-कुण्ड्लधरं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

kutilAlaka-samyuktam pUrNachandra-nibhAnanam

vilasat-kundaladharam krishnam vande jagadgurum

मंदारगन्ध-संयुक्तं चारुहासं चतुर्भुजं

बर्हि-पिच्छावचूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

mandAragandha-samyuktam chAruhAsam chaturbhujam

barhi-picchAvachUdAngam krishnam vande jagadgurum

उत्फुल्लपद्म-पत्राक्षं नीलजीमूत-सन्निभम्

याद्वानां शिरोरत्नं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

utphullapadma-patrAksham nIlajImoota-sannibham

yAdavAnAm shiroratnam krishnam vande jagadgurum

रुक्मिणीकेली -संयुक्तं पीताम्बर-सुशोभितम्

अवाप्त-तुलासीगंधम कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

rukminIkeli-samyuktam peetAmbara-sushobhitam

avapta-tulasIgandham krishnam vande jagadgurum

गोपिकानां कुचद्वन्द्व-कुन्कुमाङ्कित-वक्षसम्

श्रीनिकेतं महेष्वासं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

gopikAnAm kuchacvadvandva kumkumAnkita vakshasam

shrIniketam maheshvAsam krishnam vande jagadgurum

श्रीवात्साङकं महोरस्कं वनमाला-विराजितम्

शङ्कचक्र-धरं देवं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ||

shrIvatsAnkam mahoraskam vanamAlA virAjitam

shankachakra-dharam devam krishnam vande jagadgurum

कृष्णाष्टकं-इदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत्

कोटिजन्म-कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ||

krishnAshtakam-idam puNyam prAtarutthAya yah paTet

kotijanma-krutam pApam smaraNena vinashyati